S M L

फादर्स डे: पापा के लिए तो बस इतना ही लिख सकता हूं...

समझ में नहीं आता कि पापा पर क्या लिखूं? फादर्स डे पर क्या लिखूं?

Updated On: Jun 18, 2017 03:41 PM IST

Pawas Kumar

0
फादर्स डे: पापा के लिए तो बस इतना ही लिख सकता हूं...

'और आज क्या ट्रेंडिंग है भाई'

'फादर्स डे'

'तो कुछ लिखो?'

फादर्स डे पर लिखना...आखिर ऐसे दिन पर क्या लिखा जा सकता है. यह कोई होली-दिवाली तो है नहीं जिसकी हजार यादें आपके मन में हों. फादर्स डे तो बहुत बाद में जाना- इंटरनेट के जरिए. तो क्या फादर्स डे मनाने के खिलाफ लिखा जाए? लिखा जाए कि कैसे ये आयोजन हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं और बस सोशल मीडिया की उपज है. लेकिन यह भी लिख नहीं सकता क्योंकि असल में मुझे ऐसे आयोजनों से कोई दिक्कत नहीं है. मुझे अपने दोस्तों के मदर्स डे वाले पोस्ट प्यारे लगे थे, फादर्स डे वाले भी प्यारे लग रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि सोशल मीडिया पर पिता के प्रति प्यार का या सम्मान का इजहार करने में कुछ भी गलत नहीं है.

तो फिर फादर्स डे पर क्या लिखा जाए? पिता के बारे में?

पिता के बारे में लिखना बहुत कठिन है. इसलिए नहीं कि उनके बारे में कुछ अच्छा नहीं लिख सकता. दिक्कत है कि पिता के बारे में शब्दों में कहना बहुत मुश्किल है.

मुझे याद नहीं आता कि हमने कभी भी 'आई लव यू पापा' या 'आई लव यू मम्मी' कहा हो. प्यार जाहिर करने के लिए शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया. इसलिए 'माइ डैड इज ए हीरो' जैसा कुछ लिख पाना बड़ा असहज लगता है.

वैसे भी पिता देखने से कोई हीरो तो लगते नहीं है- हां, कुछ लोगों को उनका चेहरा धर्मेंद्र से जरूर मिलता-जुलता लगता है. याद है कि किसी ने महाभारत के दिनों में उनके बारे में कहा था कि वह युधिष्ठिर जैसे दिखते हैं.

न ही पापा ने हीरो वाले कोई ऐसे काम किए हैं. हां, पापा के बारे में कुछ बातें जरूर आती हैं.

याद है जब पापा एनसीसी की ट्रेनिंग के लिए तीन महीने बाहर गए थे और उनके साथ गए सभी लोग बीच में ट्रेनिंग अधूरी छोड़ चले आए थे- तो पापा के एनसीसी अफसर बनकर लौटने पर बड़ा अच्छा लगा था.

याद है कि अपने जन्मदिन पर फिल्म देखने की जिद की थी तो पापा ने लकड़ी की बेंच पर बैठकर रिक्शेवालों के बीच बैठकर मिथुन की फिल्म देखी थी. 'अपने दम पर'- नाम आज भी याद है.

याद है कि जब दादी बस से उतर नहीं पा रही थीं तो पापा कैसे कंधे पर लादकर उन्हें रिक्शे तक ले आए थे. जब नानाजी बहुत बीमार थे तो उनकी देखभाल को हॉस्पिटल की फर्श पर सोए हुए पापा याद हैं.

लेकिन पापा की कुछ और बातें भी याद हैं. मेरे इंजीनियरिंग न करने पर पापा का गुस्सा याद है (और मेरा भविष्य न संवार पाने की हताशा भी). आज भी मेरे कामयाब दोस्तों की सैलरी पर बात करते वक्त जो थोड़ा सा रिग्रेट उनकी आवाज में आता है, वह भी याद रहता है. कुछ बातों पर जब उनकी सोच पुरानी, दकियानूसी लगती है तो उसपर मेरा गुस्सा भी याद है.

सो समझ में नहीं आता कि पापा पर क्या लिखूं? फादर्स डे पर क्या लिखूं? हां, बस इतना पता है कि एक बार बचपन में उनके न होने का सपना देखा था. तब महीनों तक शाम होते ही वो खिड़की बंद कर देता था जहां से सपने में उनके न होने की खबर आई थी. मम्मी खिड़की खोलने के लिए डांटती रहती और मैं खोलने नहीं देता. जब पापा आ जाते तभी वो खिड़की खुलती. कभी किसी से यह नहीं कहा- आज इतना ही लिख देता हूं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi