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तीन तलाक का मुद्दा: इस्लाम की नहीं मुसलमानों की फिक्र करें

बौद्धिक रूप से मुझे फिक्र मुसलमानों की है, इस्लाम की नहीं.

Tufail Ahmad Updated On: Dec 08, 2016 12:14 PM IST

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तीन तलाक का मुद्दा: इस्लाम की नहीं मुसलमानों की फिक्र करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन तलाक पर बड़ा फैसला सुनाया है. इसे मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ क्रूरता बताया है. वहीं आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस फैसले को शरियत के खिलाफ बताया है. बोर्ड अब इस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती देगा. तीन तलाक के मुद्दे पर ही तुफैल अहमद ने विस्तार से लिखा था. आप इस मसले को इस लेख के जरिए समझ सकते हैं.

दो याचिकाओं की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है. यहां तक कि पवित्र कुरान में भी तलाक को सही नहीं माना गया है.

जब मैं 20 साल पहले के भारत के बारे में सोचता हूं तब मुझे सड़कों पर बुर्के वाली औरतें नहीं दिखती थीं. आज मुझे अपने ही इलाके के बस स्टॉप पर ही कई सारी बुर्के वाली औरतें दिखती हैं. मैं 20 साल बाद की कल्पना करता हूं तब यह सोचकर ही डर जाता हूं कि शायद मेरी पोती भी मुझे बुर्का पहने दिखे. मैं इसे एक उदाहरण से समझाता हूं. जुलाई 2001 में बीबीसी मुझे लंदन ले गई. उस समय मेरी छः बहनों में से दो बहनें बिहार में ग्यारहवीं और नौवीं क्लास में पढ़ रही थीं. पहली बार मेरे पास कुछ पैसे थे. इस वजह से मैंने उनसे कहा, जितना पढ़ना चाहो पढ़ो. दोनों ने सोशल वर्क में एमए किया. एक आजकल मीडिया में है और एक इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक की अनुयायी बन गई.

बौद्धिक रूप से मुझे फिक्र मुसलमानों की है, इस्लाम की नहीं. माना इस्लाम बदल नहीं सकता, कुरान बदल नहीं सकता, लेकिन उसे मानने वाले तो बदल सकते हैं. लोकतंत्र इस बदलाव का जरिया हो सकता है क्योंकि लोकतंत्र किसी के भी निजी जीवन में कई मोड़ पैदा करता है. जब हम लोकतंत्र की बात कर रहे हैं तो हम ब्रिटिश लेखक बर्नार्ड क्रिक के शब्दों में कह सकते हैं- ‘लोकतंत्र को मूल्यों और संस्थागत व्यवस्था के एक सेट की तरह देखा जाता है.’ लोकतंत्र को एक ‘सरकार के सिद्धांत’ या ‘संस्थागत व्यवस्था के एक सेट के रूप में या संवैधानिक उपायों’ के रूप में देखा जाता है. गाजा हो या मिस्र, तुर्की हो या ईरान, सब जगह इस्लामी कट्टरपंथियों ने चुनावों को सिर्फ सत्ता हथियाने का जरिया समझा है. अब पाकिस्तान को ही लीजिए, जहां आप अगर मुसलमान नहीं हैं तो राष्ट्रपति नहीं बन सकते. लोकतंत्र में सिर्फ चुनाव ही शामिल नहीं है. लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी लोकतंत्र की किसी और बात को नहीं मानते, जैसे अभिव्यक्ति की आजादी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लैंगिक समानता या फिर अल्पसंख्यकों के लिए बराबर अधिकार.

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सोशल मीडिया वाली नई नस्ल

भारत में लोकतंत्र संविधान के जरिए लागू किया गया है. लोकतंत्र संस्थाओं के जरिए काम करती है. इस वजह से नई पीढ़ी के कुछ भारतीय समानता और आजादी के लिए खासकर तीन तलाक, हलाला और एक से ज्यादा शादी के चलन को खत्म करने की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही है. इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है. भारत अब एक युवा देश है. 1.3 अरब की आबादी में से 55 फीसदी की उम्र 25 साल से कम है जिसने ना तो इमरजेंसी देखी है और ना विभाजन. उनकी परवरिश आजाद माहौल में हुई है. ये फेसबुक और ट्विटर वाली नस्ल है. मुसलमान भी इसी पीढ़ी का हिस्सा हैं. इस लोकतांत्रिक परिवेश में मुमकिन है कि मुसलानों की नई पीढ़ी भी उन बातों को त्याग दे जो उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में, या मौलवियों से मिली हैं. इतिहास को देखें तो पता चलता है कि जर्मनी और इटली की युवा पीढ़ी ने भी अपने माता-पिता से विरासत मिले नाजीवादी और फासीवादी विचारों को त्याग दिया था. भारत में भी तो हिंदुओं की युवा पीढ़ी जातिवाद में उस तरह कहां विश्वास करती है जैसे उनके माता पिता करते हैं. यह सब लोकतांत्रिक मूल्यों के असर है. भारतीय मुसमलानों के लिए एक से ज्यादा शादी और हलाला जायज है, लेकिन ज्यादातर मुसलमान इन पर अमल नहीं करते.

इस्लाम लोकतांत्रिक मूल्यों में बाधा

जब हम मुसलमानों में सुधार की बात करते हैं तो उम्मीद करते हैं कि तुरंत सुधार हो जाए. लेकिन धार्मिक समुदायों में सुधार होने में सदियां लग जाती हैं. यहूदी और ईसाई धर्म आतंरिक संघर्षों से गुजरे हैं. इस्लाम आंतरिक गृहयुद्ध के दौर से गुजर रहा है. इस बात को बहुत अधिक समय नहीं हुआ है जब दुनिया पर ईसाई पादरियों का राज चलता था. लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर बढ़ती जागरुकता के कारण अब बाइबिल और तोराह जैसे पवित्र ग्रंथ धार्मिक दायरे तक ही सिमट गए हैं. भारत में भी अब हिंदू मनुस्मृति को नहीं मानते हैं. जिहाद या नमाज के बारे में जो कुरान कहता है, बहुत सारे मुसलमान भी उस पर अमल नहीं करते. लेकिन मुसलमान मस्जिद, मौलवी और मदरसे के बीच फंस कर रह गए हैं. दुर्भाग्य की बात है कि इन सबके लिए पैसा धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य देता है. इसकी वजह है सिर्फ वोटों की राजनीति. खुद को सेक्यूलर कहने वाली पार्टियां मुसलमानों को लुभाने में कसर नहीं छोड़ रही हैं तो बीजेपी लव जिहाद को मुद्दा बनाती है.

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कुछ दिन पहले मैं पुणे में एक कार्यक्रम में था. वहां जमीयत उलेमा ए हिंद के मौलाना महमूद मदनी भी थे. वह बदलाव की बात से तो सहमत थे, लेकिन उन्होंने यह तंज कसा कि- ‘इस्लाम को बदलना चाहते हैं तो बदल लीजिए.’ यह साफ है कि बहुलतावाद और समानता में विश्वास न करने वाले इस्लाम जैसे धर्म लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बाधा हैं. लेकिन भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत व्यवस्था के ढांचे में इन बाधाओं से निपटा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के सामने दो इम्तिहान हैं. पहला, क्या वह तीन तलाक को समानता का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानेगा. दूसरा, क्या वह भारतीय करदाता के पैसे से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और खास कर उसके शिया और सुन्नी धर्मशास्त्र से जुड़े विभागों को चलाते रहने की अनुमति देगा.

खतरे की घंटी

लोकतांत्रिक संस्थान कट्टरपंथी इस्लाम के आगे घुटने न टेके, इसके लिए जरूरी है कि मदरसों को राज्य सरकारों की तरफ से मिलने वाली आर्थिक मदद को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए. एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र होने के नाते भारतीय राज्य मदरसों को चलाने के लिए पैसा नहीं दे सकता. शिक्षा के अधिकार के तहत मुसलमान बच्चे भी 6-14 साल के अन्य बच्चों की तरह स्कूल जाएं, मदरसों में नहीं. मदरसों को आर्थिक मदद देकर भारतीय राज्य मुसलमानों में जहालत ही फैला रहा है. शिक्षा में सुधारों से ही लोकतांत्रिक बदलाव आ सकता है. लगभग सौ साल पहले गांधीजी ने मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिए खिलाफत का समर्थन किया था. अब कम पढ़ी-लिखी औरतें भी हाथ में संविधान लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही हैं और संविधान में दिए बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज उठा रही हैं. भारतीय लोकतंत्र में यह बड़े बदलाव का पल है. यह उन मुसलमान नेताओं के लिए खतरे की घंटी है जो भारतीय मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि इस्लाम के लिए लड़ रहे हैं. जैसे-जैसे संवैधानिक मूल्य लोगों में जड़े जमाएंगे, वैसे-वैसे मुसलमान नेता और मौलवी अपनी अहमियत खोते चले जाएंगे. इनके साथ-साथ तथाकथित हिंदू सेक्युलर नेता भी दफन हो जाएंगे. मुझे बड़ी बेसब्री से उस क्रांतिकारी समय का इंतजार है.

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