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जो चिकन आप खा रहे हैं, उसमें बस चिकन नहीं और भी बहुत सी बुरी चीजें हैं

मांस के कारोबार से जुड़े लोग ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहते हैं. मांस ऐसे ही नुकसानदेह होता है. लेकिन ऐसा मिलावटी मांस खाना तो जहर खाने जैसा है

Maneka Gandhi Maneka Gandhi Updated On: Nov 16, 2017 01:19 PM IST

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जो चिकन आप खा रहे हैं, उसमें बस चिकन नहीं और भी बहुत सी बुरी चीजें हैं

आपको दुकानों में बड़ी तादाद में जो चिकन बिकता हुआ दिखता है, क्या वो वाकई चिकन होता है? शायद नहीं.

सबवे कंपनी अक्सर उन लोगों को ध्यान में रखकर अपने प्रोडक्ट बनाती है, जो सेहत को लेकर ज्यादा जागरूक होते हैं. जो फास्ट फूड नहीं खाते हैं. क्या वो सेहत के लिए ठीक होता है? हाल ही में सीबीसी मार्केट प्लेस ने एक पड़ताल की. इसमें पता चला कि सबवे के चिकन सैंडविच में जो चिकन इस्तेमाल होता है, उसका सिर्फ 42.8 फीसद हिस्सा ही चिकन होता है. सलाद चिकन, जिसके बारे में सबवे का दावा है कि वो रोस्टेड चिकन के जैसा ही सेहतमंद होता है, उसमें भी केवल 53.6 फीसद ही चिकन होता है.

कभी-कभी आधा हिस्सा भी चिकन नहीं होता

सवाल ये है कि बाकी का हिस्सा क्या होता है? असल में वो जीएम यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड सॉय प्रोटीन होती है, जो कंपनी को बेहद सस्ती पड़ती है. लेकिन दिक्कत ये है कि ये आप की सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह है. सीबीसी मार्केटप्लेस की पड़ताल में पता चला कि सबवे के सैंडविच में पचास से ज्यादा चीजें मिली हुई थीं. इनमें से 16 चीजें तो चिकन में ही मिली पाई गईं.

सबवे के उत्पादों का ये परीक्षण कनाडा की ट्रेंट यूनिवर्सिटी की वाइल्डलाइफ फोरेंसिक डीएनए लैब में किए गए थे. सबवे से मुकाबला करने वाली दूसरी कंपनियों के उत्पादों में 85 से 90 फीसद तक चिकन पाया गया. चिकन सैंडविच में अक्सर मैरीनेटेड और प्रॉसेस्ड चिकन भी मिला हुआ था. यूनीवर्सिटी ने वेंडीज़, मैक्डोनाल्ड, एऐंड डब्ल्यू और टिम हॉर्टन के चिकन सैंडविच की भी पड़ताल की थी.

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खाने से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि ये कंपनियां चिकन को काफी हेर-फेर करके पेश करती हैं. जैसे कि एक गुलाबी रंग का चिकन होता है. ये सब मांस के छोटे टुकड़े होते हैं. कई बार तो मांस को कूट-पीसकर इस्तेमाल किया जाता है. मांस में कई केमिकल मिलाए जाते हैं. जैसे कि मोनोसोडियम ग्लूकोमेट. जिससे दिमाग पर बुरा असर पड़ता है. इसके अलावा सोया प्रोटीन भी मांस में ये कंपनियां मिला देती हैं. मकसद होता है कि ये ज्यादा दिन तक चले और इसका स्वाद भी बेहतर लगे.

chicken processing

स्वयंसेवी संस्था फूडुकेट के मुताबिक चिकन को हड्डियों से अलग करके इसे एक छलनी से बहुत दबाव डालकर गुजारा जाता है. इससे चिकन का स्वाद इतना खराब हो जाता है कि इसे खाने लायक बनाने के लिए तरह-तरह के केमिकल मिलाए जाते हैं. फिर इसमें रंग भी मिलाया जाता है. इसमें मांस के इस पेस्ट में कीटाणु भी बहुत होते हैं, तो इसे अमोनिया में डुबोया जाता है ताकि सारे बैक्टीरिया मर जाएं. इस के बाद तैयार हुए चिकन के टुकड़ों को तमाम तरह की चीजों में इस्तेमाल किया जाता है.

मशीनी चिकन या गुलाबी कीचड़

चिकन को किस तरह से प्रॉसेस किया जाता है? आज की तारीख में तकनीक ने इतनी तरक्की कर ली है कि तमाम तरह की केमिकल प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद चिकन ताजा सा दिखता है. इसमें पानी मिलाकर इसे ताजा जैसा दिखने लायक बनाया जाता है. जबकि असल में ये केवल 51 फीसद मांस होता है. यही प्लास्टिक जैसा कारखानों में तैयार चिकन बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में जाता है. चाइनीज खानों में इस्तेमाल होता है. सबवे जैसी कंपनियां भी ये मशीनी चिकन इस्तेमाल करती हैं. इसमें तरह-तरह के सॉस और ड्रेसिंग मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है.

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कीचड़ जैसा ये मांस बड़ी-बड़ी दुकानों से लेकर सुपरमार्केट तक में बेचा जाता है. सॉसेज, सलामी, लंच के लिए मांस, चिकन नगेट्स और बर्गर में यही इस्तेमाल होता है. इसे अक्सर ताजा दिखने वाले चिकन के टुकड़ों के आकार में ढाल लिया जाता है, ताकि ग्राहक को कोई शक न हो. इस मिलावटी चिकन में असल में केवल 60 फीसद चिकन होता है. बाकी हिस्सा कॉर्न स्टार्च, गेहूं का आटा और पुरानी ब्रेड मिला हुआ होता है. बर्गर में ब्रेड का चूरा, कसावा, आलू और चावल मिला मीट इस्तेमाल होता है. अक्सर इसमें सोया प्रोटीन मिलाया जाता है.

आप टीवी पर अक्सर टेक्सचर्ड वेजीटेबल प्रोटीन के विज्ञापन देखते होंगे. बताया जाता है कि ये मांस का बिल्कुल सटीक विकल्प है. लेकिन सच्चाई इसके उलट है. अक्सर इस प्रोटीन में सुअर का मांस, जिलेटिन और चमड़ा पिघलाकर निकाला गया प्रोटीन मिला होता है.

chicken nuggets

इसी तरह सॉसेज भी खूब इस्तेमाल होती है. इन्हें ताजा या फ्रोजेन बताकर बेचा जाता है. इसे ग्राहक घर लेजाकर गर्म करके खाते हैं. इसमें अक्सर 60 फीसद तक जानवरों की पेशियां, 15 फीसद पानी और बाकी दूसरे केमिकल मिले होते हैं. बड़े कारखानों में निकाले गए चिकन में 20 फीसद तक फैट होती है, जो सीधे आप की धमनियों में जाती है.

मिलावट के नाम पर कुछ भी

ब्रिटेन के लीसेस्टरशायर के प्रशासन को एक ग्राहक ने चिकन नगेट को लेकर शिकायत की. इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने करीब 17 दुकानों से 21 नमूने लेकर जांच की. एक तिहाई नमूनों में उत्पाद के बारे में गलत लेबल लगाकर जानकारी दी गई थी. एक पैकेट ऐसा था जिसमें दावे से 30 फीसद कम, कुल 16 प्रतिशत मांस ही पाया गया. ये किस ब्रांड के थे, ये तो लीसेस्टरशायर प्रशासन ने नहीं बताया. सबसे ज्यादा धोखेबाजी करने वाले को भी केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया. बाद में हुए नमूनों की जांच से पता चला है कि वो दुकानदार अब भी वैसा ही चिकन नगेट बेच रहा है.

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भारतीय ब्रांड वेंकी अब अपने उत्पादों में मीट की तादाद बताकर बेचता है. जैसे चिकन फ्रैंक में केवल 70 फीसद मांस होता है. वहीं, चिकन लॉलीपॉप में केवल 30 प्रतिशत और मीटबॉल में 60 फीसद मांस होता है. चिकन सलामी में 55 प्रतिशत और मुर्ग मसाला में केवल 30 फीसद तादाद चिकन की होती है.

कहने का मतलब ये कि जब आप चिकन को पीस कर उससे माल तैयार करते हैं, तो उसके बाद उसमें कुछ भी मिलाया जा सकता है. सुअर के मांस से लेकर मुर्दा जानवरों की लाशों से निकाला गया प्रोटीन तक इस्तेमाल होता है. एंटीबायोटिक और केमिकल भी तैयार मांस में मिलाए जाते हैं. चिकन में दूसरे जानवरों के मांस के टुकड़े भी मिले हो सकते हैं.

हाल ही में इंग्लैंड में हॉलैंड से आए चिकन में सुअर का मांस मिला हुआ पाया गया था. इसे हलाल कहकर ब्रिटेन में बेचा जा रहा था. छह महीने बाद आयरलैंड में इसी मांस की पड़ताल हुई तो पता चला कि इसमें तो गाय का मांस मिला था. हॉलैंड से आए मांस के 17 नमूनों में दूसरे जानवरों का मांस मिला हुआ पाया गया.

मांस बेचने वाली कई कंपनियां अब मिलावट के लिए नई तकनीक इस्तेमाल कर रही हैं. ऊंचे तापमान पर पुराने जानवरों के शरीर से प्रोटीन निकालकर उसे मांस में मिलाया जाता है. इसके अलावा जानवरों के चमड़े, पंख, हड्डियां तक चिकन में मिलाकर पीस दी जाती हैं. फिर उन्हें ताजा मांस कहकर बेचा जाता है.

मैक्डोनाल्ड पर लोगों को एक साल पहले एक्सपायर हुए मांस से बनी चीजें बेचने का आरोप है. इसी तरह केएफसी और पिज्जा हट चलाने वाले यम ब्रांड पर भी आरोप लगे हैं. शंघाई हुसी फूड कंपनी एक साल पहले एक्सपायर हो चुके चिकन बेच रही थी. शंघाई हुसी कंपनी के बारे में ये बात सामने आई थी कि वो खराब मांस के टुकड़ों को जमीन से भी उठाकर मशीन में फेंक देते हैं. ये कूट-पीसकर ताजा मांस के तौर पर तैयार करके बेची जाती है.

इसी तरह मैक्नगेट्स को भी खराब होने के बावजूद बार-बार नए सिरे से बेचने की कोशिश की गई. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मांस के कारोबार से जुड़े लोग ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहते हैं. मांस ऐसे ही नुकसानदेह होता है. लेकिन ऐसा मिलावटी मांस खाना तो जहर खाने जैसा है. तो क्या आप वो गुलाबी कीचड़ अपने बच्चों को खिलाना चाहेंगे?

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