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राजा रवि वर्मा: वो पेंटर जिसने हिंदू धर्म को उसकी शक्ल दी

राजा रवि वर्मा ने विक्टोरियन पेंटिंग्स की थीम पर भारतीय पौराणिक चरित्रों की तस्वीरें बनानी शुरू कीं.

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Oct 02, 2017 09:53 AM IST

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राजा रवि वर्मा: वो पेंटर जिसने हिंदू धर्म को उसकी शक्ल दी

राजा रवि वर्मा के बारे में मोटा-मोटी अवधारणा यही है कि उन्होंने भारतीय देवी देवताओं, पौराणिक कथाओं और चरित्रों की पेंटिंग्स बनाईं. कुछ एक पौराणिक किरदारों की न्यूड पेंटिंग्स बनाने के कारण विवादों मे भी पड़े.

उनकी कथित प्रेमिका और कई पेंटिंग्स में मॉडल सुगंधा ने आत्महत्या कर ली. जिसकी कहानी पर केतन मेहता ने रंगरसिया फिल्म बनाई थी. मगर राजा रवि वर्मा इससे कहीं ज़्यादा हैं. कहीं ज्यादा विस्तृत, कहीं ज़्यादा समझे जाने लायक और कही ज्यादा विवादास्पद.

नीले कृष्ण से भीगती हिरोइन तक

राजा रवि वर्मा ने विक्टोरियन पेंटिंग्स की थीम पर भारतीय पौराणिक चरित्रों की तस्वीरें बनानी शुरू कीं. आम धारणा है कि वो ऐसा करने वाले पहले और अपने समय के इकलौते पेंटर थे. मगर ऐसा नहीं है. 2012 में दिल्ली आर्ट गैलरी में रवि वर्मा को पेंटिंग की शुरुआती तालीम देने वाले एम पिल्लई की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी थी.

पिल्लई और उनके जैसे कई और लोगो ने भी शकुंतला, कृष्ण जैसे किरदारों को पश्चिमी शैली में पेंट करने का प्रयास किया था मगर रवि वर्मा जितनी सफलता नहीं पा सके. रवि वर्मा का एक सीधा असर हमारी संस्कृति पर आज भी दिखता है.

ravi verma

विक्टोरियन शैली की उनकी पेंटिंग्स में सांवले रंग के विष्णु और कृष्ण के लिए नीला रंग इस्तेमाल किया गया. आज सांवले माने जानेवाले कृष्ण के नीले रंग से हम इतना सहज हो गए हैं कि कैलेंडर, पौराणिक सीरियल और मॉर्डन पेंटिंग्स में भी कृष्ण के नीले रंग से ही रिलेट करते हैं.

रवि वर्मा की सफलता का सबसे बड़ा कारण है उनकी विस्तृत कल्पनाशीलता. उनकी पेंटिग्स में देवी देवताओं के कपड़े और गहने देखिए. कहीं से नहीं लगेगा कि किसी दक्षिण भारतीय महिला को महज कांजीवरम पहने देख रहे हैं.

इसके अलावा उनकी जिन तस्वीरों में पौराणिक चरित्र नहीं है उनका भी एक अलग ग्रेस है. खासतौर पर उन्होंने शरीर पर पड़ती रौशनी को जिस तरह से पेंट किया है वो अद्भुत है.

सफेद साड़ी में भीगती, नहाती हिरोइन राजकपूर, सुभाष घई और यश चोपड़ा जैसे तमाम फिल्ममेकर्स का पसंदीदा ऑबजेक्ट रही है. रवि वर्मा के कलेक्शन में ऐसी पेंटिंग्स की बड़ी गिनती है जिनमें सफेद कपड़ों में भीगी हुई सुंदरी को चित्रित किया गया है.

रवि की इस स्टाइल को उनके कुछ ही साल बाद हुए पेंटर हेमेन मजूमदार और एसजी सिंह ठाकुर ने अपनी-अपनी तरह से आगे बढ़ाया और काफी हिट हुए.

राष्ट्रवाद, सिनेमा और प्रिंटिंग प्रेस

राजा रवि वर्मा अपने केरल से बंबई शिफ्ट हो गए थे. वहां उन्होंने अपनी पेंटिंग्स को लिथोग्राफ पर प्रिंट करने के लिए प्रेस की शुरुआत की. ये हिंदुस्तान में इस तरह का पहला काम था. इससे जाति और धर्म के छुआ-छूत मंदिरों में प्रवेश न कर सकने वाले लोग भी भगवान को अपने पास रख सकते थे.

इस काम ने न सिर्फ रवि वर्मा को प्रसिद्ध बनाया बल्कि लोकमान्य तिलक, विवेकानंद जैसे तमाम बड़े नेता भी उनके स्टूडियो में आते जाते थे. रवि वर्मा की पेंटिंग्स और उनके प्रिंट ने आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे लोगों के दिमाग में भारत की प्राचीन भव्यता की बात बैठाई.

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इस देश के कभी सोने की चिड़िया होने की बात का सचित्र वर्णन दिखाया. रवि वर्मा स्कूल की पेंटिंग्स के साथ आज भी गीता प्रेस जैसे प्रकाशन इस अवधारणा को लोगों के बीच बना बैठा रहे हैं.

रवि वर्मा ने अपने साथ काम करने वाले एक लड़के को एक नए काम के लिए प्रेरित किया. लड़के का नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के. जिन्हें आज हम दादा साहब फाल्के के नाम से जानते हैं. और वो नया काम था फिल्म बनाना. दादा साहब अक्सर कहते थे कि रवि वर्मा की पौराणिक पेंटिंग्स से ही उन्हें ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाने की प्रेरणा मिली.

रवि वर्मा की प्रिंटिंग प्रेस एक समय तक खूब चली मगर बाद में उनकी खराब सेहत और दूसरी वजहों से घाटे में जाने लगी. तब उन्होंने और उनके भाई राजा वर्मा ने ये प्रेस बेच दी. बाद में इस प्रेस में आग लग गई जिससे प्रेस और रवि वर्मा का बहुत सा काम नष्ट हो गया.

माना जाता है कि देवी-देवताओं के चित्र (खास तौर पर न्यूड्स) बनाने से नाराज हिंदु कट्टरपंथियों ने प्रेस में आग लगा दी थी. वैसे उस दौर में रवि वर्मा राजा महाराजाओं के पोट्रेट भी बनाते थे. एक पोट्रेट बनाने की उनकी औसत फीस 1800 रुपए थी.

ये रकम उस दौर में कितनी ज़्यादा थी इसका अंदाज़ा आप इससे लगा सकते हैं कि रवि वर्मा ने तभी अपने स्टूडियो के लिए बंबई के गोरेगांव में जमीन खरीदी थी जिसकी कीमत 250 रुपए एकड़ थी.

आलोचना और विवाद

रवि वर्मा के ईस्ट और वेस्ट को मिलाने के प्रयोग की कला समीक्षकों ने जमकर आलोचना की. रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा कि रवि के चित्रों में महिलाओं के शरीर का अनुपात सही नहीं है. वहीं एक तबके ने उन्हें भारत की सच्चाई न दिखाकर झूठे दिखावे पेंट करने वाला बनाया.

कई लोगों का मानना था कि रवि की सिर्फ वही पेंटिंग बिकती हैं जिनमें धार्मिक चित्र होते हैं. रवि वर्मा के टैलेंट से ज़्यादा धर्म के कारण उनके चित्र पसंद किए जाते हैं. इन सबसे ज़्यादा विवाद रवि वर्मा की न्यूड पेंटिंग्स ने खड़ा किया.

उन्होंने उर्वशी और मेनका जैसी अप्सराओं के साथ-साथ इंद्र की पत्नी शचि से जुड़ी उन पौराणिक कहानियों को पेंट किया जिनमें नग्नता आती है. साथ ही उन्होंने इन्हीं चित्रों के लिए इस्तेमाल की गई मॉडल को सामान्य महिला के रूप में इरॉटिक तरीके से पेंट किया.

आप को याद दिला दें कि वो ये काम 1870-1900 के बीच कर रहे थे. एमएफ हुसैन के विवाद को याद करते हुए कल्पना कर लीजिए कि रवि वर्मा को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा.

विरासत और परिवार

रवि वर्मा त्रावणकोर के जिस राजपरिवार से थे वहां मातृसत्ता थी. उनकी पत्नी रानी की सगी छोटी बहन थी. परंपरा के अनुसार रवि को घर मे आराम ही करते रहना था. इसी के चलते पति-पत्नी में कभी बनी नहीं.

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रवि का रसिक मिजाज, अपनी नौकरानी और मॉडल कादंबनी से नजदीकियां भी एक वजह थी. रवि की पोती को महारानी ने गोद ले लिया और त्रावणकोर की अगली रानी बनाया. नई रानी ने अपने 16वें जनमदिन पर राजघराने के वारिस को जन्म दिया.

रवि के भाई राजा राजा वर्मा भी पेंटर थे. उन्होंने अपना करियर रवि के लिए छोड़ दिया. राजा रवि की तस्वीरों में बैकग्राउंड पेंट करते साथ ही सेक्रेट्री का काम भी करते. राजा की डायरी में रवि की कई पेंटिंग्स को पूरा करने की जानकारी मिलती है.

इसके अलावा रवि वर्मा के परिवार की वारिस रुक्मिनी वर्मा भी पेंटिग में सक्रिय हैं. रवि वर्मा की शैली को आगे बढ़ाते हुए पौराणिक कथाओं की सेमीन्यूड पेंटिग बनाने के कारण उनकी तस्वीरों पर भी विवाद हो चुके हैं. इसीलिए अब वो प्रदर्शनियों की जगह प्राइवेट कलेक्टर्स के लिए ही पेंटिंग बनाती हैं.

रवि वर्मा की पेंटिंग्स में मॉर्डन आर्ट्स का क्यूबिज्म, बिना आंखों वाले चेहरे या ज्यामितीय फिगर नहीं हैं. न उनकी पेंटिंग्स में बंगाल स्कूल की तरह से रंगों का प्रयोग या कंटेप्ररी आर्ट का कोई छिपा हुई रहस्य होता है. फिर भी उनकी बिलकुल फ्लैट डायनमिक्स वाली पेंटिंग्स ने हिंदुस्तान की पौराणिक परंपरा को एक अलग शक्ल दी है.

उनके पहले की तंजौर कला की सरस्वती की मूर्ति या पेंटिंग, राजस्थानी चित्रकला सब गुजरे जमाने की चीज लगती हैं. रवि वर्मा भारतीय पेंटिंग में मानसून की तरह आए जिन्होंने अपनी धारा में सब कुछ बहा कर फिर नया सृजन किया.

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