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क्यों न करें हम फेमिनिज्म की बात ?

लड़कियां सज संवर कर बाहर निकलती हैं लड़कों को इम्प्रेश करने के लिए और लड़के...?

Nidhi Nidhi Updated On: Jan 07, 2017 08:58 AM IST

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क्यों न करें हम फेमिनिज्म की बात ?

बेंगलुरू में न्यू इयर इव पर मॉब मोलेस्टेशन की सीसीटीवी फुटेज सामने आने पर पिछले साल बिल्कुल इसी तरह से दिल्ली के हौज खास विलेज की घटना याद आती है.

मेरी दोस्त पार्टी अटेंड कर रही थी, देर रात होते-होते पब से बाहर सड़क तक भीड़ बहुत तेजी से बढ़ने लगी और उनलोगों ने वहां से निकलने की सोची. तब तक पार्टी और म्यूजिक के शोर में अग्रेसिव भीड़ ने कई लड़कियों के साथ बदतमीजी करनी शुरू कर दी.

लड़कियां वैसे ही चिल्ला रही थी. वो लड़की वहां से किसी तरह बच कर निकली लेकिन उस घटना की कोई खबर या चर्चा तक भी बाद में सुनने को नहीं मिली.

आप लिखिए इन फेमिनिस्ट महिलाओं के खिलाफ. आप कहिए ये हर बात में महिला विमर्श घुसेड़ते हैं.

आखिर छोटे कपड़े पहनने को फेमिनिज्म से कैसे जोड़ती हैं, लड़कियां सज संवर कर बाहर निकलती हैं लड़कों को इम्प्रेश करने के लिए और लड़के...?

जी, मैं और हमारी जैसी कई लड़कियां हैं जिन्हें छोटे कपड़ों में फेमिनिज्म नहीं दिखता. लेकिन आप जरा कल्पना करें या बता दें कभी कोई ऐसी बात रिकॉर्ड में आई हो, जिसमें सुबह-सुबह शॉर्ट्स और स्लीवलेस टीशर्ट में दौड़ते हुए आज तक किसी लड़के को स्कूटी से गुजरती लड़की उसके विशेष अंग पर पैर मारती हुई गुजरी हो?

लड़कियों पर इंप्रेशन जमाना

हम कह सकते हैं कि आप जिम जाकर बॉडी बनाते हैं तो किसलिए लड़कियों पर इम्प्रेशन जमाने के लिए न... तो बताइए कितनी बार राह चलते, बस में आपको खुद से नफरत हो जाने की हद तक घूरा गया हो...

लड़कियों के ब्रा की स्ट्रीप दिख जाए तो इनविटेशन समझ लिया, हमें आपके लो वेस्ट जीन्स से झलकता कुछ दिखता है तो हम नजर फेर लेते हैं...

क्यों न लाएं फेमिनिज्म हर बात पर. दिक्कत तो दरअसल यही है कि हम हर बात पर फेमिनिज्म नहीं लाते.

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कई नेताओं ने इस घटना के बाद लड़कियों को दोषी माना

ऑब्जेक्ट पर इंप्रेशन जमाने और इसे डैमेज करने की सोच में फर्क है. जिसका सामना हमें चलते फिरते करना पड़ता है. ऐसी घटनाएं जो आम तौर पर घटनाएं नहीं रह जाती हैं बल्कि लड़कियों के जीवन का एक चलता फिरता हिस्सा बन गई हैं.

शाम को कमरे पर वापस लौटते हुए दरवाजे को जल्दी में लगाया और व्यस्त हो गयी, अभी सोते वक्त हर रोज वाले नियमानुसार दरवाजे, खिड़कियां ठीक से बन्द हैं कि नहीं देखा तो, दरवाजा खुला रह गया था.

सच...मैं ठिठकी हुई गेट पकड़े सेकंड भर को खड़ी रही, 'ऐसी गलती हो कैसे गयी मुझसे, इतनी देर तक दरवाजा खुला था?'

क्या कभी कोई लड़का कमरे का दरवाजा खुला रह जाने को खुद से हुई बड़ी भूल में शामिल करता होगा ...?

मोलेस्टेशन की खबर

बात 2012 की ही है.

मैं पटना में थी, कॉलेज के बाद शाम को कोचिंग रहती थी मेरी.

वापस आते हुए 9:30 बज जाते थे. 9:30 बजे का मतलब पटना के लिए सारी दुकानें, मार्केट बन्द हो जाते हैं. सड़कों की भीड़ में लड़कियों की संख्या बिल्कुल गिनती भर की होती है. तभी गुवाहाटी से एक मोलेस्टेशन की खबर आई और दूसरे दिन घर से बोल दिया गया 'शाम वाली क्लास छोड़ दो, देख लो अगर दिन में संभव है तो.'

Bangalore-Molestation

इस सामुहिक हमले के दौरान पुलिस भी वहां मौजूद थी

मैंने सर से मॉर्निंग बैच की बात की लेकिन उनकी क्लास सिर्फ इवनिंग में थी इसलिए मुझे कोचिंग छोड़नी पड़ी. 'डर' दरअसल मेरे भी मन में उतना ही था जितना घर वालों के...

क्या किसी लड़के को चोरी, लूट-खसोट के डर से कभी अपनी क्लास छोड़नी पड़ी होगी?

आज से दो-तीन साल पहले हम तीन दोस्त 2:30 से 3:00 बजे के समय मार्केट से लौट रहे थे.

हम सब आपस में हंसते बात करते हुए आ रहे थे, हॉस्टल के करीब काफी व्यस्त इलाका, चलती-फिरती भीड़ थी.

तभी हमारे बगल से गुजरते बाइक पर दो लड़कों में पीछे बैठा हुआ लड़का एक लड़की की कमर पर जोर की हाथ मारता हुआ साथ में हूऊऊ कर चिल्लाता हुआ निकला.

हम दो लड़कियां बात करती हुई थोड़ी आगे निकल गयीं थी पीछे पलट कर देखा तो वो वहीं खड़ी है, मेरे पूछने पर 'क्या हुआ?'

महिलाओं के प्रति हमले पर अक्सर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं पर बदलाव नहीं आया

महिलाओं के प्रति हमले पर अक्सर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं पर बदलाव नहीं आया

तभी मेरी दोस्त ने पूछा 'पड़ी क्या?'

उसने अजीब आश्चर्य के साथ बोला 'हां, पता नहीं कौन थे?'

और दोस्त ने हंसते हुए 'अरे आपके साथ पहली बार हुआ है, मेरे साथ तो कई बार, क्या करें ये ऐसे ही लोग हैं.'

उस लड़की की बात में सहजता थी जिसने इस बात को स्वीकार लिया था कि ऐसा होता है.

इस तरह के अनुभव किसी भी लड़की के रेग्युलर लाइफ में होने वाली घटनाओं का है जिनका छोटे कपड़े, शो-ऑफ से तो बिल्कुल नहीं है.

नेचुरली एक्सेप्टेंस के साथ क्या लड़कों को अपने ऑब्जेक्ट की तरफ से इस तरह की किसी हरक़त को भी सहज स्वीकार्यता मिली होगी?

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