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बनारस डायरी: कभी गोरों की डॉल मार्केट, अब बाजार की रौनक

नाम से इसे अक्सर लोग दाल की मंडी समझ लेते हैं पर ऐसा नहीं है कि ये कोई दाल की मंडी रही हो

Tabassum Kausar Updated On: Jun 24, 2017 06:02 PM IST

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बनारस डायरी: कभी गोरों की डॉल मार्केट, अब बाजार की रौनक

वो ब्रिटिश हुकूमत का दौर था, शहर सोने को होता था तो दालमंडी की गलियां जग जाती थीं. घुंघरूओं के बीच नाचती तवायफें, कलाकारों की दुनिया थी ये. खूबसूरत तवायफों को देखकर ही शायद गोरों ने इसे नाम दिया था डॉल मार्केट.

यहां कोई भी बेहिचक-बेझिझक आ जा सकता था. वक्त बीता, तवायफों को वहां से निकाल दिया गया लेकिन रवायतें कोने में छुप गईं और जब पत्थरों से बनी कोठियों और लकड़ी की बनी खिड़कियों से वो रवायतें बाहर आ गईं, तब बनी दालमंडी. रवायतें थी, तो बदलती कैसे, नहीं बदलीं. बस बदला तो सामान.

आज ये दालमंडी पूर्वांचल का सबसे बड़ा बाजार बन गया है. किसी भी धर्म का उत्सव हो, त्योहार हो, दालमंडी उसी रंग में रंग जाती है. यहां होली का गुलाल है तो ईद की सेवइयां भी, दीवाली के झालर हैं तो बकरीद की बिरयानी चावल भी. यही खूबी है इस बाजार की, लाख रूपये भी कम पड़ जाएं और सौ रूपये में भी कुछ बचा लाएं आप. ऐसी ही है दालमंडी.

दालमंडी हर धर्म के रंग में रंग जाती है

नाम से इसे अक्सर लोग दाल की मंडी भी समझने का भ्रम करते हैं. नाम भले ही इसका दालमंडी है, लेकिन ऐसा नहीं कि ये कोई दाल की मंडी रही हो. अलबत्ता यह पूर्वांचल का सबसे बड़ा बाजार जरूर बन गया है.

इसकी खासियत है हर धर्म-मजहब का रंग ओढ़ लेना. यहां असलम की दुकान पर होली की पिचकारी है तो रमेश की नमाजी टोपियों की दुकान भी. कहते भी हैं- पूर्वांचल में कोई त्योहार दालमंडी की गलियों के बिना पूरे नहीं होते. चाहे वो दीवाली हो या ईद-बकरीद.

कभी तवायफों की कोठियों के छोटे-छोटे दरवाजे हर किसी के लिए खुलते थे, आज ये दरवाजे संकरी गलियों की शक्ल ले चुके हैं.

रमजान की रौनक से दमक रही दालमंडी

रमजान का पाक महीना चल रहा है. इस वक्त तो इस बाजार की रौनक देखते ही बनती है. जिस तरह दिल्ली के मीना बाजार और चांदनी चौक की रौनक होती है, उससे कहीं से भी कम यहां की रौनक नहीं. ईद के लिए यहां किसके लिए क्या कुछ नहीं मिलता. किसकी जरूरतें यहां आकर पूरी नहीं होती.

दालमंडी पूर्वांचल के लिए किसी दिल्ली-मुंबई के बाजार से कम नहीं. वो कहते हैं ना कि रमजान रहमतों और बरकतों का महीना है तो इस महीने अल्लाह की रहमत और नूर इस बाजार पर टूट कर बरसती है. शहर के बीचों-बीच बसा ये बाजार सुबह गुलजार होना शुरू होता है और देर रात तक दालमंडी की गलियां यूं ही रौशन रहती हैं.

रमजान और ईद की खरीदारी के लिए पूर्वांचल भर से लोग दालमंडी आते हैं. फैशनेबल कपडों से लेकर ज्वेलरी, जूते सैंडल की अनगिनत अस्थाई दुकानें यहां रमजान में सज जाती हैं. सहरी और इफ्तार के लजीज पकवानों की खुशबू भी इस संकरी गली में जान भर देती है.

अरब और ईरान के खजूर और बनारस की सेवईयां

ईद रमजान का जिक्र हो और मीठी सेवइयां जेहन में न आएं, नामुमकिन है. बनारस की सेवइयों का तो कोई जवाब नहीं. एक दौर था जब यहां छतों पर लच्छे के लच्छे सेवइयां सुखाई जाती थीं.

अब वो दौर नहीं लेकिन हां, पूर्वांचल के सबसे बड़े सेवइयों के मार्केट के नाम से भी दालमंडी मशहूर है. यहां बारहों महीने सेवइयां मिलती हैं. मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों से लोग यहां आकर सेवई लेकर जाते हैं. सेवई के अलावा इन दिनों अरब, ईरान, ओमान के रसीले खजूर भी इन गलियों की शान बने हुए हैं.

दूधफेनी से लेकर बाकरखानी का जायका एक बार जुबान को लग जाए तो भुलाए नहीं भूलता. ये भी खास है कि बाकरखानी यहां सिर्फ रमजान के महीने में ही आपको मिलेगी. अन्य दिनों में ढूंढे नहीं मिलेगी.

गुलाल का चढ़ता है रंग, दीवाली की होती रोशनी

ऐसा नहीं कि ये नजारा सिर्फ रमजान के दौरान ही दिखता है. त्योहार चाहे जो हो, गलियों का ये बाजार उसमें ही रंग जाता है. होली का त्योहार हो तो यहां कौन सा रंग गुलाल नहीं मिलता, किस ब्रांड की पिचकारी नहीं मिलती. यही हाल दीवाली का भी है.

होम फर्निशिंग से लेकर लेटेस्ट फैशन के कपड़ों का पूरा बाजार. सहालग की तो बात ही क्या. दुल्हन के साज-शृंगार, कॉस्मेटिक तक. पूर्वांचल का सबसे बड़ा कास्मेटिक बाजार दालमंडी ही है. जितनी भीड़ किसी मॉल या शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में नहीं, उससे कहीं ज्यादा महिलाओं की भीड़ यहां के होलसेल कॉस्मेटिक्स की दुकान पर होती है.

मोबाइल और इलेक्ट्रिकल गुड्स का भी ये बड़ा हब है. पूर्वांचल का सबसे बड़ा और सस्ता मार्केट होने की वजह से ही इन संकरी गलियों में साल के 350 दिन एक जैसा ही नजारा होता है।

साहित्य और कला भी परवान चढ़े इन गलियों में

चाहे फारसी उर्दू के मशहूर फनकार मिर्जा गालिब रहे हों या फिर उर्दू के शेक्सपियर कहे जाने वाले आगा हश्र काश्मीरी, शेर-ओ-अदब के इस मरकज दालमंडी में इन सबका कभी ना कभी दौर रहा है. कभी मिजा गालिब की शायरी यहां परवान चढ़ी तो कभी आगा हश्र काश्मीरी की.

उर्दू के पहले सॉनेट शायर डॉ नाजिम जाफरी जैसी शख्सियतों के नाम से भी ये इलाका मशहूर है. और तो और उस्ताद बिस्मिल्ला खां को कैसे भुलाया जा सकता है. दालमंडी की ही इन गलियों में उनकी बांसुरी की तान परवान चढ़ी. बनारस के राजवैद्य हकीम मोहम्मद जाफर के नाम पर तो यहां पर एक पूरी गली का नाम ही पड़ा है.

हालांकि दालमंडी की गलियां कई सालों से अतिक्रमण और जाम के जद में हैं. गंदगी में जीना तो अब जैसे यहां के लोगों की आदत हो गई है.

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