विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

इस्लाम लोगों के बीच भेद पैदा करता है

इस्लाम में धर्म और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता है.

Tufail Ahmad Updated On: Nov 23, 2016 08:51 AM IST

0
इस्लाम लोगों के बीच भेद पैदा करता है

13 अगस्त को तुफैल अहमद ने अपनी नई किताब 'जिहादिस्ट थ्रेट टू इंडिया: द केस फॉर इस्लामिक रिफॉर्मेशन बाई एन इंडियन मस्लिम' के लॉन्च पर एक व्याख्यान दिया. हैदराबाद में इस कार्यक्रम को सोशल कॉज ने कराया था. इस्लाम के विभिन्न पहलुओं, इस विभिन्न व्याख्याओं और धारणाओं को छूते हुए तुफैल के व्याख्यान को यहां तीन हिस्सों में पेश किया जा रहा है. यहां इसका पहला हिस्सा दिया जा रहा है-

मैं बहुत शुक्रगुजार हूं सोशल कॉज का, कि उन्होंने यह कार्यक्रम कराया. मुझे यह जानकार खुशी होती है कि पिछले एक दशक के दौरान सोशल कॉज ने हैदराबाद के लोगों की जिंदगी में बहुत समृद्ध योगदान दिया है. हैदराबाद, ऐसा शहर है जो बौद्धिक तौर पर ओटोमान दौर से लेकर आज के इस दौर तक, जिसमें इस्लामिक स्टेट या आईएस का दबदबा है, खिलाफत के वैश्विक विचार से जुड़ा रहा है. मैं शुक्रगुजार हूं डॉ. के रामचंद्रा मूर्ति (सीनियर एडिटर) का, जनाब मस्तान वली (फिल्मकार) का, सैयद जिलानी और सुधारकर राव का. आपने समय दिया और इतने अच्छे-अच्छे शब्द कहे. मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैं इस मंच पर सुल्तान शाहीन साहब के साथ हूं. उन्होंने 1970 के दशक से ही इस्लाम में सुधारों पर लिखा है. सुल्तान साहब, जानकारी बढ़ाने वाली आपके भाषण के लिए शुक्रिया.

मैं इस्लाम का कोई विद्वान नहीं हूं. लेकिन मेरी मीडिया की पृष्ठभूमि रही है, इसलिए इस्लाम से जुड़े विचार मौजूदा समय में मेरे दिमाग में घर किए रहते हैं.
विचार सकारात्मक हो या नकारात्मक, उसका भविष्य पर जरूर असर पड़ता है- आपको अच्छा लगे या न लगे. एक पत्रकार के तौर पर मैं विचारों की उस व्यापक दुनिया को परखता रहता हूं जिसमें आप और मैं रहते हैं.

इस्लाम, अलगाववाद की एक भाषा

समस्या यह है कि गैर मुसलमान आज इस बात को नहीं हजम कर पा रहे हैं कि इस्लाम में धर्म और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता है. पश्चिमी जगत के पास वैचारिक युद्धों को लड़ने का अनुभव है, सबसे हालिया युद्ध है, सोवियत समर्थित सशस्त्र साम्यवाद. लेकिन पश्चिमी दुनिया में भी लेखक और प्रोफेसर इस्लाम को सिर्फ ऐसा धर्म बताने पर जोर दे रहे हैं जो सिर्फ एक मस्जिद और किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी के आध्यात्मिक दायरे तक सीमित है. मुसलमानों के दिमाग में धर्म और राजनीति के बीच अंतर साफ नहीं है.

भारत में तो स्थिति और खराब है.

Jama_Masjid_Delhi

 

800 साल के शासन के बावजूद, ज्यादातर हिंदू इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते. लेकिन भारत की वह नई युवा आबादी एनआईटी और आईआईटी जैसे तकनीकी संस्थानों में पढ़ रही है, वह सजग है और इस्लाम को समझने के बारे में प्रोफेसरों और पत्रकारों से बौद्धिक तौर पर कहीं बेहतर हैं.
जिस विचार को हम पाकिस्तान के नाम से जानते हैं, वह उसे भी बेहतर समझते हैं. इस्लाम को विचारों के समूह, एक विचारधारा, विचारों की एक व्यवस्था, एक धर्म, एक तरह की राजनीति और विचारों के आंदोलन के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है. एक एकेश्वरवादी धर्म के तौर पर, इस्लाम गैर-मुस्लिम समाजों की मुख्याधारा से अलगाव की एक भाषा है.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव आसानी से एक कानून पास कर सकते हैं जिसके तहत बीपीएल (बेहद गरीबी स्तर वाले) परिवारों को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जाए, भले ही उनका धर्म और जाति कुछ भी हो. लेकिन वह ऐसा करेंगे नहीं. ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) के नेता असदुद्दीन औवेसी ने कहा है कि सभी इंसान मुसलमान के तौर पर पैदा हुए हैं, तो इसका मतलब है कि सारे इंसानों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिलना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है.

सिर्फ मुसलमानों की फिक्र

हिंदुओं के नजरिए से, ऐसा लगता है कि इस्लाम नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मुसलमानों के लिए कोटा मांगता है, न कि सभी गरीब भारतीयों के लिए. महाराष्ट्र और अन्य जगहों पर जमीयत उलेमा ए हिंद ने मुस्लिम कैदियों के लिए मुहिम चलाई, सभी निर्दोष कैदियों के लिए नहीं. इस्लाम एआईएमआईएम और वेलफेयर पार्टी जैसे दलों के जरिए और दलितों के सहयोग से सत्ता पर कब्जा करना चाहता है. इस्लाम केरल में ऐसे मॉल चाहता है जहां मुसलमान पुरुषों और महिलाओं के लिए नमाज पढ़ने के अलग अलग कमरे हो. हिंदू और ईसाइयों के लिए वो ऐसी मांग नहीं करता.

विचारों के एक आंदोलन के तौर पर इस्लाम की शुरुआत सातवीं सदी में मक्का से हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि अब सऊदी अरब में कोई यहूदी नहीं हैं और वहां सिनेगॉग या चर्च भी नहीं हैं. बाद में विचारों का यह आंदोलन ईरान पहुंचा, वहां इसका परिणाम ये हुआ कि वहां अब पारसी नहीं हैं. विचारों का यह आंदोलन आठवीं सदी में भारतीय उपमहाद्वीप में पहुंचा. परिणाम ये हुआ कि बलूचिस्तान में हिंदू नहीं हैं. अफगानिस्तान में हिंदू नहीं हैं, पाकिस्तान में हिंदू नहीं हैं और लाहौर में कोई सिख नहीं है जबकि वे मूल रूप से उन्हीं का शहरों के हुआ करते थे.

इस्लाम अपने लिए एक क्षेत्र चाहता है. 1947 में इसने हमारे बुजुर्गों के दिमागों को प्रभावित किया और उन्होंने इसे अपने क्षेत्र की जमीन का एक टुकड़ा दे दिया और इस तरह पाकिस्तान बना. अब यह हमारी जमीन का एक और टुकड़ा, कश्मीर हासिल करने के लिए श्रीनगर में लंबे समय से लड़ रहा है. विचारों के आंदोलन के रूप में इस्लाम हमारी ही जिंदगी में कश्मीर से पंडितों को निकालने में कामयाब रहा है. विचारों का यही आंदोलन अच्छी खासी आबादी वाले असम, कैराना, माल्दा या मल्लपुरम में देखा जा सकता है.

Supplicating_Pilgrim_at_Masjid_Al_Haram._Mecca,_Saudi_Arabia

कट्टर इस्लाम का तरीका

इस्लाम अपने लक्ष्यों को कट्टर इस्लाम के जरिए हासिल करता है. अमेरिकन हेरीटेज डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिंश लैंग्वेज में इस्लामिज्म यानी कट्टर इस्लाम को ऐसे परिभाषित किया गया है- 'इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन , नैतिक रुढ़िवाद, लिटरलइस्म और जीवन के हर पक्ष पर इस्लामी मूल्यों को लागू करने की कोशिश करता है.' इस वजह से कट्टर इस्लाम एक सांस्कृतिक और राजनीति आंदोलन है जो समाज से धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक और बहुसांस्कृतिक मूल्यों को हटाता है ताकि इस्लामी प्रभुत्व के लिए रास्ता तैयार किया जा सके.

कट्टर इस्लाम लोगों की जिंदगियों पर ऐसी धार्मिकता लागू करता है जो दिखे. कोई महिला बुर्का पहनती है तो पहने, लेकिन समस्या उस विचार से है जिसके चलते वो ऐसी ही पोशाक चुनती है. बाद में यही विचार महिलाओं की आजादी, गैर-मुसमलानों के अधिकार, व्यक्तिगत आजादी और स्वतंत्र प्रेस की बुनियादों पर चोट करते हैं. कट्टर इस्लाम एक तरीका है जिससे इस्लाम अपने लक्ष्य हासिल करता है और जिहादवाद कट्टर इस्लाम का हथियारबंद संस्करण है. एक समय, ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका की तुलना ऑक्टोपस से की थी और कहा था कि उसने दुनिया को अपनी बाहों में जकड़ रखा है. पहले तो मैं जानवरों की दुनिया से माफी मांगता हूं और फिर कहता हूं कि कट्टर इस्लाम एक अमीबा है जो खुद अपने जैसे अमीबा बनाता रहता है.

कट्टर इस्लाम और जिहादवाद का लक्ष्य है: हमारे समाजों में शरिया आधारित तौर तरीकों को लागू करना, गैर मुसलमानों का धर्मपरिवर्तन कराना, महिलाओं के लिए ड्रेस निर्धारित करना, रमजान के दौरान हिंदू मालिकों के रेस्त्रां भी बंद करना- खास करमल्लपुरम में, फैसला लेने की हमारी क्षमता को कमजोर करना और सत्ता हासिल करने के लिए चुनावों का इस्तेमाल करना. मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड, तुर्की में जस्टिस एंड डेवेलपमेंट पार्टी और गाजा में हमास ने इसी विचार को अपनाया है और वे सत्ता पर कब्जा करने के लिए चुनावों का इस्तेमाल कर सकते हैं और एक बार सत्ता में आ गए तो फिर व्यवस्था को बदल देना है. अमेरिका के साथ शांति वार्ता के दौरान अफगान तालिबान तक भी सत्ता पर कब्जा करने के लिए चुनावों के विचार की तरफ ललचाते दिखे.

(ये लेख कैसा लगा बताएं जरूर. आप हमें फेसबुक, ट्विटर और जी प्लस पर फॉलो भी कर सकते हैं.)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi