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मंगल ग्रह पर प्लॉट खरीदने जैसा है बिटकॉइन में निवेश

बिटकॉइन की अपनी कोई वैल्यू नहीं है और ना ही कोई अथॉरिटी है, लिहाजा इसमें निवेश से दूर रहना ही बेहतर है

Alok Puranik Alok Puranik Updated On: Dec 14, 2017 08:53 AM IST

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मंगल ग्रह पर प्लॉट खरीदने जैसा है बिटकॉइन में निवेश

करीब एक साल में बिटकॉइन करीब 17 गुना हो गया. करीब 17 गुना, किसी भी निवेश के लिए एक साल में 17 गुना हो जाना क्या है, यह बात उन्हें समझ में आसानी से आती है, जो दस साल में किसी शेयर के दस गुने होने को भी वरदान मानते हैं.

एक साल में 17 गुना होने का मतलब यह है कि बिटकॉइन में कुछ खास है, जो दूसरे निवेश माध्यमों में नहीं है. पर क्या एक साल में 17 गुना होनेवाले बिटकॉइन को एक ठीकठाक निवेश माध्यम माना भी जाए या नहीं, यह सवाल अलग है. भारत में नेशनल स्टाक एक्सचेंज के शेयर सूचकांक निफ्टी में बारह महीनों में करीब 28 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. यानी एक साल में निफ्टी दोगुना भी ना हुआ और बिटकॉइन 17 गुना हो लिया. कहां 17 गुना कहां 28 प्रतिशत, निफ्टी कितना निरीह दिखाई देता है.

बिटकॉइन माने क्या?

बिटकॉइन है क्या, यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. अक्सर इसे एक करेंसी के तौर पर चिन्हित किया जाता है. नहीं यह करेंसी नहीं है. करेंसी का कोई जारीकर्ता होता. करेंसी के पीछे कोई गारंटी होती है. किसी केंद्रीय बैंक की गारंटी होती है. भारतीय रुपयों के ऊपर रिजर्व बैंक का वचन लिखा होता है कि मैं धारक को इतने रुपए देने का वचन देता हूं. ऐसी कोई गारंटी बिटकॉइन के साथ नहीं जुड़ी हुई है. यानी बिटकॉइन करेंसी नहीं है.

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फिर बिटकॉइन क्या कोई संपत्ति है? जैसे शेयर या मकान या बैंक डिपॉजिट या सोना. इस सवाल की भी पड़ताल होनी चाहिए. शेयर किसी कंपनी में हिस्सेदारी होती है, किसी कंपनी में मिल्कियत का एक हिस्सा है. दुकान की कीमत बढ़ती है, तो उसकी मिल्कियत, उसके शेयर की कीमत बढ़ती है. पर बिटकॉइन किसी कंपनी का शेयर नहीं है. मकान जैसी कोई भौतिक संपत्ति यह है नहीं. बैंक डिपॉजिट यह है नहीं, कोई बैंक इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता. सोना यह है नहीं, तो यह है क्या. यह दरअसल एक तकनीक द्वारा उपजा ऐसा उत्पाद है, जिसे लेकर तरह-तरह की गलतफहमियां हो गयी हैं. सबसे बड़ी गलतफहमी यह कि इसके भाव लगातार ऊपर जाएंगे, ऊपर ही जाएंगे, हमेशा.

वैल्यू आती कहां से है

बड़ा सवाल यह है कि बिटकॉइन या शेयर किसी भी आइटम में आखिर वैल्यू आती कहां से है. क्यों कोई आइटम मूल्यवान हो उठता है. कीमत चाहे आलू की हो या शेयर का या बिटकॉइन की.

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मूल अर्थशास्त्र एक ही होता है-मांग ज्यादा होती है, आपूर्ति कम होती है. जैसे मारुति कार कंपनी के शेयर के भाव लें, करीब एक साल में इसके भाव 77 प्रतिशत बढ़ चुके हैं, वजह दिखती है मारुति का वर्तमान उज्जवल है. मारुति कंपनी के शेयर यानी मिल्कियत सीमित है. इस मिल्कियत की मांग बढ़ेगी, आपूर्ति सीमित है, तो भाव बढ़ेंगे. पर यहां कारोबार दिखाई पड़ रहा है, मुनाफा बढ़ता दिखाई पड़ रहा है.

भाव बढ़ने का एक कारण तो यह हुआ कि इसका कारोबार बढ़ेगा, इसका मुनाफा बढ़ेगा. एक और कारण होता है दुर्लभता. सोना कुछ नहीं करता, कोई धंधा नहीं करता, सिर्फ लॉकर में जाकर रखा जाता है. पर सोना दुर्लभ है आपूर्ति सुलभ नहीं है. मकान के भावों के बढ़ने के मूल में भी वही कारण है आपूर्ति सीमित है. पर बिटकॉइन की आपूर्ति को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है. कोई कुछ कंप्यूटर पहेलियां सुलझा ले, तो उसे बिटकॉइन मिल जाते हैं. इसे बिटकॉइन  माइनिंग कहते हैं.

बिटकॉइन कहां से आते हैं?

इस सवाल का जवाब यह है कि कुछ कंप्यूटर पहेलियां सुलझाकर नए बिटकॉइन मिलते हैं. फिर इनकी खरीद-फरोख्त आगे होती है. तो क्या बिटकॉइन कंप्यूटर गेम है, जिससे हासिल प्वाइंट को लोग सहेज कर रख रहे हैं इस उम्मीद में कि इनकी वैल्यू आगे बढ़ेगी. ऐसी उम्मीद बेवकूफाना भले ही हो, पर अस्वाभाविक नहीं है.

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बहुत सी वस्तुओं में वैल्यू भविष्य की उम्मीदों से आती है. जैसे कई कलाकृतियां बहुत से लोग खरीदते हैं, या तो स्टेटस के लिए या फिर इस उम्मीद में स्टेटस की चाह में इन्हे भविष्य में और कोई ज्यादा कीमत पर खरीदकर ले जाएगा. यानी कीमत बढ़ेगी. पर, मुख्यधारा का कोई निवेश माध्यम अगर कंप्यूटर गेम या कलाकृति में निवेश जैसा है, तो यह बात इसके निवेशकों को पता होनी चाहिए. पर इसके अधिकांश निवेशकों को निवेश के सारे सारे आयाम नहीं पता.

देखने की बात यह भी है कि बिटकॉइन का कोई ऐसा प्रयोग नहीं है, जैसे सोने का है, उसे पहनकर सामाजिक स्टेटस बढ़ाया जा सकता है या मकान का है, जिसमें रहा जा सकता है या शेयर का है, जिसे खरीदकर भविष्य में लाभांश हासिल किया जा सकता है. कीमत बढ़ोत्तरी हासिल की जा सकती है. बिटकॉइन ना शेयर है, ना सोना है, ना मकान है, ना करेंसी है. फिर इसके भाव आसमान क्यों छू रहे हैं.

तर्कहीन जुनून

इंसानी मनोवृत्तियों में से एक बहुत बुनियादी होती है- लालच. लालच विवेक की कब्र पर ही उगता वित्तीय जगत में बहुत कारोबार बड़े मूर्ख की उपलब्धता पर चलता है. किसी ने बिटकॉइन लिया 1000 डॉलर का उसे 11000 डॉलर में खरीदनेवाला एक और बड़ा मूर्ख मिल गया. मंगल ग्रह के प्लॉट भी खरीदे बेचे जा सकते हैं. यह सब चलता रहता है एक दिन पता लगता है कि कोई खरीददार नहीं है, और सब धड़ाम हो जाता है. 1992 में हर्षद मेहता के घोटाली दिनों में कई शेयर रातों-रात दोगुने हो रहे थे. मूर्खों को और बड़े मूर्ख मिल रहे थे, बतौर खरीददार. एक दिन सब धड़ाम हो गया.

थोड़ा सा तर्क

किसी भी चीज के भाव बढ़ने के तर्क होने चाहिए. उसकी दुर्लभता, उसकी आपूर्ति, उसकी मांग को  लेकर स्पष्टता होनी चाहिए. वरना तो कई बाबा दो मिनट में गहने दोगुने करने के वादे पर माल लेकर चंपत हो जाते हैं.

रिजर्व बैंक ने कई बार चेतावनी दी है, जिसका आशय है कि बिटकॉइन को लेकर स्पष्टता नहीं है. बिटकॉइन का कारोबार किसी भारतीय अथॉरिटी के दायरे में नहीं है. कल को अगर बिटकॉइन डूब जाता है, तो किसकी जिम्मेदारी है.

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यह कोई भौतिक संपत्ति नहीं है. सोने के भाव कम ज्यादा होते हैं, पर वह भौतिक तौर पर रहता तो है. बिटकॉइन की कोई भी ऐसी केंद्रीय अथॉरिटी नहीं है, जहां शिकायत दर्ज की जा सके. इंटरनेट ने कई तरह की लूटों के ग्लोबल कर दिया है, क्योंकि लालच एक ग्लोबल और इंसानी वृत्ति है.

जो भी निवेश एक साल में 12 प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न देने की बात करे, उसे गहराई से शक की निगाह से देखा जाना चाहिए. पर लालच शक को खत्म कर देता है. बिटकॉइन के मामले में यही हो रहा है. किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि बिटकॉइन के भाव लगातार ऊपर जाने के ठोस कारण क्या हैं, सिवाय इसके कि इसके भाव अतीत में बहुत कम समयावधि में इतने ऊपर चले गए. पर बहुत कम समय में भाव ऊपर हर्षद मेहता के घोटाली दिनों में भी गए. आगे इतिहास में दर्ज है कि कई लोग डूब गए थे.

वित्तीय इतिहास का भी वही सबक है, जो सामान्य इतिहास का है, इतिहास से हम सिर्फ यह सीखते हैं कि इतिहास से हम कुछ नहीं सीखते.

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