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वीडियोकॉन लोन मामला: ICICI की बड़ी भूल साबित होगी जांच से भागना

स्वतंत्र जांच को लेकर आईसीआईसीआई बैंक की तरफ से जो हिचकिचाहट दिखाई जा रही है, उससे बैंक के 'कॉरपोरेट गवर्नेंस सिस्टम की ताकत और बैंक द्वारा इसके पालन को लेकर संदेह पैदा हो गया है

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Apr 10, 2018 08:21 PM IST

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वीडियोकॉन लोन मामला: ICICI की बड़ी भूल साबित होगी जांच से भागना

दुनिया भर में जानीमानी रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने आईसीआईसीआई बैंक को चेतावनी जारी की है. रेटिंग एजेंसी का कहना है कि मौजूदा वीडियोकॉन विवाद में स्वतंत्र जांच को लेकर बैंक की तरफ से जो हिचकिचाहट दिखाई जा रही है, उससे आईसीआईसीआई बैंक के 'कॉरपोरेट गवर्नेंस सिस्टम की ताकत और बैंक द्वारा इसके पालन को लेकर संदेह पैदा हो गया है.'

इस मामले में पहली बार किसी बड़े और ग्लोबल स्तर के संस्थान ने औपचारिक तौर पर टिप्पणी की है. यह टिप्पणी आईसीआईसीआई बैंक के अपने पैदा किए झमेले के बारे में काफी कुछ बयां करता है. इससे यह भी जाहिर होता है कि बैंक ने इस मामले में शुरू से पारदर्शी तरीके से कदम नहीं उठाकर गड़बड़ी की और स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का स्वागत नहीं किया.

इतना ही नहीं, बैंक ने जोरदार तरीके से अपनी चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) का बचाव किया. आईसीआईसीआई की सीएमडी चंदा कोचर पर परिवारवाद की खातिर नियमों को ताक पर रखने का आरोप है. इससे इस आशंका को बल मिलता है कि आईसीआईसीआई बैंक ने वाकई में इस लोन और कोचर की संलिप्तता के बारे जानकारी छुपाई.

ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच ने जारी किया नोट

रेटिंग एजेंसी फिच ने सोमवार को एक नोट में कहा, 'आरोप वीडियोकॉन ग्रुप को 50 करोड़ डॉलर के लोन से जुड़ा है, जिसके प्रमुख (नियंत्रक) शेयरधारक या हिस्सेदार ने आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ के पति के साथ मिलकर एक अलग कंपनी बनाई.

उसके बाद से बैंक के इस लोन का एक बड़ा हिस्सा एनपीए बन चुका है. आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड ने किसी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है. बैंक के बोर्ड का यह भी कहना है कि बैंक के क्रेडिट मानकों को ध्यान में रखते हुए लोन को अंडरराइट (एक तरह से हटा देना) किया गया और इसका दायरा 20 से भी ज्यादा बैंकों के कंसोर्शियम के हिस्से के तौर पर बढ़ाया गया.

बैंक ने बार-बार कहा है कि उसने कंसोर्शियम से बाहर किसी बॉरोअर ग्रुप को किसी तरह का लोन नहीं दिया. बहरहाल, रेटिंग एजेंसी को लगता है कि इस क्रेडिट कमेटी में आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ की मौजूदगी और स्वतंत्र जांच के समर्थन को लेकर बैंक की अनिच्छा के कारण इसके कॉरपोरेट गवर्नेंस सिस्टम की ताकत और इसके चलन को लेकर संदेह पैदा हुआ.'

प्राइवेट बैंक की साख को लेकर भी उठे सवाल

अपने इस बयान के बाद रेटिंग एजेंसी ने तीन अहम टिप्पणियां/बयान जारी किए है- पहला यह है कि प्राइवेट बैंकों में कॉरपोरेट गवर्नेंस आमतौर पर सरकारी बैंकों से मजबूत होता है और इसकी वजह प्राइवेट बैंकों का बेहतर ढांचा है. हालांकि, अगर जांच में आईसीआईसीआई बैंक की तरफ से गड़बड़ी किए जाने का खुलासा होता है, तो प्राइवेट बैंक में कॉरपोरेट गवर्नेंस सिस्टम बेहतर होने की मान्यता को लेकर सवाल उठ सकते हैं.

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दूसरी बात यह कि जांच से आईसीआईसीआई बैंक पर निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है. ऐसे में बैंक के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ सकती है और बेहद खराब परिस्थिति में बैंक की लिक्विडिटी यानी कैश क्षमता पर भी बुरा असर पड़ सकता है.

रेटिंग एजेंसी ने तीसरे प्वाइंट में कहा है कि अगर आईसीआईसीआई बैंक की साख और वित्तीय प्रोफाइल से जुड़ा जोखिम काफी बढ़ जाता है, तो फिच इस बैंक की रेटिंग को लेकर उचित कार्रवाई कर सकता है.

इसका मतलब यह है कि बैंक की रेटिंग की समीक्षा कर इसे डाउनग्रेड किया जा सकता है. ये टिप्पणियां/चेतावनी मामले को लेकर रेटिंग एजेंसी और अन्य का नजरिया पूरी तरह से साफ कर देती हैं. यहां सवाल कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों के बेहद अहम सिद्धातों और नियमों और देश के दूसरे सबसे बड़े प्राइवेट बैंक के मैनेजमेंट और बोर्ड के कामकाज के तौर-तरीकों (बेहतर सिस्टम को लेकर) का है. मामला सिर्फ यह नहीं है कि वीडियोकॉन के एनपीए के कारण आईसीआईसीआई बैंक के वित्तीय नुकसान का आंकड़ा क्या है.

मामला सिर्फ लोन के NPA का नहीं, बल्कि कॉरपोरेट गवर्नेंस का है

जैसा कि फिच ने कहा है कि अगर आईसीआईसीआई बैंक वीडियोकॉन ग्रुप को दिया गया पूरा लोन भी राइट-ऑफ (उसे एनपीए मानकर अपनी बैलेंस शीट से एक तरह से हटा देना) कर देता, तो भी उसकी बैलेंस शीट पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. इसकी वजह बैंक के पूंजी का स्तर बेहद मजबूत होना है. आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2017 में बैंक का कोर कैपिटलाइजेशन 14.2 फीसदी था, जो इस सेक्टर में सबसे ज्यादा है.

यह बेहद हैरानी की बात है कि आईसीआईसीआई जैसा बड़ा और शानदार साख वाला बैंक इस मामले में स्वतंत्र जांच को लेकर ना-नुकुर कर रहा है. खास तौर पर ऐसी परिस्थिति में जब उसका मानना है कि वीडियोकॉन लोन डील मामले में सीईओ की तरफ से किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई.

बैंक ने इस मामले में पूरी तरह से टाल-मटोल और ढिठाई का रवैया अपना रखा है. उसने परिवारवाद को लेकर की गई गड़बड़ी संबंधी आरोपों से खुद को अलग-थलग करने के लिए तकनीक पक्षों का सहारा लिया है. मिसाल के तौर पर अविस्टा एडवाइजरी ग्रुप को लेकर आरोपों के सिलसिले में आईसीआईसीआई बैंक का कहना था कि कंपनीज एक्ट में 'रिश्तेदार' की परिभाषा के दायरे में पति के भाई को शामिल नहीं किया गया है.

हालांकि, कॉरपोरेट गवर्नेंस के ऊंचे मानकों के हित में क्या मैनेजिंग डायरेक्टर को सावधानी से कदम नहीं बढ़ाना चाहिए? क्या उन्हें बिजनेस के एक फैसले में परिवार के सदस्य के शामिल होने को लेकर बाकायदा जानकारी नहीं मुहैया करानी चाहिए? साथ ही, आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर की इस दलील पर किसी के लिए भरोसा करना मुमकिन नहीं है कि उन्हें धूत के साथ अपने पति के बिजनेस संबंधों के बारे में पता नहीं था.

कुछ तो गड़बड़ जरूर है !

वीडियोकॉन लोन के बारे में आईसीआईसीआई बैंक जिस तरह से अपनी बात कह रहा है, उसमें कई पेंच और गड़बड़ियां नजर आती हैं. पहली बात यह कि वीडियोकॉन के साथ लोन की डील सीधा सौदा थी. वीडियोकॉन की 12 कंपनियों को लोन के को-ऑब्लगॉर (सह-बाध्यताधारी) के तौर पर तैनात किया गया था. इसका मतलब यह था कि लोन के डिफॉल्ट की स्थिति में ये कंपनियां कर्ज का भुगतान करेंगी या इसकी अदायगी के लिए अपनी संपत्तियां सरेंडर करेंगी.

आईसीआईसीआई बैंक से लोन लेने के मामले में वीडियोकॉन ग्रुप ने इवान फ्रेजर जैसी कंपनियों को गारंटर की भूमिका में क्यों रखा, जो रियल्टी और ट्रेडिंग बिजनेस कंपनी के तौर पर रजिस्टर्ड थी?

एक और बात यह है कि वीडियोकॉन के को-ऑब्लगॉर का हिस्सा रहीं कंपनियों में से एक-इवान फ्रेजर का टर्नओवर रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के दस्तावेजों के मुताबिक काफी कम यानी 75 करोड़ रुपए के आसपास था. इस कंपनी पर 650 करोड़ रुपए के दायित्व की जिम्मेदारी तैयार करते हुए क्या बैंक ने फर्म की साइज और इसकी भुगतान की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा?

आईसीआईसीआई बैंक को निश्चित तौर पर वीडियोकॉन लोन मामले में इस पहलू को ध्यान में रखना चाहिए था, जो बाद में एनपीए में तब्दील हो गया. सबसे अहम बात यह कि आईसीआईसीआई बैंक की तरफ से वीडियोकॉन को दिए गए लोन को साल 2017 के आखिर में एनपीए की कैटेगरी में डाला गया.

इन सवालों का जवाब कौन देगा?

क्या बैंक ने लोन की रिकवरी के लिए वीडियोकॉन ग्रुप की तरफ से को-ऑब्लगॉर के तौर पर मुहैया कराई गई 12 फर्मों से संपर्क किया? आखिरकार इन 12 कंपनियों को इसी मकसद के लिए को-ऑब्लगॉर बनाया गया था. इन सवालों के जवाब दिए जाने की जरूरत है. इन पंक्तियों के लेखक ने अपने पहले कॉलम में भी इन मुद्दों को उठाया था.

बहरहाल, इस बात में कोई संदेह नहीं कि आईसीआईसीआई बैंक उन बैकिंग इकाइयों में है, जिसने भारतीय प्राइवेट बैंकिंग इंडस्ट्री को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है. यह वैसे चुनिंदा भारतीय बैंकों में शामिल है, जो अपनी साइज और अहम बाजारों में मौजूदगी के कारण ग्लोबल बैंकिंग परिदृश्य में बाकी बैंकों से मुकाबला कर सकता है.

आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर की एक बैंकर के तौर पर वैश्विक स्तर पर पहचान है. मुमकिन है कि वीडियोकॉन ग्रुप को दिए गए लोन के सिलसिले में कोचर पर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हों. हालांकि, इस झंझट से निकलने के लिए बैंक को पारदर्शी तरीके से काम करना होगा. इस सिलसिले में स्वतंत्र जांच में अनिच्छा या हिचकिचाहट दिखान से बैंक की साख से जुड़े सवालों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित हो रहा है. जाहिर तौर पर ग्लोबल एजेंसियों ने भी इन चीजों का का संज्ञान लेना शुरू कर दिया है.

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