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बजट 2018: यंगिस्तान की भीड़ में क्या बुजुर्गों की सुध लेगी सरकार?

युवाओं की बात करने वाली सरकार बुजुर्गों को भूलती जा रही है, क्या इस बार बजट में इन्हें जगह देंगे वित्त मंत्री

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jan 29, 2018 08:29 AM IST

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बजट 2018: यंगिस्तान की भीड़ में क्या बुजुर्गों की सुध लेगी सरकार?

तेज आर्थिक बढ़वार के बीच विज्ञापनी दुनिया ने भारत का एक नया नाम गढ़ा- ‘यंगिस्तान’. यह सिर्फ नाम भर नहीं था जो कह दें नाम में क्या रखा है. यंगिस्तान अपने आप में नए भारत या कह लें एक नई संस्कृति का प्रस्ताव था.

यह संस्कृति है जो आपको सिखाती है कि क्या कुछ जानने लायक है, क्या कुछ करने लायक है और जो कभी किया गया या अभी किया जा रहा है वह अच्छा है या बुरा-‘टू एक्ट, टू नो एंड टू जज.’ बीसवीं सदी के सबसे महान चिंतकों में एक हाना अरन्ट ने यही परिभाषा दी थी संस्कृति की.

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‘यंगिस्तान’ नाम आगे चलकर नए भारत को गढ़ने वाला एक अनौपचारिक प्रस्ताव साबित हुआ. इस नाम में एक ऐलान था कि नया भारत नौजवानों का है. बुलंद हौसलों और ऊंची उड़ान का है. इस नाम के ही अनुरूप बाद में सरकारी दस्तावेजों और विश्व के बड़े आर्थिक मंचों पर ‘नए और उभरते हुए युवा भारत की अर्थव्यवस्था’ जैसे मुहावरे गढ़े गए. और, आज ये मुहावरे इस हद तक दोहराए जाते हैं कि अब कॉमनसेंस का हिस्सा बन गये हैं- कोई उनपर सवाल ही नहीं उठाता.

यंगिस्तान के भीतर एक भारत और

भारत के लिए ‘यंगिस्तान’ नाम आबादी के आंकड़ों से झांकती उम्र की सच्चाई के हिसाब से एकदम ठीक है. भारत की 50 फीसद आबादी अभी 25 साल से कम उम्र की है. 65 फीसद भारतीयों की उम्र 35 साल या इससे कम है. अनुमानों से झांकता आशावाद तो यह तक कहता है कि पैमाना औसत का बनाएं तो साल 2020 में हर भारतीय नागरिक 29 साल की उम्र का होगा. अब ऐसे देश को यंगिस्तान ना कहा जाए तो और क्या कहा जाए !

लेकिन ‘यंगिस्तान’ भारत की आबादी की एक बड़ी सच्चाई को जाहिर करता हुआ नाम है तो एक बड़ी सच्चाई को छुपाने वाला नाम भी ! भारत की आबादी की एक बड़ी सच्चाई हैं बुजुर्ग. क्या आपने ‘यंगिस्तान’ नाम के घटाटोप को हटाकर कभी खुद से पूछा है कि देश की आबादी में बुजुर्गों की तादाद कितनी है और वे किस दशा में जी रहे हैं ?

नाम के साथ यही बड़ी दिक्कत है. किसी चीज को एक नाम दीजिए फिर वह नाम एक पहचान में तब्दील हो जाता है. पहचान के बाकी पहलू ढंक जाते हैं. यंगिस्तान नाम ने भारत की पहचान के साथ यही किया है. वर्ना ऐसा कैसे होता कि हम-आप अपने रोजमर्रा के जीवन में भूले से भी इस तथ्य का जिक्र ना करते कि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाला भारत 10 करोड़ से ज्यादा की तादाद में मौजूद बुजुर्गों (60 साल और इससे ज्यादा की उम्र के लोग) का भी देश है.

यह तादाद ब्रिटेन और फ्रांस की सम्मिलित आबादी (लगभग 12 करोड़) से थोड़ी ही कम है. लेकिन यंगिस्तान का मुहावरा हमारे मन पर इतना हावी है कि भारत के भीतर मौजूद पूरे दो मुल्कों की आबादी के बराबर लोग अदेखे रह जाते हैं. क्या कहें इस स्थिति को- खूब चमकदार दिखते भारत के भीतर का एक अदेखा भारत ?

इस अनदेखे या कह लें बिसरा दिए गए भारत के बारे में सरकार क्या सोचती है- बजट के पेश होने से तुरंत पहले के वक्त में यह सवाल पूछना ठीक रहेगा. आखिर 10 करोड़ से ज्यादा की तादाद में मौजूद बुजुर्ग देश के बजट से कुछ आस तो लगाते ही होंगे ना!

बजट में बुजुर्ग को कितनी जगह!

बात दो साल पहले की है. वित्तवर्ष 2016-17 के लिए बजट पेश हुआ, वित्त-मंत्रालय ने भरपूर कोशिश की थी कि समाज के अलग-अलग तबकों को बजट की विराट पहेली बा-आसानी समझ में आए और वे उसमें अपने फायदों के उपायों को समझ लें. वित्त मंत्रालय ने वेबसाइट पर बाकायदा इलस्ट्रेशन बना कर बताया कि किसान, मजदूर, उद्यमी, विद्यार्थी, निवेशक और बुजुर्गों के लिए बजट कैसे फायदेमंद है.

मिसाल के लिए एक 62 वर्षीया बुजुर्ग दीपा नाडार का रेखाचित्र उकेरकर बताया गया कि बजट से उन्हें बहुत फायदे होनेवाले हैं. अनाज के लिए बने ‘प्राइस स्टैब्लाइजेशन फंड’ से वे अब ज्यादा बचत कर सकेंगी. डिजिटल लिट्रेसी मिशन में इनरोल कराने से दीपा डिजिटल रूप से शिक्षित बनेंगी. पीएम जनऔषधि योजना से दीपा को महत्वपूर्ण दवाइयां उचित मूल्यों पर मिलेंगी. नए कानून से उन्हें अपनी बचत के पैसे सुरक्षित तरीके से निवेश करने में मदद मिलेगी. आधार प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर सामाजिक सुरक्षा देने से उन्हें सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिलेगा.और, उन्हें अपने होमलोन पर ब्याज दर में 50 हजार रुपए की अतिरिक्त छूट मिलेगी.

लेकिन, बुजुर्गों की रोजमर्रा की सच्चाइयों के बरक्स बजट के ये दावे कुछ ऐसे ही हैं, जैसे कोई टूटे दांतवाले व्यक्ति के आगे भुने हुए चने रख कर मान लें कि उसका पेट भर जाएगा. देश में 60 पार बुजुर्गों की संख्या करीब दस करोड़ है और इनमें से 51 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे हैं.

बुजुर्गों की दशा

हेल्पेज इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक 60 पार की उम्र के केवल 9 प्रतिशत बुजुर्ग केंद्र सरकार और 18 प्रतिशत बुजुर्ग राज्य सरकार के कर्मचारी के तौर पर पेंशनर हैं. इनमें कुशल श्रमिक की श्रेणी में रखे गए 4 प्रतिशत बुजुर्गों को और जोड़ लें, तो केवल 31 प्रतिशत यानी तकरीबन 3 करोड़ बुजुर्गों के बारे में माना जा सकता है कि उन्हें सीमित अर्थों में ही सही जीवन-यापन के लिए एक आर्थिक सहारा (पेंशन) हासिल है. शेष 7 करोड़ बुजुर्गों की जिंदगी दीपा नाडार नाम के सरकारी रेखाचित्र में बने बुजुर्ग से बहुत अलग और कारुणिक है.

एक ऐसे देश में जहां नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक मात्र 6 प्रतिशत ग्रामीण और 29 प्रतिशत शहरी घरों में कंप्यूटर हो. आप कैसे मान सकते हैं कि बुजुर्ग डिजिटल रूप से साक्षर बनने के लिए सरकारी मिशन का हिस्सा बनेंगे?

सरकारी इलस्ट्रेशन में चूंकि दीपा नाडार यानी एक महिला का बनाया गया था सो सोचने की एक बात यह भी बनती है कि देश की बुजुर्ग महिलाओं में साक्षरता दर महज 28 फीसद है, फिर बुजुर्ग दीपा नाडार के बारे में यह दावा कैसे किया जा सकता है कि वे डिजिटल लिट्रेसी मिशन का हिस्सा बनेंगी?

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और, अगर बनने की ठान लें तब भी एक बड़ी बाधा के मौजूद होने से इनकार नहीं किया जा सकता. दरअसल, 2016 की एक सरकारी रिपोर्ट एल्डरली इन इंडिया के तथ्य बताते हैं कि बुजुर्ग आबादी को दो तरह के रोग सबसे ज्यादा है. एक तो नजर संबंधी और दूसरे चलने-फिरने से जुड़ा. सरकारी इलेस्ट्रेशन में उकेरे गये दीपा नाडार के बारे में यह मानने का कोई वैध आधार नहीं कि उन्हें आंख या घुटने के रोग नहीं लगें होंगे और वे डिजिटल लिट्रेसी मिशन की भागीदार होने के लिए निर्धारित केंद्र तक निश्चित ही जाएंगी.

और, जहां तक जनऔषधि केंद्र से होने वाले फायदे की बात है नौ साल पहले शुरू हुई जन औषधि योजना में 28 राज्यों में अब तक कुल दुकानें 850 की तादाद में ही खुल पाई हैं. कैसे मान लें कि 7 करोड़ बुजुर्ग आबादी की चिकित्सा जरूरतों के लिए दुकानों की यह तादाद पर्याप्त होगी ?

वृद्धावस्था पेंशन की सच्चाई

हेल्पेज इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 80 प्रतिशत बुजुर्ग सिर्फ धन की कमी के कारण अपने बेटे-बेटियों के हाथों प्रताड़ित महसूस करते हैं. 20 प्रतिशत एकदम  बेआसरा हैं. सो, बुजुर्गों की सबसे बड़ी जरूरत है हाथ में कुछ ऐसी रकम का होना जिससे वे वक्त-जरुरत बिना किसी मांगे खर्च कर सकें. सामाजिक सहायता के नाम पर दिया जाने वाला वृद्धावस्था पेंशन इसका एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है.

अच्छा होता कि सरकार बुजुर्गों को होमलोन या आधार-कार्ड के हवाई फायदे ना गिना कर वृद्धावस्था पेंशन के नाम पर केंद्रीय मद से दी जानेवाली 200 रुपए की सहायता राशि में ही कुछ इजाफा कर देती (वैसे वृद्धावस्था पेंशन का हकदार सिर्फ गरीबी-रेखा से नीचे के बुजुर्गों को माना गया है). महीने की 200 रुपए की यह केंद्रीय सहायता साल 2006 से जारी है और अबतक वहीं ठहरी हुई है. (अस्सी साल या इससे ज्यादा उम्र के बुजुर्गों के लिए केंद्रीय सहायता राशि 500 रुपए है).

केंद्र सरकार से मिलने वाली इस सहायता राशि में राज्य चाहें तो अपनी तरफ से रकम जोड़ सकते हैं. राज्य सरकारें रकम जोड़ती जरूर हैं लेकिन जोड़ी हुई रकम ऊंट के मुंह मे जीरा बराबर कहलाएगी. साल 2017 में यूपी में बुजुर्गों को 300 रुपए की राशि वृद्धावस्था पेंशन के नाम पर मिल रही थी और मध्यप्रदेश में 500 रुपए. वृद्धावस्था पेंशन की मद में केंद्रीय सहायता बढ़ाकर कम-से-कम इस तोहमत से कुछ पीछा छुड़ाया जा सकता है कि देश की आबादी में 8 प्रतिशत की तादाद में मौजूद बुजर्गों पर केंद्र सरकार जीडीपी का 1 प्रतिशत से भी कम (0.032%) खर्च करती है.

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