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बजट 2018: किसानों की आमदनी दोगुनी करने का प्लान कहां है!

जबतक सांस तबतक आस की टेक पर आइए इंतजार करें कि इस बार के बजट से किसान की आमदनी बढ़ाने का कोई नायाब नुस्खा निकलेगा

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jan 31, 2018 04:53 PM IST

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बजट 2018: किसानों की आमदनी दोगुनी करने का प्लान कहां है!

कुछ तो है कि सियासत के सदाबहार फसाने में जो बात पूरे साल दर्ज होने के लिए छटपटाती रही बजट सत्र के तुरंत पहले उसका पुरजोर जिक्र हो रहा है. सत्ता के मंच पर मौजूद हर अहम किरदार खेती-किसानी से हमदर्दी जता रहा है, किसान को खुशहाल बनाने के अपना संकल्प दोहराता दिख रहा है.

सबको याद आ रहा है किसान

याद कीजिए, इस महीने का पहला पखवाड़ा अभी बीता नहीं था, इधर सूरज भगवान उत्तरायण हुए और देश के किसान परिवारों ने 14 जनवरी को मकर-संक्रांति पर दही-चूड़ा और तिल के लड्डू खाए-खिलाए, रबी की फसल की कटाई की उम्मीद पाली तो उधर वित्तमंत्री के मुंह से अचानक ही अर्थव्यवस्था की एक मार्मिक सच्चाई बयां हुई कि ‘आर्थिक विकास दर को तब तक तर्कसंगत और समानता वाला नहीं कहा जा सकता, जब तक उसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंचे.’

जीविका के लिए किसानी पर निर्भर देश की तकरीबन 60 फीसद आबादी को वित्तमंत्री ने आश्वस्त किया कि ‘कृषि क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर है.’

वित्तमंत्री के इस बयान को आए अभी हफ्ता भर बीता होगा कि दावोस के सम्मेलन में जाने से पहले देश के प्रधानमंत्री ने एक टीवी चैनल पर अपने साक्षात्कार के दौरान ढेर सारी बातों को बीच गांव-गिरान और किसान का खास जिक्र किया. इसमें उन्होंने कहा कि खेती-किसानी और इससे जुड़े क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और मेरी सरकार किसानों और गांव के लोगों के लिए बहुत कुछ करने को वचनबद्ध है. प्रधानमंत्री के शब्द थे कि सरकार ‘सही कदम उठाएगी और कोई गलती नहीं करेगी’.

देश के 11 करोड़ 80 लाख किसान वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री के संकल्प और आश्वासन भरे शब्दों का अर्थ बीते चार साल के अपने अनुभवों के आधार पर टटोल ही रहे होंगे कि राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों के अभिभाषण में किसानों को फिर से याद किया.

खेती-किसानी को खुशहाल बनाने की राह पर सरकार को हासिल हुई कामयाबियों की फेहरिश्त गिनाए. राष्ट्रपति ने कहा, 'सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए प्रतिबद्ध है. देश भर में किसानों का बाजार ऑनलाइन जुड़ रहा है और अब तक 36,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के कृषि उत्पाद 'ईनैम' (डिजिटल राष्ट्रीय कृषि बाजार) के जरिए बिक चुके हैं.

यह किसानों की कड़ी मेहनत का परिणाम है कि इस बार अनाज का 27.5 करोड़ टन से ज्यादा और फलों व सब्जियों का 30 करोड़ टन से ज्यादा रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है.'

सरकार का आशावाद कहता है, देश में किसानी की दशा सुधार पर है, साल दर साल अनाज का रिकार्ड उत्पादन हो रहा है, किसानों के दिन फिरने वाले हैं,जल्दी ही उनकी आमदनी दोगुनी होनी वाली है.

किसान क्या करे, क्या वह सरकारी आशावाद पर यकीन कर ले ?

A farm worker looks for dried plants to remove in a paddy field on the outskirts of Ahmedabad, India

राजनीति को चुनाव लड़ने और जीतने होते हैं, जीत के लिए वोट जुटाने होते हैं. सो, राजनीति लोगों में आशा जगाती है कि उनका भला बस हुआ ही चाहता है, ‘चंद रोज का इंतजार और कि बस आपके दिन फिरने वाले हैं’. चुनावी राजनीति अक्सर उम्मीदों की भाषा बोलती है.

लेकिन देश की 48 करोड़ की श्रमशक्ति में तकरीबन एक चौथाई की तादाद में मौजूद किसानों के पास कोई कारण नहीं है कि वे सरकारी आशावाद पर आंख मूंदकर यकीन कर लें. आखिर यकीन किया भी जाए तो कैसे. जब सत्ता के गलियारे से जता रहे आशावाद को सरकार का ही आर्थिक सर्वेक्षण बौना ठहरा रहा है.

उम्मीदें कामयाब भी हो सकती हैं और नाकाम भी क्योंकि उम्मीदों का एक भविष्य होता है. अर्थशास्त्र के ठोस आंकड़ों को आज की सच्चाई की खुरदरी जमीन से टकराना होता है.उनका वर्तमान ही वर्तमान होता है, सो जबतक कोई अन्यथा ना बुलवाए आंकड़े वही कहते हैं जो पूरी छान-बीन के बाद नजर आता है.

आइए, टटोलकर देखें कि किसानी की दशा और किसानों की आमदनी के बारे इस बार का आर्थिक सर्वेक्षण क्या कह रहा है ?

आर्थिक सर्वेक्षण में किसानी का सवाल

agriculture

दो खंडों में प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण(2017-18) के भारी-भरकम दस्तावेजों में खेती-किसानी और किसानों को लेकर आये जिक्र को चंद पंक्तियां में समेटना मुश्किल है. इस मुश्किल को आसान करने का एक तरीका है.

आप आर्थिक सर्वेक्षण के पहले खंड की भूमिका देखें जहां यह इतिहास-सिद्ध हकीकत दर्ज है कि कामयाब आर्थिक और सामाजिक बदलाव तभी हुए हैं जब कृषि की उत्पादकता बढ़ी है और आगाह करने के अंदाज में कहा गया है कि ‘भारतीय कृषि की उत्पादकता में बढोत्तरी कम रही है.

बीते चार सालों में कृषि संबंधी जीडीपी और कृषिगत राजस्व में ठहराव आया है जिसकी कुछ वजह है चार सालों में से दो सालों में मॉनसून का कमजोर रहना. जलवायु-परिवर्तन का असर भारतीय कृषि पर स्पष्ट दिख रहा है और इसकी वजह से खेतिहर आमदनी आगे के कुछ सालों में 20 से 25 प्रतिशत कम हो सकती है.’

आर्थिक सर्वेक्षण की भूमिका गांव-गिरान और किसान की आमदनी के बारे में एक और अहम तथ्य का संकेत करती है. तथ्य यह है कि 2016 के मुकाबले 2017 में ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी की बढ़वार में कमी आई है. नए आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में ' साल 2016 में अच्छे मॉनसून के कारण मजदूरी(खेतिहर और गैर-खेतिहर) में तेजी का रुझान देखा गया था लेकिन जान पड़ता है 2017 में खरीफ की फसल से पहले स्थितियां एकदम से उलट गईं.

तीन मुख्य चीजें एकदम जाहिर हैं- खरीफ और रबी की बुवाई कम हुई है जिससे मजदूरों की मांग में कमी आईहै. साल 2017-18 के लिए अनुमानों के मुताबिक खरीफ फसल की बुवाई के रकबे में 6.1 प्रतिशत तथा रबी की बुवाई के रकबे में 0.5 प्रतिशत की कमी आई है.'

आगे आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी ध्यान दिलाया गया है कि ' दलहन और तिलहन की बुआई में तेजी देखी गई लेकिन इससे खलिहानी कीमतों में असामान्य ढंग से कमी आई(न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे). इससे फिर किसान की आमदनी पर असर पड़ा. जल्दी सड़ने वाली उपज जैसे आलू, टमाटर, प्याज की कीमतों में उछाल और गिरावट बनी रही जिससे किसानों की आय में अनिश्चितता बनी रही.'

किसानी और आर्थिक सर्वेक्षण के सबक

Arun Jaitely

ऊपर की बातों से किसानी की दशा और किसान की आमदनी के बारे में कुछ बड़े जाहिर निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. एक तो यही कि देश की आर्थिक वृद्धि-दर चाहे जितनी ऊंची रहे, कृषिगत जीडीपी की बढ़वार अपेक्षा के अनुरुप नहीं है.

दूसरे यह कि किसान मौसम की मार के आगे एकदम लाचार है, फसल बीमा योजना अगर कारगर रहती तो आर्थिक सर्वेक्षण में यह ना लिखा जाता कि सूखा, भारी बारिश या फिर पाला और ओला गिरने जैसे जलवायुगत कारणों से किसान की आमदनी में अगले कुछ सालों में 20 से 25 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है.

तीसरी बात भी मौसम की मार से ही जुड़ी हुई है. दोष चाहे मॉनसून का रहा हो लेकिन यह राहत के उपायों की कमी का ही संकेत है कि 2017 में खेतिहर आमदनी की बढ़वार में कमी के रुझान रहे. पर्याप्त रकबे में फसल की बुवाई ना हुई तो कृषि-मजदूरों को काम और पर्याप्त दाम की कमी रही.

सरकार बेशक कहे कि कृषि-उत्पादन बढ़ा है लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण का तथ्य यही है कि दलहन-तिलहन की बुवाई भरपूर हुई लेकिन इन फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य किसान को हासिल नहीं हुआ.

चौथी बात यह कि कुछ फसलों का कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय नहीं होता, जैसे कि आलू-प्याज-टमाटर और ऐसी फसलों के बाजार-भाव के उतार-चढ़ाव क आगे किसान एकदम ही लाचार होता है. किसान को सट्टेबाज नहीं लेकिन किसी सट्टेबाज की ही तरह उसकी आमदनी भी लगातार अनिश्चित बनी रहती है.

सरकार के पास क्या है समाधान

सवाल यह है कि आर्थिक सर्वेक्षण से निकलते इस सबक का सरकार के पास समाधान क्या है ? आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाया गया है कि खाद और बिजली पर सब्सिडी देने से बेहतर है किसान को सीधे आमदनी की सहायता दी जाए, सिंचाई की सुविधाओं का विस्तार हो और किसानों के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विस्तार हो.

मुश्किल यह है कि किसान की आमदनी को दोगुना करने का संकल्प तो सत्ता के शीर्ष से बार-बार दोहराया जा रहा है लेकिन सरकार के पास इसका कोई रोडमैप नहीं है.

फिर भी जबतक सांस तबतक आस की टेक पर आइए इंतजार करें कि इस बार के बजट से किसान की आमदनी बढ़ाने का कोई नायाब नुस्खा निकलेगा.

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