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बजट 2018: पीएम मोदी के इस तुरुप के पत्ते से घबराए राजनीतिक विरोधी

बजट में सरकार की योजना का खाका कुछ ऐसे पेश हुआ कि उनकी अवधि 2019 के पार पहुंचती है और यह एक तरह से मुकाबले में तुरुप का पत्ता साबित हुआ है.

Updated On: Feb 02, 2018 01:57 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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बजट 2018: पीएम मोदी के इस तुरुप के पत्ते से घबराए राजनीतिक विरोधी

खुफिया एजेंसियों के बीच एक शब्द इस्तेमाल होता है ‘साय-ऑप’. यह विरोधी को मात देने का एक सोचा-समझा दाव होता है. चुन-चुन कर ऐसी सूचनाएं विरोधी खेमे तक पहुंचाई जाती हैं कि वह स्थिति को अपने बूते सोचने-समझने की हालत में ना रहे. ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्तमंत्री अरुण जेटली के बजट-पेश करने के मौके का इस्तेमाल एक सियासी साय-ऑप के रूप में किया. सो, अगले लोकसभा चुनाव की आहटों के पहले ही विपक्षी खेमे में अफरा-तफरी ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है.

शायद विपक्ष आस लगाये बैठा था कि सरकार कुछ गलतियां करें तो मिर्च-मसाला लगाकर उन्हें बड़े सियासी मुद्दे में तब्दील कर दिया जाए. लेकिन जेटली ने अपने लंबे बजट-भाषण में कदम बड़े साध कर रखे, उनका जोर वैसी बातों पर रहा जो मीन-मेख निकालने वाले अर्थशास्त्रियों को तो नहीं भाएंगी लेकिन आम जनता के दिल से सीधा संवाद बनाएंगी.

बजट में सरकार की योजना का खाका कुछ ऐसे पेश हुआ कि उनकी अवधि 2019 के पार पहुंचती है और यह एक तरह से मुकाबले में तुरुप का पत्ता साबित हुआ. ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे के विकास तथा सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों की जो रुपरेखा पेश हुई उनका असर 2022 तक दिखेगा. मतलब, छुपे तौर पर साफ संदेश यह गया कि 2019 में मोदी सरकार की जीत एकदम तय है.

बेशक, ऐसा निष्कर्ष निकालना दूर की कौड़ी लाना कहलाएगा क्योंकि चुनावों में अभी देर है. और फिर, राजनीति में कोई बात पहले से तय नहीं होती. और ठीक इसी कारण से यह बजट एक सियासी साय-ऑप है यानि विपक्षी खेमे के पैर उखाड़ देने का एक चुप्पा अभियान. और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह अभियान अपने मकसद में कामयाब रहा.

बजट में ग्रामीण क्षेत्र पर जोर से सब साफ हो गया

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जेटली ने जैसे ही अपना भाषण शुरू किया और जोर ग्रामीण क्षेत्र पर लगाया, बजट का मुख्य स्वर स्पष्ट हो गया. हाल के वक्त में ऐसा शायद ही कभी हुआ है जब वित्तमंत्री ने कृषि-उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बात की है. इसी तरह कृषि-उत्पादों के विपणन(मार्केटिंग) और मार्केटिंग-चेन को आपस में जोड़ने जैसी बातें बजट में अमूमन नहीं हुआ करतीं लेकिन जेटली का जोर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने और छोटे किसानों को मार्केटिंग की सुविधा फराहम करने पर था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विपणन का संस्थागत ढांचा खड़ा किया जाएगा और भंडारघरों(वेयरहाऊस) के निर्माण को प्राथमिकता दी जाएगी.

बजट-भाषण में एक वादा यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम(सार्विक स्वास्थ्य योजना) का था जिसमें निम्न मध्यवर्ग और गरीब तबके के 55 फीसद लोगों को कवरेज देने की बात है. यह स्कीम अपने विस्तार में जनधन योजना से कोई कम नहीं कही जाएगी. जाहिर, यह चलताऊ सवाल तो पूछा ही जाएगा कि सरकार आखिर इसे करेगी कैसे ? कहां से जुटाएगी इस योजना के लिए रकम ? लेकिन जन धन, उज्ज्वला, उजाला और अन्य कई योजनाओं के कामयाब क्रियान्वयन ने दिखाया है कि नौकरशाही की क्षमता पर शक करने की कोई वजह नहीं है. इसके उलट इन योजनाओं के अमल से साबित हुआ है कि नौकरशाही को साफ-साफ पता हो कि क्या काम करना है तो वह डटकर काम करती है और हैरअंगेज उपलब्धियां हासिल कर दिखाती है.

इसमे कोई शक नहीं कि दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना की राह में बहुत सी बाधाएं आएंगी, धन की कमी का सामना करना पड़ेगा, डाक्टरों की तादाद में कमी और और अस्पतालों की खस्ताहाली जैसी मुश्किलें योजना के आड़े आएंगी. पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम के शब्दों में कहें तो यह एक एक जुमला साबित हो सकता है जिसका जमीनी हकीकतों से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन विडंबना कहिए कि अर्थशास्त्र के बारे में चिदंबरम और उनकी जमात के लोगों की पंडिताई व्याख्या तो लोगों के दिल से तार नहीं जोड़ पा रही लेकिन यह ‘जुमला’ लोगों से सीधे संवाद बना सकता है.

बदलते दिख रहे हैं हालात

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सोचिए कि रसोई गैस के सिलेंडर, शौचालय, बिजली और बैंकिंग सरीखी बुनियादी सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से किस कदर दूर थीं. लेकिन अब राज्यों में इस बात की होड़ लगी है कि ये सुविधाएं लोगों तक कौन पहले पहुंचाता है. बेशक, इन योजनाओं को लागू करने में बहुत सारी कमियां हो सकती हैं लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने लोगों को ये चीजें उनका हक मानकर दीं, यह कोई दया-दान नहीं था. इस सिलसिले में एक जरुरी सवाल उठता है कि सरकार चला रहे लोगों को गरीब लोगों की समस्याओं को पहचानने में इतना वक्त क्यों लगा और समाधान के उपायों की पहल जुमले के रूप में क्यों हुई?

ठीक इसी तरह, बजट में इस बात पर ध्यान दिया गया है कि शहरीकरण का विस्तार गांवों तक पहुंच रहा है और बजट में जोर ग्रामीण क्षेत्रों में आवास मुहैया कराने पर है. सरकार इस बात को समझती है कि नव-मध्यवर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है, वे शहरी इलाकों के उच्च आय-वर्ग वाले लोगों जैसा जीवन-स्तर हासिल करना चाहते हैं. सो, नई स्मार्ट सिटीज बनाने की पहल के पीछे मंशा बड़े शहरों से लगते सेटेलाइट टाऊनशिप तैयार करने की है ताकि देश में शहरीकरण का विस्तार समान स्तर से हो सके.

बजट में दिखा राजनीतिक रंग

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चूंकि लोकसभा के चुनाव अगले साल होने हैं सो उम्मीद तो यही थी कि बजट राजनीतिक रंग लिए होगा. और मोदी से बेहतर कोई नहीं जानता कि अर्थशास्त्र दुरुस्त रखा गया तो राजनीति खुद ही दुरुस्त हो जाया करती है. अब अर्थशास्त्र के पंडितों को चाहे जो कहना हो कहते रहें. मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए अपने अनुभवों से इस सच्चाई को जाना है.

बजट में उन्होंने अपने अजेंडे को 2019 यानि लोकसभा चुनाव के साल से आगे खींचकर विपक्षी खेमे के पैर उखाड़ दिए हैं. और, ठीक इसी कारण यह बजट एक राजनीतिक ‘साय-ऑप’ है, इसने विपक्ष को लगातार सोच के इस फंदे में फंसाकर रख छोड़ा है कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी का अगला कदम क्या होगा?

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