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बजट 2018: किसानों और इनकम टैक्स स्लैब पर रहेगा फोकस

इस साल बजट में कृषि, सामाजिक क्षेत्र और बुनियादी ढांचे के बजटीय आवंटन बढ़ाने की कोशिश होगी

Updated On: Jan 14, 2018 03:26 PM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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बजट 2018: किसानों और इनकम टैक्स स्लैब पर रहेगा फोकस

वित्त वर्ष 2018-19 के सालाना बजट की सरगर्मियां तेज हो गई हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट की तैयारियां शुरू कर दी हैं. साथ ही आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों के साथ बैठकों का सिलसिला शुरू कर दिया है.

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कृषि, श्रमिक, सामाजिक, व्यापारिक और औद्योगिक, सूचना तकनीकी क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ वित्तमंत्री बजट से पहले की चर्चा कर चुके हैं. इन बैठकों के बाद ऐसा लग रहा है कि इस साल बजट में कृषि, सामाजिक क्षेत्र और बुनियादी ढांचे के बजटीय आवंटन बढ़ाने की पुरजोर कोशिश होगी.

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा. लिहाजा इनकम टैक्स स्लैब ना बढ़ाने का राजनीतिक जोखिम अब वित्त मंत्री शायद ही उठाना चाहेंगे.

एक फीसदी पर मिले कृषि कर्ज

वित्त मंत्री के साथ अपनी बैठक में किसान संगठनों ने प्रमुख मांग रखी है कि पूरे देश के लिए कृषि कर्ज राहत पैकेज की घोषणा होनी चाहिए. साथ ही 2 लाख रुपए तक कृषि कर्ज लेने वालों की संख्या दोगुना करनी चाहिए. किसानों को यह लोन 1 फीसदी पर मिलना चाहिए. ऐसे कर्जों को आधार से जोड़ने का सुझाव किसान संगठनों ने बैठक में दिया है ताकि किसी को दोबारा कर्ज ना मिल सके.

केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य बनाया है. किसान संगठनों का सुझाव है कि यह लक्ष्य हासिल करने के लिए डेयरी, फल और सब्जियों के उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहिए, क्योंकि इनमें 3-4 गुना उत्पादन बढ़ने की गुजांइश है. इसके साथ ही सरकार को ऑपरेशन वेजी शुरू करना चाहिए. इसमें TOP यानी टोमैटो (टमाटर), ओनियन (प्याज) और पोटैटो (आलू) पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इन की कीमतों में बहुत ज्यादा घट-बढ़ होती है.

2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले यह आखिरी पूर्ण बजट है, लिहाजा इस बार पॉपुलिस्ट बजट होने की उम्मीद है

2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले यह आखिरी पूर्ण बजट है, लिहाजा इस बार पॉपुलिस्ट बजट होने की उम्मीद है

2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए लक्ष्य को हासिल करने के लिए मधुमक्खी पालन, शहद उत्पादन, मशरूम उत्पादन, मत्स्य पालन और सुअर पालन केा सरकार को तवज्जो देनी चाहिए.

किसान संगठनों की एक प्रमुख मांग थी कि स्थानीय स्तर पर वेयर हाउस (गोदाम), कोल्ड स्टोरेज की सुविधा भी बढ़ानी चाहिए. साथ ही फूड प्रोसेसिंग की सुविधाओं को भी बेहतर बनाना चाहिए. इस तरह के उपाय से जल्दी बर्बाद होने वाली पैदावार का ज्यादा से ज्यादा फायदा किसानों को मिल सकेगा.

बेहतर ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा भी जरूरी

वित्त मंत्री को यह भी सुझाव दिया गया है कि किसानों को पैदावार की बेहतर कीमत दिलाने और उनमें होने वाले उठापटक को काबू करने के लिए इंटीग्रेटेड ट्रैफिक सिस्टम विकसित किया जाना चाहिए.

किसान संगठनों ने एक और अहम सुझाव यह दिया है कि अन्य सब्सिडियों की तरह खाद और उर्वरक सब्सिडी का भी डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर होना चाहिए. यानी खाद और उर्वरकों पर मिलने वाली सब्सिडी सीधे किसानों के खातों में आएगी.

अभी इस सब्सिडी का फायदा किसानों को उर्वरक कंपनियों के जरिए मिलता है. लिहाजा किसानों तक इसका फायदा पहुंचने में काफी वक्त लगता है. यूरिया की कीमतों को अधिक और पीएमके (एक तरह का उर्वरक) की कीमतों को कम करने का सुझाव भी किसान संगठनों ने दिया है. इनका मानना है कि इससे सरकार और किसानों दोनों को फायदा होगा.

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को अधिक लचीला बनाने का सुझाव भी मिला है, ताकि किसानों को इसका पूरा-पूरा लाभ मिल सके जो अभी नहीं मिल पा रहा है.

इन संगठनों का मानना है कि समान कृषि नीति से देश में कृषि समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि देश भर में कृषि की स्थितियां समान नहीं हैं. इसलिए राज्यों को अपनी जरूरतों के मुताबिक नीति बनाने के लिए अनुमति मिलना चाहिए. बैठक में एक सुझाव यह भी दिया गया है कि बागान श्रमिक अधिनियम (1951) के तहत मजदूरों के कल्याणकारी सुविधाओं के खर्च पर बागान कंपनियों को अधिक टैक्स छूट दी जानी चाहिए.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इस बैठक में कहा है कि कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए जल संरक्षण, कृषि प्रसंस्करण को बढ़ावा और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल की जरूरत है. उन्होंने कहा कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उपजों के बेहतर भंडारण और मार्केटिंग की सुविधाएं स्थापित करने की जरूरत है, ताकि किसानों को उपज की बेहतर कीमत मिल सके.

आयकर मुक्त सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपए हो

वित्त मंत्री के साथ बजट पूर्व परामर्श बैठक में श्रमिक संगठनों ने एक स्वर में इनकम टैक्स स्लैब बढ़ाकर सालाना 5 लाख रुपए करने की मांग की है. इसके साथ ही मासिक न्यूनतम मजदूरी को 18 हजार रुपए और न्यूनतम मासिक पेंशन को तीन हजार रुपए करने की मांग भी की गई है.

अभी इनकम टैक्स स्लैब सालाना 2.5 लाख रुपए से ही शुरू होता है. जबकि न्यूनतम ईपीएफ पेंशन हर महीने एक हजार रुपए है. न्यू पेंशन स्कीम को वापस लेने की भी मांग इस बैठक में की गई है. अनेक सरकारी कोशिशों के बाद भी नई पेंशन योजना लोकप्रिय नहीं हुई है. इसकी एक बड़ी बजह यह है कि अंतिम भुगतान के समय इसके एक हिस्से पर टैक्स लगता है. जबकि पीपीएफ, जीवन बीमा आदि में मैच्योरिटी के रकम पर कोई टैक्स नहीं लगता है.

अाम आदमी को इस साल बजट में कम टैक्स देने का तोहफा मिल सकता है

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इस बैठक में एक सुझाव यह भी दिया गया है कि देश में अमीरों और गरीबों के बीच आय के अंतर को कम करने के लिए भुगतान करने योग्य अमीर लोगों से अधिक कर वसूला जाना चाहिए. रोजगार बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे, सामाजिक क्षेत्र और कृषि में भारी निवेश बढ़ाने की पुरजोर मांग भी वित्त मंत्री से इन श्रमिक संगठनों ने की है.

ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देने की मांग की गई है, जिनमें ज्यादा कामगारों की जरूरत हो. साथ ही सरकारी कंपनियों के प्राइवेटाइजेशन, विनिवेश को रोकने की भी मांग की गई है. इस बैठक में शामिल अनेक श्रमिक संगठनों में से 9 संगठनों ने वित्त मंत्री को एक संयुक्त ज्ञापन दिया है. इस ज्ञापन की प्रमुख मांगें हैं

-      स्वास्थ्य और पर्यटन सुरक्षा सहित सामाजिक क्षेत्र में बजटीय आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए

-      जानबूझकर और कर्ज का भुगतान न करने वालों के खिलाफ कारगर कड़े उपाय किए जाने चाहिए.

-      आवश्यक वस्तुओं की कीमत बढ़ोतरी को कम करने के उपायों पर जोर देना चाहिए.

-      सभी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अधिकाधिक कवर करने के लिए मनरेगा पर व्यय बढ़ाना चाहिए.

-      स्थायी नौकरी पर कोई अनुबंध या आकस्मिक श्रमिकों को तैनात नहीं किया जाना चाहिए.

-      अनुबंध या आकस्मिक श्रमिकों को नियमित श्रमिकों के समान मजदूरी और लाभ का भुगतान होना चाहिए.

-      रक्षा उत्पादन, रेलवे खुदरा व्यापार और वित्तीय जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति पर रोक लगायी जानी चाहिए.

-      गैर संगठित क्षेत्र के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय कोष बनाया जाना चाहिए.

इन श्रमिक संगठनों ने रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागेदारी के निर्णय के लिए सरकार को आगाह किया है कि इससे सरकारी रक्षा उपक्रमों के कामगारों और उनके परिजनों पर खराब असर पड़ेगा, बल्कि लंबे समय में देश की सुरक्षा और संप्रभुता भी कमजोर पड़ेगी.

वित्त मंत्री ने क्या भरोसा दिया

इस बैठक में वित्त मंत्री ने कहा कि वर्तमान सरकार श्रमिकों, खासकर विशेष कर एमएसएमई और गैर संगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूरों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. कामगारों को कानून के अनुसार न्यूनतम वेतन पाने का हक है. उन्होंने सभी उद्योगों से बिना कोताही बरते सख्ती से यह नियम पालन करने को कहा है.

सामाजिक क्षेत्र को मिलेगा ज्यादा आवंटन 

सामाजिक क्षेत्र के हितधारकों के साथ बजट पूर्व बैठक में वित्त मंत्री ने सामाजिक क्षेत्र को अधिक आवंटन के साफ संकेत दिए हैं. इस बैठक में दलित मानव अधिकार, खादृय अधिकार, शिक्षा अधिकार, बाल सुरक्षा, वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों, जल संरक्षण, पोषण और स्वास्थ्य संबंधी मुदृों पर खुलकर हितधारक संगठनों ने अपने मुद्दे वित्त मंत्री के सामने उठाए.

वित्त मंत्री इन मांगों से सहमत दिखाई दिए कि कल्याणकारी योजनाओं के लिए संबंधित मंत्रालय को प्राथमिकता के आधार पर फंड जारी करना चाहिए. वित्त मंत्री ने बैठक में शामिल लोगों को आश्वस्त किया कि विभिन्न सामाजिक मंत्रालयों की कल्याणकारी योजनाओं के फंड्स का सही ढंग से इस्तेमाल किया जाएगा.

बाल संरक्षण योजनाओं के लिए अधिक आवंटन की मांग से भी वित्त मंत्री ने सहमति जताई है. कामकाजी महिलाओं के लिए बेहतर रोजगार शर्तों, असंगठित क्षेत्र में श्रम सुधार, रोजगार को बढ़ाने के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग, कंपनी और कर्मचारी के संबंंधों में पारदर्शिता जैसी मांगों से वित्त मंत्री लगभग सहमत थे. वित्त मंत्री इनमें कितनी मांगों को बजट में मानेंगे, इस पर अब निगाहें टिकी रहेंगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(बजट से जुड़ा अगर आपका भी कोई सवाल हो तो hindifirstpost@gmail.com पर भेज सकते हैं.)

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