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बजट 2018: किसानों को अच्छी कीमत के साथ महंगाई पर काबू पाना चुनौती

गुजरात के विधानसभा चुनाव परिणामों ने साफ किया है कि खेती किसानी से जुड़े लोग खुद को सेंसेक्स के विकास की तेजी से जोड़कर नहीं देख पा रहे हैं

Alok Puranik Alok Puranik Updated On: Jan 24, 2018 08:42 AM IST

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बजट 2018: किसानों को अच्छी कीमत के साथ महंगाई पर काबू पाना चुनौती

इस साल बजट के सामने कुछ ठोस चिंताएं हैं. इनमें सबसे पहली चिंता है कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर है. 2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब कच्चे तेल के नरम भाव ने मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था की खुशहाली के पक्के इंतजाम किए थे.

कच्चे तेल के भावों के अध्ययन से कुछ अहम तथ्य सामने आते हैं. 2014-15 में कच्चे तेल का सालाना औसत भाव 84.16 डॉलर प्रति बैरल था. 2015-16 में यह गिरा और फिर कुछ और गिरकर 45.17 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया.

2016-17 में इनमें बढ़ोत्तरी हुई. ये बढ़कर 47.56 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा. 2017-18 में अब तक इन भावों का औसत रहा है 54.17 डॉलर प्रति बैरल. एक आशंका यह है कि कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर तक जा सकता है. अगर यह आशंका सच  साबित होती है, तो फिर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत समस्याएं आनी हैं.

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सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा. वित्तीय घाटा अभी तक सीमित है, क्योंकि कच्चे तेल के भाव सीमित हैं. पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर महंगाई पर काबू पाना मुश्किल है. इंडस्ट्री सस्ती ब्याज दरों की मांग कर रहा है. लेकिन फिलहाल ये मांग पूरी करना मुश्किल है. इसके साथ ही तमाम आइटमों की महंगाई अपनी तरह से परेशान करेगी.

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दिसंबर 2017 के आंकड़े बताता है कि महंगाई सालाना 5.21 प्रतिशत बढ़ी है. यह सत्रह महीनों में सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है. महंगाई का दैत्य पूरे तौर पर सिर उठाएगा अगर कच्चे तेल के भाव बढ़ेंगे. इसलिए इस बजट में सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह कुछ अतिरिक्त जगह बना कर चले. यानी एक तय रकम की व्यवस्था बजट में करके चले ताकि कच्चे तेल के भावों में बढ़ोत्तरी के बावजूद बजट घाटा गड़बड़ाए नहीं. यह करना इसलिए जरूरी है कि बरसों बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के रेटिंग में सुधार हुआ है. रेटिंग में सुधार के पीछे एक वजह यह रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था राजकोषीय घाटे के मामले में अनुशासन पर चली है.

सरकारी घाटा का संकट कैसे दूर होगा

वित्तीय घाटा किसी भी अर्थव्यवस्था की क्रेडिट रेटिंग तय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. 2012-13 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 5.8 प्रतिशत था. 2014-15 में यह गिरकर 4.5 प्रतिशत हुआ. 2015-16 में यह और गिरकर 3.9 प्रतिशत हुआ. 2017-18 में इसके 3.2 प्रतिशत रहने के अनुमान है. बजट अगर इसे साध पाता है, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए बहुत सकारात्मक होगा. पर देखने की बात यही है कि बजट इसे कैसे साधेगा.

कृषि, गांव और बजट

कृषि गांव और बजट का इस बार कुछ खास महत्व है. गुजरात के विधानसभा चुनाव परिणामों ने साफ किया है कि खेती किसानी से जुड़े लोग खुद को सेंसेक्स के विकास की तेजी से जोड़कर नहीं देख पा रहे हैं. यानी गांवों और खेती में विकास की वह चमक देखने को नहीं मिल रही है जो चमक कमोबेश शहरी इलाकों में देखने को मिल जाती है.

खेती किसानी के आंकड़े यह हैं कि  2017-18 के दौरान कृषि में सिर्फ 2.1 प्रतिशत के विकास की संभावना है. 2017-18 में समूची अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.5 प्रतिशत रहने की संभावना है. यह विकास दर ही कम मानी जा रही है खेती की विकास दर तो इसकी भी एक तिहाई से कम है.

संकेत साफ हैं कि खेती किसानी अर्थव्यवस्था के साथ चल नहीं पा रही है. पिछड़ रही है. किसानों को उनकी उपज के सही भाव नहीं मिल पा रहे हैं. किसान हताशा में धरने प्रदर्शन जुलूस करते हैं. कई बार ये हिंसक भी हो जाते हैं. पर समस्या का हल मिल नहीं रहा है.

यह जानने के लिए अर्थशास्त्री होने की जरूरत नहीं है कि किसान को उसकी उपज का सही दाम नहीं मिल पाता है. बिचौलिये और दूसरे मध्यस्थ ही रकम खा जाते हैं. इन दिनों किसान आलू थोक में पचास पैसे प्रति किलो से लेकर एक रुपए प्रति किलो तक बेच रहा है. दिल्ली और आसपास के इलाकों में आलू बीस रुपए का डेढ़ किलो मिल रहा है. यानी मुनाफा करीब 13.50 रुपए किलो. किसान के पास इसमें से एक रुपया भी मुश्किल से पहुंच रहा है. यानी खेती मुनाफे का सौदा है, पर किसान के लिए नहीं. 2014-15 में घोषणा की गई थी कि ई-नाम यानी इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट शुरू किया जाएगा. पर यह अभी भी कुशलता से काम नहीं कर रहा है. इस मार्केट से उम्मीद थी कि इससे किसानों को कीमतों के बारे में जानकारियां मिलेंगी और किसान अपने आइटम अधिकतम भावों पर बेच पाएंगे.

ऐसा कुछ नहीं हुआ नहीं. कृषि मंत्री ने संसद में स्वीकार किया कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है. यानी सरकारी व्यवस्थाएं कागज पर चौकस हैं, जमीन पर उन्हें अभी भी ठोस तरीके से उतरना बाकी है.

किसानों की दोगुनी आमदनी कैसे होगी

मोदी लगातार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बातें करते हैं. यह आमदनी दोगुनी कैसे होगी, यह सवाल खासा महत्वपूर्ण है. किसानों की आमदनी दोगुनी करने के मसले पर एक कमेटी बनी है-दलवई कमेटी.

उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आमदनी दोगुनी करने के लिए ये कारक महत्वपूर्ण हैं-एक विकसित मार्केटिंग व्यवस्था, जिससे किसान को नवीनतम जानकारियां मिल पाएं. एकीकृत बाजार हो. बेचने के माध्यम अधिक से अधिक से हों. ये कैसे हासिल हों, इस सवाल का जवाब इस बजट को देना है. किसान फसल उपजा भी ले, पर भाव उसके ना मिलें, तो किसान की सफलता एक तरह से नकारात्मक ही साबित होती है. सप्लाई ज्यादा होने से सामान की मांग गिर जाती है.

मनरेगा के लिए प्रावधान बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी. पिछले साल करीब 48,000 करोड़ का प्रावधान रखा गया था मनरेगा रोजगार गारंटी योजना के लिए. इसे बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी. रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं. गांवों में रोजगार के अवसर पैदा हों, यह सुनिश्चित करना जरुरी होगा. मनरेगा के लिए बढ़ी हुई रकम का इंतजाम वित्त मंत्री के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है.

किसानों को कैसे मिलेगी बेहतर कीमत

मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि के क्षेत्र में एक स्कीम चलायी है, जिससे किसानों की परेशानियां कुछ हो रही हैं. जिन किसानों को फसलों का घोषित समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता है, बाजार में उन फसलों की कीमत के चलते. उन किसानों को समर्थन मूल्य के घाटे की भरपाई भावांतर योजना के तहत मध्यप्रदेश सरकार करती है.

मध्यप्रदेश की स्थिति यह है कि खेती का सकल घरेलू उत्पाद 2001-02 से लेकर 2014-15 तक हर साल लगभग 9.4 प्रतिशत की दर से बढ़ा है. फिर भी मध्यप्रदेश में किसानों के हिंसक आंदोलन की नौबत आयी. बंपर फसल का होना इस बात को सुनिश्चित नहीं करता कि हर किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य मिल जाए. भावांतर जैसी योजना अगर पूरे देश में लागू हो, तो किसानों की नाराजगी एक हद तक कम हो  सकती है. पर मसला यह है कि इस योजना का कितना खर्च केंद्र सरकार उठाए, कितना राज्य सरकार उठाए. अगर केंद्र सरकार भावांतर की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाती है, तो 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.

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