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बजट 2018: सिर्फ कृषि बजट बढ़ाने से नहीं बदलेगी किसानों की तकदीर

हर सरकार को लगता है कि कृषि का बजट बढ़ा देने से कृषि का विकास हो जाएगा, यही कारण है कि कृषि का विकास आज भी कृषि बजट पर कम, मानसून के भरोसे ज्यादा है

Updated On: Jan 31, 2018 08:18 AM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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बजट 2018: सिर्फ कृषि बजट बढ़ाने से नहीं बदलेगी किसानों की तकदीर

1 फरवरी को जब वित्त मंत्री अरुण जेटली अपना बजट भाषण पढ़ रहे होंगे, तब स्वाभाविक है कि सबकी निगाहें इस बात पर लगी होंगी कि कृषि क्षेत्र में व्याप्त असंतोष को दूर करने के लिए कि वे किन-किन उपायों की घोषणा करते हैं. लगातार दो सूखों और फिर बढ़िया पैदावार होने से बाजार में कृषि उपजों के दामों में भारी गिरावट से अब खेती लाभप्रद नहीं रह गई है. इन्हीं वजहों से देश के अनेक हिस्से में बड़े आंदोलन भी हुए हैं.

ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2017 में खरीफ उपजों को राज्य निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर न बेच पाने के कारण किसानों को 36000 करोड़ का नगद नुकसान हुआ है. कृषि की हालात सुधारने, उसे अधिक उत्पादक बनाने के लिए हर बजट में उपाय किए जाते हैं. कृषि कर्जों का लक्ष्य हर साल बढ़ा दिया जाता है. सिंचाई सुविधा बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं शुरू की जाती हैं, उन पर व्यय भी बढ़ा दिया जाता है. प्रधानमंत्री किसान फसल बीमा योजना में आवंटन बढ़ता है, उसका दायरा भी बढ़ाया जाता है. हर बार कृषि मार्केटिंग को कारगर बनाने की बात की जाती है. खाद्य भंडारण और उनके यातायात को दुरुस्त करने की मंशा हर साल प्रकट की जाती है.

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इन तमाम प्रयासों के बावजूद किसानों की आमदनी पिछले चार सालों से स्थिर बनी हुई हैं, ऐसे में मोदी सरकार 2022 तक किसानों की वास्तविक आय कैसे दोगुनी करेगी, इस पर लगातार संशय गहरा रहा है.

कृषि बजट बढ़ा, पर कृषि विकास गिरा

वैसे मोदी सरकार का हर बजट किसानों और गरीबों को समर्पित रहता है. उसमें कृषि विकास के लिए लंबी-चौड़ी घोषणाएं की जाती हैं. हर बार यह भरोसा भी होता है कि अब खेती के दिन पलट जाएंगे.

2015-16 में कृषि बजट तकरीबन 15 हजार करोड़ रुपए का था, जो 2016-17 में दोगुने से भी अधिक बढ़कर तकरीबन 36 हजार करोड़ रुपए हो गया. 2017-18 में यह बढ़ कर 41 हजार करोड़ रुपए हो गया. पर मोदी राज में कृषि विकास दर औसत 2.1 फीसदी रह जाने का अनुमान है जो 1991 के बाद सबसे कम है. हर सरकार को लगता है कि कृषि का बजट बढ़ा देने से कृषि का विकास हो जाएगा. उसके बाद हर सरकार किसानों की समस्याओं से आंख फेर लेती है. यही कारण है कि कृषि का विकास आज भी कृषि बजट पर कम, मानसून के भरोसे ज्यादा है.

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कृषि कर्जों की हकीकत

एक बार कृषि कर्जों में बढ़ोतरी की खबर सुर्खियों में रहती हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कृषि कर्जों में भारी इजाफा हुआ है. 2003-04 के बाद बैंकों द्वारा दिए गए कर्जों में लगभग 1000 फीसदी की वृद्धि हुई है. पर हकीकत यह है कि इसमें किसानों को मिलने वाले कर्जों की प्रतिशत कम होता जा रहा है. और कृषि कंपनियों के कर्जों की मात्रा बढ़ती जा रही है.

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छोटे किसान और सीमांत किसानों को अब भी व्यावसासियों बैंकों से कर्ज नहीं मिलता है और उन्हें अपनी आवश्यकताओं के लिए महाजनों, साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं का सबसे बड़ा कारण बैंक कर्ज बन गए हैं, क्योंकि उनकी कुल आमदनी कम है, खर्च ज्यादा है. सरकार को बेहद सस्ती दरों में छोटे कर्जों को उपलब्ध कराने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए.

आमदनी कम, खर्च ज्यादा

राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण के अनुसार किसान परिवारों की आय औसत 6426 रुपए मासिक है. इसमें खेती, पशुपालन, गैर कृषि आय और मजदूरी आदि सब शामिल है. पर उनका उपभोग व्यय 6223 रुपए महीना है.

मतलब साफ है कि उनकी कमाई का अधिकांश हिस्सा खाने-पीने, कपड़ों और इलाज आदि पर ही खर्च हो जाता है, नतीजतन खेती के खर्चों के लिए उनके पास पूंजी नहीं बचती है. खेती खर्च के लिए मजबूरन उन्हें कर्जों पर निर्भर रहना पड़ता है. इस सर्वेक्षण में बताया गया है कि तकरीबन 50 फीसदी किसान परिवार कर्जों के भारी बोझ से दबे हुए हैं.

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63000 करोड़ का सालाना नुकसान

किसानों को हर साल अपनी पूरी उपज नहीं बेच पाने के कारण 63 हजार करोड़ रुपए का सलाना नुकसान हो जाता है. किसानों की दोगुनी आय करने के लिए गठित दलवाई कमिटी के अनुसार फल-सब्जियों की 40 फीसदी उपज पर किसानों को कोई मौद्रिक प्रतिफल नहीं मिलता है क्योंकि किसान पूरी फसल बेच पाने में असमर्थ रहते हैं.

एसौचेम की एक रिपोर्ट के अनुसार दूध और फल सब्जियों के नष्ट हो जाने से किसानों को सालाना 92 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो जाता है. इस नुकसान से बचने के लिए कोल्डचेन के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की आवश्यकता है. लेकिन इसकी चिंता न राज्य सरकारों को है न ही केंद्र सरकार को. फसल पश्चात् नुकसान यदि न्यूनतम हो जाए, तो तमाम सरकारी सहायता की उन्हें जरूरत नहीं पड़ेगी.

जलवायु परिवर्तन से बढ़ा खतरा

ताजा आर्थिक समीक्षा ने आगाह किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से आने वाले कुछ सालों में कृषि आमदनी में 20-25 फीसदी की कमी आ सकती है. जलवायु परिवर्तन की मार गैर सिंचित कृषि पर ज्यादा होगी. आज भी 50 फीसदी कृषि मानसून पर निर्भर है.

बाजारों में कृषि उपजों के दाम में भारी उतार-चढ़ाव से अब किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे हैं. सरकार यदि इन उतार-चढ़ावों से हुए नुकसान के लिए कोई कारगर कीमत स्थिरता फंड का इंतजाम करें, तभी किसानों का असंतोष समाप्त हो सकता है. कई देशों में कृषि उपज के दामों की गिरावट से हुए नुकसान की भरपाई के लिए बीमा का प्रावधान है.

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किसानों को चाहिए वाजिब दाम

मोदी सरकार ने 2014 में वायदा किया था कि किसानों को उनकी उपज का 50 फीसदी अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा, लेकिन मोदी सरकार अपना वायदा भूल गई है. पिछले दिनों एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि आम आदमी खैरात में कुछ नहीं चाहता है. वह केवल अपना वाजिब हक चाहता है.

प्रधानमंत्री मोदी आगामी बजट में किसानों को उनकी उपज के वाजिब दाम दिला दें, उन्हें फिर किसी सरकारी सहायता की जरूरत नहीं रह जाएगी, जैसा कि सीमांत और छोटे किसानों ने अपने दम पर सिंचाई के मामले में दिखाया है. इन किसानों ने बिना किसी सरकारी सहायता से लगभग दो करोड़ कुओं, टयूबवेलों का निर्माण कर 5 करोड़ हेक्टेयर खेतों को सिंचित क्षेत्र में ला खड़ा किया है.

देश में कुल 9.5 करोड़ हेक्टेयर खेत ही सिंचित क्षेत्र में आते हैं. यदि सब काम सरकार को करना पड़ता, तो आज की प्रति हेक्टेयर सिंचाई लागत के हिसाब से सरकार को 10 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते. इससे कॉरपोरेट क्षेत्र को सबक लेना चाहिए जो चौबीसों घंटे सरकार से आर्थिक सहायता की मांग करते रहते हैं.

ऐसे ही नहीं मिलेगा प्रबल समर्थन

मात्र कृषि बजट बढ़ाने से किसानों की फौरी दिक्कतों को दूर नहीं किया जा सकता है. गुजरात में कपास और मूंगफली के वाजिब दाम न मिलने से प्रधानमंत्री मोदी को किसानों का गुस्सा झेलना पड़ा था और बमुशिकल वे विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल कर पाए थे. यदि प्रधानमंत्री मोदी को 2014 जैसा किसानों का प्रबल समर्थन चाहिए, तो उन्हें किसानों को वाजिब दाम दिलाने और नुकसान भरपाई का मुकम्मल इंतजाम करना ही पड़ेगा. इसके बिना किसानों का प्रबल समर्थन उन्हें मिलना असंभव सा लगता है.

यदि यब काम सरकार को करना पड़ता, तो आज की प्रति हेक्टेयर सिंचाई लागत को हिसाब से सरकार को 10 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते. इससे कॉरपोरेट क्षेत्र को सबक लेना चाहिए जो चौबीसों घंटे सरकार से आर्थिक सहायता की मांग करते रहते हैं.

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