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RBI की नाक के नीचे आखिर बैंकों को चूना कैसा लग रहा है!

रेगुलेटर की हैसियत से आरबीआई की यह जिम्मेदारी है कि वह बैंकों पर नजर रखे लेकिन पिछले कुछ साल से एक के बाद हुए बैंकिंग घोटालों ने आरबीआई की कमजोरी भी उजागर कर दी है

Updated On: Apr 29, 2018 07:54 PM IST

Madhurendra Sinha

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RBI की नाक के नीचे आखिर बैंकों को चूना कैसा लग रहा है!

देश के बैंकिंग सेक्टर में जैसे कि तूफान आ गया है. हर दिन किसी न किसी बैंक से घोटाले और घपले की खबरें आ रही हैं. सरकारी बैंकों से अब तक अरबों रुपए के घोटाले की खबरें आ चुकी हैं और अभी भी आ रही हैं.

ताजा खबर आईडीबीआई बैंक से आ रही है. यहां एयरसेल के प्रमोटर शिवशंकरण की कंपनियों को गलत तरीके से 600 करोड़ रुपए देने का मामला सामने आया है. सीबीआई ने इस मामले में बैंक के तत्कालीन चेयरमैन और एमडी राघवन पर मुकदमा दर्ज किया है. आईडीबीआई बैंक में यह दूसरा बड़ा घोटाला है. इसके पहले वहां फिश फार्मिंग के नाम पर 2009 से 2013 के बीच 772 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ था.

थम नहीं रहा घोटालों का सिलसिला

विजय माल्या पहले अरबों रुपए का कर्ज लेकर विदेश भाग गया. उसके बाद नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का मामला सामने आया. उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक के साथ 11,000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की. उसके बाद लगातार बैंक घोटालों की परतें खुलती जा रही हैं. हालत यह है कि कोई भी सरकारी बैंक घोटाले से अछूता नहीं दिख रहा है.

देश का सबसे बड़ा बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तक इससे अछूते नहीं है. वहां भी कनिष्क ज्वेलरी नाम की कंपनी ने 854 करोड़ रुपए का घोटाला किया. इसी तरह कानपुर की स्टेशनरी बनाने वाली कंपनी रोटोमैक के कोठारी ने सात बैंकों से 3700 करोड़ रुपए का घोटाला किया. एनपीए से लदे सरकारी बैंकों के लिए ये घोटाले किसी कैंसर की तरह हैं. इतने बड़े घोटालों के बाद तो इन कुछ बैंकों का डूब जाना साधारण सी बात होती लेकिन हमारी बैंकिंग व्यवस्था इतनी मजबूत है कि ऐसा नहीं हुआ.

नया नहीं है घोटालों का खेल

भारत में बैंकिंग घोटाला कोई नई बात नहीं है. दरअसल आजादी के बाद प्राइवेट बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पीछे यही तर्क दिया गया था. नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद हर्षद मेहता का बैंकों का पैसा गलत तरीके से शेयर बाजार में लगाने का मामला सामने आया था.

कैसे हर्षद मेहता ने बैंकिंग व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाते हुए 3500 करोड़ रुपए का घोटाला कर दिया. उसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर बैंकों के हजारों करोड़ रुपए शेयर बाज़ार में लगा दिए और सेंसेक्स को बुलंदियों पर पहुंचा दिया. इससे पहले उसे पूरी सजा मिल पाती जेल में उसकी मौत हो गई. बैंकों के पैसे कहां गए किसी को पता नहीं.

अब ढाई दशक के बाद फिर से बैंक घोटालों की चारों ओर गूंज है. किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर कैसे ये घोटाले हुए और इन प्रमोटरों को इतना कर्ज कैसे मिला.

कैसे होते हैं घोटाले?

आखिर ये घोटाले कैसे हुए? यह जानने के लिए हमें बैंकिंग सिस्टम को समझना होगा. कर्ज देना बैंकों का सबसे बड़ा काम है और यही उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी है. बैंक कारोबार के लिए, कारखाने लगाने के लिए और आयात-निर्यात के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज देते हैं. इस कर्ज के ब्याज से ही उन्हें लाभ होता है. यह कर्ज कई बार तो हजारों करोड़ रुपए में होता है क्योंकि कई प्रोजेक्ट का आकार उतना ही बड़ा होता है.

Punjab-National-Bank-PNB

इतना बड़ा कर्ज देने के लिए बैंक आम ग्राहक की तरह सिक्योरिटी नहीं ले सकते. आखिर कोई कंपनी जो पांच हजार करोड़ रुपए का कारखाना आदि लगाने जा रही है, कैसे उतनी बड़ी सिक्योरिटी दे सकती है?

तब बात साख और प्रोजेक्ट रिपोर्ट की होती है. कर्ज लेने वाले की कितनी बाज़ार साख है, उसके पास क्या अनुभव है, उसकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं और उसकी कंपनी कितना लाभ कमा सकती है, ये सभी बातें कर्ज देने में महत्वपूर्ण होती हैं. बैंक के अधिकारी और ऑडिटर इनसे जुड़े कागजात की जांच-पड़ताल करते हैं और तयशुदा मानकों के तहत मंजूरी दे देते हैं. इसके बाद कर्ज की मात्रा और किश्तें तय होती हैं. यह सामान्य सी प्रक्रिया है और इसका पालन भी होता है.

किस दबाव में हैं सरकारी बैंक

सरकारी बैंकों में कर्ज देने के लिए कई बार राजनीतिक दबाव भी रहता है जैसा किंगफिशर और विजय माल्या के मामले में हुआ. माल्या के दोनों बड़ी पार्टियों से अच्छे रिश्ते थे और इसलिए कर्ज लेने में तब भी दिक्कत नहीं हुई जब उसकी एयरलाइन कंपनी डूब रही थी. कई मामलों में बैंकों के बड़े अधिकारी भी कर्ज दिलवाने में आगे बढ़ते हैं. हर बार ऐसा किसी गलत इरादे से नहीं होता है बल्कि बैंक को बड़े ग्राहक दिलाने के इरादे से होता है.

बैंकों में नामी कारोबारी या उद्योगपति को कर्ज देने की होड़ होती है. नीरव मोदी के मामले में भी ऐसा ही हुआ. हीरे के इस कारोबारी ने बहुत कम वक्त में इतना बड़ा ब्रांड बना लिया कि हर बैंक उसे कर्ज देना चाहते थे.उसकी बाज़ार में इतनी साख थी कि सलेब्रिटी भी उससे आंखें मूंदकर हीरे खरीदते थे. ये बातें उसे बड़ा कर्ज दिलाने के लिए काफी थीं. बैंकों को कभी इस बात की जरूरत नहीं लगी कि उसे दिए कर्ज की ऑडिट कराई जाए.

रेगुलेटर की भी भूमिका 

भारत में बैंकिंग के नियम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बनाए हुए हैं और बैंक उनके मुताबिक काम करने के लिए बाध्य हैं. इन बड़े घोटालों में रिजर्व बैंक की भूमिका भी सामने आई. केन्द्रीय बैंक ने उस समय बड़े-बड़े कर्ज लेने वालों की ऑडिट नहीं करवाई जो उसे करना चाहिए था. उसे संबंधित बैंकों को ऑडिट कराने का निर्देश देना चाहिए था.

failure of rbi in pnb modi scam

नीरव मोदी के मामले में केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने पंजाब नेशनल बैंक और रिजर्व बैंक को भी चेताया था लेकिन उस समय नीरव मोदी ऐसा सितारा था जिसकी ओर किसी की भी नज़र नहीं गई. बात साफ है कि ग्राहक की साख बैंकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है. यही कर्ज देने का आधार भी बनता है.

अब यह भी कहा जा रहा है कि सरकारी बैंकों का प्राइवेटाइजेशन कर दिया जाए. लेकिन इस तर्क में कोई दम नहीं है. हमने देखा है कि प्राइवेट बैंकों में भी खूब धांधली हुई और उन्हें सरकारी बैंकों में समाहित करना पड़ा. अभी आईसीआईसीआई बैंक और वीडियोकॉन के बड़े कर्ज का एक मामला भी सामने आ रहा है. सरकारी बैंकों का फलना-फूलना जरूरी है क्योंकि जब सामाजिक उत्तरदायित्व की बात आती है तो वे ही सामने आते हैं. बेहतर होगा कि सिस्टम को और चाक-चौबंद बनाया जाए.

रिजर्व बैंक को भी हर बैंक के बड़े कर्जदारों की ओर नज़र रखनी होगी. व्यवस्था में चूक का फायदा घोटालेबाज उठा ही लेंगे. अभी 50 करोड़ रुपए से ज्यादा कर्ज की ऑडिटिंग की बात की जा रही है लेकिन सवाल है कि क्या बैंकों के पास उतनी सुविधाएं और स्टाफ है कि वे इस तरह का कदम उठाएं?

दूसरी ओर कारोबारियों खासकर आयातकों-निर्यातकों को कई-कई बार तुरंत बड़ी रकम चाहिए होती है. अगर उन्हें रकम नहीं मिली तो व्यापार में घाटा हो सकता है जिससे बैंकों का ही कर्ज डूबेगा.

समय आ गया है कि सभी बैंक और रिजर्व बैंक मिलकर इस समस्या का हल निकालें. ऐसा हल जो कारोबारी और बैंकों के हित में हो. बैंकिंग सिस्टम को और चाक-चौबंद बनाया जाए ताकि बड़ा घोटाला होने न पाए.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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