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बाबूगीरी के कारण पीएम के कृषि सुधारों का नहीं हुआ असर

महाराष्ट्र में किसानों के बीच बढ़ते असंतोष की आंच पूरे भारत में फैल सकती है

Updated On: Mar 12, 2018 09:33 PM IST

Yatish Yadav

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बाबूगीरी के कारण पीएम के कृषि सुधारों का नहीं हुआ असर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूमिहीन किसानों को जमीन देने के लिए साहसी योजना तैयार की थी. इसके तहत इन किसानों को विभिन्न सरकारी संस्थाओं और ग्राम पंचायतों की बेकार पड़ी जमीन को देने की बात थी. हालांकि, नीति आयोग और संबंधित मंत्रालयों की राय भूमि सुधारों और जमीन से जुड़े बाकी कानूनों में बदलाव को लेकर अलग-अलग है.

मसलन जमीन की चकबंदी, इसकी अधिकतम सीमा, मालिकाना हक और इसकी बटाईदारी से जुड़े मामले नौकरशाही के जाल में अटके पड़े हैं. यह सरकार और इसके प्रमुख पॉलिसी थिंकटैंक नीति आयोग की प्राथमिकताओं में गंभीर मतभेद की तरफ इशारा करता है. सरकार किसानों का जीवन बेहतर करने के लिए खेती योग्य जमीन को लेकर अहम सुधार चाहती है, लेकिन इस मुद्दे पर नीति आयोग का कदम अपेक्षाकृत सुस्त रहा है.

कौन देगा इसका जवाब?

सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ बाबुओं से पूछा था कि देश की महज 10 फीसदी आबादी का देश में खेती के योग्य 55 फीसदी जमीन पर नियंत्रण क्यों है, जबकि 60 फीसदी आबादी के पास सिर्फ 5 फीसदी जमीन पर कब्जा है.

प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को इस मुद्दे पर फोकस कर प्राथमिकता के आधार पर किसानों की समस्याएं निपटाने का निर्देश दिया था. इस पर नीति आयोग के उच्च अधिकारियों ने पहल की थी, जिन्होंने अगस्त 2017 में कहा कि ज्यादातर के लिए खेती-किसानी अब व्यावहारिक विकल्प नहीं रह गया है.

हालांकि भूमि सुधार की समीक्षा के लिए 17 जून 2016 को एक समिति बनाई गई, जिसे 16 जून 2017 तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी. यहां तक कि 9 अगस्त 2016 को पीएमओ के एक नोट में कहा गया था, 'आदर्श भूमि पट्टा कानून' उपयोग के लायक खेती योग्य जमीन का दायरा बढ़ाएगा, दक्षता लाएगा और ऊसर जमीन का रकबा कम करेगा. इससे इच्छुक जोतेदारों की गैर-कृषि क्षेत्र से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त होगा. यह कानून जमीन में निवेश आकर्षित करेगा. जमीन मालिकों को खेती से जुड़ी सहयोगी सरकारी नीतियों का फायदा मिलेगा.'

देश भर में बढ़ेगा असंतोष का दायरा 

महाराष्ट्र में किसानों के बीच बढ़ते असंतोष की आंच पूरे भारत में फैल सकती है. दरअसल, किसानों की संस्था 'एकता परिषद' ने अक्टूबर 2018 से 'जन अभियान' चलाने की धमकी दी है. यूनियन छोटे और सीमांत किसानों की जिंदगी बेहतर करने के लिए राष्ट्रीय सुधार नीति के अमल के साथ पांच और अन्य मांगों पर तुरंत पहल चाहता है.

इस सिलसिले में फ़र्स्टपोस्ट को मिले एक सरकारी नोट के मुताबिक, 'करोड़ों किसान परिवार या तकरीबन 46.8 करोड़ आबादी (देश की कुल आबादी का तकरीबन 40 फीसदी) अपनी आजीविका के लिए अपने खेतों पर निर्भर है.

हालांकि, खेती का प्रदर्शन ठीक नहीं है और यहां तक कि ये खेत उनकी जरूरतें पूरी करने में भी नाकाम रहे हैं. देश के 67.1 फीसदी किसानों के पास एक हेक्टेयर के भी कम जमीन है, जबकि 17.9 फीसदी किसानों के पास 1 से 2 हेक्टेयर के बीच जमीन है.'

indian farmer

पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन की अगुवाई में बाबुओं के समूह ने 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा था कि कृषि क्षेत्र में ग्रोथ पक्का करने के लिए भूमि सुधार जरूरी है. बाबुओं ने कहा था, 'आजादी के तुरंत बाद देश के सभी राज्यों ने व्यावहारिक तौर पर (अपवादस्वरूप परिस्थितियों को छोड़कर) जमीन के बटाईदारी सिस्टम पर रोक लगा दी थी. पिछले कुछ समय में पाया गया है कि खेती की जमीन के बटाई-पट्टे का अनौपचारिक सिस्टम विकसित हो गया है, लेकिन यह पूरी तरह से अनियमित तरीके से चलता है, जिसके नतीजे बेहतर नहीं रहे हैं. खासतौर पर पट्टेदारों को 'किसान' नहीं माना जाता है, जिससे उन्हें बैंक लोन, सरकारी फायदे और अन्य सहूलियतें नहीं मिल पाती हैं.'

उन्होंने प्रधानमंत्री को यह भी सुझाव दिया था कि 'केंद्र सरकार को जरूरी तौर पर 6 महीने के भीतर आदर्श बटाई कानून पेश करना चाहिए, जिन पर राज्य सरकारों को अमल करना होगा. यह कानून बटाई या पट्टा देने वालों के मालिकाना हक की सुरक्षा करेगा और सांस्थानिक मदद, कर्ज, सरकारी फायदे आदि के मकसद से पट्टेदारों या बटाईदारों की पहचान करेगा.'

किसानों को कोई मदद नहीं

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि छोटे और सीमांत किसानों को संस्थागत लेनदारों (मसलन बैंक, सहकारी संस्थानों आदि) से नहीं के बराबर मदद मिलती है और उन्हें निजी महाजन से कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ता है. इससे उन पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है.

उन्होंने यह भी बताया कि भूमि सुधार नहीं होने के कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है. दरअसल, उपयोगी जमीन के 44 फीसदी हिस्से का प्रदर्शन संभावना के मुताबिक नहीं है और इसके लिए इनोवेटिव उपायों की जरूरत है.

उन्होंने बताया, 'एनडीए सरकार ने खेती के क्षेत्र में बड़ी संख्या में पहल की है, लेकिन अफसरों द्वारा इस संबंध में प्रभावकारी अमल बड़ा मुद्दा रहा है.' सिराज हुसैन की अगुवाई वाले ग्रुप ने प्रधानमंत्री से कहा था: 'जमीन संबंधी रिकॉर्ड का अपेडट नहीं करने और भूमि प्रशासन की विभिन्न इकाइयों का एकीकरण ठीक ढंग से नहीं होने के कारण जमीन के अधिकार को लेकर चीजें अस्पष्ट रह जाती हैं.'

'नतीजतन, अर्थव्यस्था में अहम योगदान के लिए जमीन की पूरी संभावना का उपयोग नहीं हो पा रहा है. इसके अलावा जमीन के अधिकार को लेकर स्पष्टीकरण का अभाव भारतीय अदालतों में बड़ी संख्या में अटके पड़े मामलों की अहम वजह है.'

इन पर फोकस करना जरूरी 

ग्रामीण भारत के हालातों के विश्लेषण के आधार पर कुछ ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिन पर ध्यान देना खेती को सक्षम और टिकाऊ बनाने के लिए जरूरी है.

हुसैन और उनकी टीम द्वारा पहचान किए गए मुद्दे हैं- उत्पादकता बढ़ाना, बेहतर निवेश, तकनीक, मूल्य और बाजार संबंधी सहयोग, जोखिम प्रबंधन, भूमि अधिकार, भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण और बटाईदारी नियमों की समीक्षा, कृषि संबंधी अन्य गतिविधियों के जरिये आजीविका के कई साधन पैदा करना और पूर्वी क्षेत्र में दूसरी हरित क्रांति. हुसैन की अगुवाई में बाबुओं ने यह भी पाया था कि भारत में कृषि का विस्तार मिले-जुले रिकॉर्ड के साथ हो सकता है.

हुसैन का आगे कहना था, 'जनता के लिए किए गए प्रावधान उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे हैं. खेती के विस्तार से जुड़ा सिस्टम कमजोर रहा है और तकनीक का इस्तेमाल अब तक सीमित है. भारत में बैंकों के कुल कर्ज का सिर्फ 6 फीसदी हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों को मिलता है. किसानों पर कर्ज का बोझ उनकी आत्महत्या की बड़ी वजह है. सिर्फ 42 फीसदी छोटे और सीमांत किसानों को फसल बीमा की सुविधा हासिल है.'

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