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फ़र्स्टपोस्ट एक्सक्लूसिव: सिंभावली शुगर ने यूपी कोऑपरेटिव बैंक को भी लगाया चूना

प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय दागी कंपनी के यूपी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड से जुड़े नए फ्रॉड की जांच में लगा

Updated On: Mar 13, 2018 08:31 PM IST

Yatish Yadav

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फ़र्स्टपोस्ट एक्सक्लूसिव: सिंभावली शुगर ने यूपी कोऑपरेटिव बैंक को भी लगाया चूना

पंजाब नेशनल बैंक के बड़े घोटाले के बाद यूपी कोऑपरेटिव बैंक प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय के राडार पर है. दरअसल यूपी कोऑपरेटिव बैंक ने सिंभावली ग्रुप की कंपनी को कथित रूप से 60 करोड़ रुपए का लोन दिया है. जबकि बैंक पहले ही कंपनी को 150 करोड़ रुपए का लोन दे चुका था, जो कंपनी पर बकाया था.

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हाल ही में हापुड़ की सिंभावली शुगर्स लिमिटेड के ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स में 109 करोड़ रुपए का घोटाला करने का मामला सामने आया है. इस मामले की जांच सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसिया कर रही हैं. इस मामले में जांच एजेंसियों ने कंपनी के चेयरमैन गुरमीत सिंह मान, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के दामाद गुरुपाल सिंह और अज्ञात बैंककर्मियों के खिलाफ 22 फरवरी 2018 को मामला दर्ज कर लिया है.

क्या है पूरा मामला?

केंद्र सरकार के उच्च अधिकारियों के मुताबिक यूपी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड ने सिंभावली शुगर्स को जो पहले 152 करोड़ का लोन दिया था, उसे वसूल नहीं पाए थे. 2017 में यह लोन एनपीए बन गया था. लेकिन इतनी बड़ी राशि डूब जाने के बाद भी इसे अनदेखा करते हुए यूपी कोऑपरेटिव बैंक ने महज 11 महीनों के भीतर इसी ग्रुप से जुड़ी एक और कंपनी सिंभावली पावर प्राइवेट लिमिटेड को 60 करोड़ का कर्ज दे दिया.

ये कंपनी भी इस सिंभावली ग्रुप के प्रमोटर गुरमीत सिंह मान की थी. मान के कारनामों की पड़ताल में जांच ऐजेंसियां जुटी हुई हैं. मान पर आरोप है कि उसने ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स से कंपनी के नाम पर कर्ज लेकर उसे अपने व्यक्तिगत जरूरतों के लिए इस्तेमाल कर बैंक को करोड़ों रुपए का चूना लगाया.

फ़र्स्टपोस्ट को 60 करोड़ रुपए के कर्ज स्वीकृति के दस्तावेज मिले हैं जिसपर बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर रविकांत सिंह और सिंभावली पावर प्राइवेट लिमिटेड के गुरमीत सिंह के हस्ताक्षर हैं. दस्तावेजों के मुताबिक सिंह ने 60 करोड़ रुपए के शॉर्ट टर्म लोन की स्वीकृति वाले कागजातों पर हस्ताक्षर 8 फरवरी 2018 को किए थे.

डिफॉल्ट करने के बावजूद क्यों बैंक ने दिया लोन?

सिंभावली पावर प्राइवेट लिमिटेड को लिखे अपने पत्र में रविकांत सिंह ने लिखा है, '21.12.2017 को आपकी तरफ से भेजे अनुरोध को ध्यान में रखते हुए 31.01.18 को प्रबंधन समिति की बैठक में शॉर्ट टर्म क्रेडिट लिमिट के तहत 60 करोड़ रुपए आपकी कंपनी के कामकाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वीकार्य किया जाता है.'

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सिंभावली शुगर्स की तरह इस डील की शर्तें भी काफी मीठी रखी गई हैं. पत्र के मुताबिक लोन की सारी शर्तें चेयरमैन गुरमीत सिंह मान और डायरेक्टर गुरसिमरन मान की व्यक्तिगत गारंटी पर दी गई है. शर्तों के मुताबिक कंपनी को  कैलेंडर ईयर 2018 में कुल लोन का 65 फीसदी 31.12.2018 तक लौटाना पड़ता. इसके अलावा कंपनी को ये सुनिश्चित करना था कि जिस वजह से कर्ज लिया जा रहा है उसका इस्तेमाल उसी काम में किया जाए.

वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सीबीआई को यूपी कोऑपरेटिव बैंक के एनपीए से जुड़े मामलों की जांच करने को कहा था क्योंकि बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर रविकांत सिंह पर आरोप था कि उन्होंने अपने पद का नाजायज फायदा उठाते हुए कई कंपनियों को लाभ पहुंचाया जिसमें केसर इंटरप्राइजेज और सिंभावली शुगर्स लिमिटेड शामिल हैं.

कौन है साजिशकर्ता?

लखनऊ में बीजेपी के संयोजक श्याम बहादुर सिंह ने पीएम मोदी को 1 मार्च 2018 को एक पत्र लिखकर आरोप लगाया कि बैंक के एमडी रविकांत सिंह ने डिफॉल्टर सिंभावली ग्रुप के मालिक गुरमीत सिंह मान के साथ षडयंत्र रच कर सिंभावली पावर को 60 करोड़ रुपए के कर्ज की स्वीकृति दे दी. वो भी ये जानते हुए कि मान की कंपनी सिंभावली शुगर्स ने पिछला 152 करोड़ रुपए का बैंक का बकाया नहीं चुकाया है.

गुरमीत सिंह मान पर पहले से ही ओबीसी बैंक के 109 करोड़ रुपए के फ्रॉड की जांच सीबीआई कर रही है. उसी तरह से यूपी कोऑपरेटिव बैंक के एक और डिफॉल्टर केसर शुगर मिल्स ने भी एमडी सिंह के साथ मिलीभगत करके 85 करोड़ रुपए का घोटाला किया.

कोऑपरेटिव बैंक का एनपीए 2016 में 335.18 करोड़ से बढ़कर मार्च 2017 में 389.79 करोड़ रुपया हो गया. हालांकि बैंक ने दावा किया है कि उसने 2041.53 करोड़ रुपए की छोटी अवधि के फसल लोन 2015-16 में वितरित किए और चीनी मिलों को 1067 करोड़ रुपए दिए लेकिन बीजेपी की लखनऊ इकाई ने पीएम को जानकारी दी कि इस बैंक के अधिकतर कर्जे निर्धारित बैंकिंग नियमों की अनदेखी करते हुए दिए गए हैं. बीजेपी के संयोजक का आरोप है कि अधिकतर कर्जों में बैंक के अस्थायी कर्मचारी ही बैंक के बड़े कर्मचारियों की मिलीभगत से गारंटर बने हुए हैं.

क्या है यह खेल?

यूपी कोऑपरेटिव बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर रविकांत सिंह ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में स्वीकार किया कि सिंभावली शुगर्स को दिया गया 152 करोड़ रुपए का कर्ज एनपीए में तब्दील हो गया है लेकिन उन्होंने बीजेपी के आरोपों को बकवास करार देते हुए कहा कि सिंभावली शुगर्स को दिया हुआ जो कर्ज एनपीए हुआ है वो कर्ज उनके कार्यकाल में नहीं बल्कि पहले पास हुआ था.

रविकांत सिंह के अनुसार उन्होंने तो तय किया है कि किसी भी निजी कंपनी को बैंक से लोन दिया ही नहीं जाए. उन्होंने ये भी दावा किया कि सिंभावली का केस पुराना है और उसे नियमों के तहत डील किया जा रहा है. उन्होंने गड़बड़ी के जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने की भी बात कही.

जब हमने उनसे पूछा कि पहले के बुरे अनुभवों को देखते हुए भी उन्होंने सिंभावली के मालिकों को फिर से 60 करोड़ रुपए के लोन क्यों पास किया तो उन्होंने ऐसे किसी कर्ज की जानकारी होने से ही इंकार कर दिया. उन्होंने कहा, 'गुरमीत सिंह मान को दिए गए ऐसे किसी कर्ज की जानकारी नहीं है. इसी मामले में हमने जब सिंभावली ग्रुप्स से उनका पक्ष जानने की कोशिश कि तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.'

नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रुरल डेवेलपमेंट (नाबार्ड) ने रविकांत के इस दावे को खारिज कर दिया. नाबार्ड आरबीआई के कृषि कर्ज से जुड़े कार्यों पर नजर रखता है. नाबार्ज ने सरकार से इस मामले की पूरी जांच कराने का आग्रह किया है.

नाबार्ड के चीफ जनरल मैनेजर ए के पांडा ने फ़र्स्टपोस्ट से इस बात की पुष्टि की है कि राज्य का सहकारिता विभाग इस मामले को देख रहा है. नाबार्ड ने भी इस मामले की प्रारंभिक जांच कर ली है. पांडा के मुताबिक नाबार्ड ने अपना काम कर दिया है और जांच के बाद रिपोर्ट भी जमा कर दिया गया है, इस मामले पर नियमों के तहत कोऑपरेटिव सोसायटी के रजिस्ट्रार इस पर एक्शन लेंगे.

घोटाले की जांच के लिए मंत्रियों ने उठाई आवाज

यूपी कैबिनेट के कम से कम दो मंत्रियों ने इस संबंध में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस गोरखधंधे की जानकारी देते हुए यूपी कोऑपरेटिव बैंक की गड़बड़ियों की जांच की मांग की है.

पहला पत्र आवास विकास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने 14 अगस्त 2017 को लिखा था. खन्ना ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि वहां पर 53 असिस्टेंट मैनेजरों की नियुक्ति में घूस लिया गया है. खन्ना ने मामले की पूरी जांच और बैंक के मैनजिंग डायरेक्टर रविकांत सिंह के तबादले की मांग की थी. खन्ना की तरह ही कैबिनेट में उनके सहयोगी कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी इसी मामले में सीएम योगी को 21 दिसंबर 2017 को पत्र लिखकर घोटाले से अवगत कराया.

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कृषि मंत्री शाही ने सीएम को लिखे अपने पत्र में जानकारी दी है कि बैंक का 220 करोड़ रुपया चीनी मिलों में फंसा हुआ है. मार्च 2018 तक इसमें से 140 करोड़ रुपया एनपीए में तब्दील हो जाएगा. इसके अलावा कोऑपरेटिव बैंक के एमडी ने यूपी को ऑपरेटिव बैंक के मुख्यालय से एक्सिस बैंक और आईडीबीआई बैंक के कार्यलयों को खाली करने को कहा है जिससे उसे सालाना 4 करोड़ की आय होती थी. शाही ने भी जोर देते हुए कहा कि रविकांत सिंह को पद से हटाना चाहिए और उनके खिलाफ जांच होनी चाहिए.

ओबीसी ने सीबीआई ने सिंभावली के बारे में क्या बताया?

ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स ने सिंभावली शुगर्स को गन्ना किसानों को पैसा देने के लिए लोन पास किया था. बैंक से मंजूरी मिलने का बाद कंपनी ने गन्ना किसानों के नाम, उसकी जमीनों की डिटेल्स और पिछले साल दिए गए गन्ने का विरण ओबीसी बैंक के क्षेत्रीय मेरठ कार्यालय भेज दिया.

इस योजना को लागू करवाने के लिए ओबीसी और सिंभावली शुगर्स के बीच 18 जनवरी 2012 को एक एमओयू पर हस्ताक्षर हुआ. इस एमओयू के तहत तय हुआ कि कंपनी बीज खाद और अन्य जरूरी चीजें किसानों को उपलब्ध कराएगी.

सीबीआई ने अपने शिकायत पत्र में कहा है कि जांच के बाद पता चला कि शर्तों के अनुसार कर्ज की रकम बांटने के लिए 5762 किसानों के निजी खातों का इस्तेमाल किया जाना था. इसके लिए कंपनी को पूरी रकम सिंभावली शुगर्स लिमिटेड के एक एस्क्रो खाता संख्या 05371131001453 में डाल दी गई.

लेकिन वहां से कंपनी ने इन रुपयों को कंपनी के अन्य बैंक जैसे पीएनबी, एसबीआई और यूको बैंक के अपने खातों में ट्रांसफर कर लिया. इस तरह से कंपनी ने बैंक के द्वारा दिए गए कर्जे को दूसरी जगह भेज कर ठिकाने लगा दिया.

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान यूपी कोऑपरेटिव बैंक एम्प्लॉयज एसोसिएशन के पूर्व पदाधिकारी जय सिंह ने कहा कि कोऑपरेटिव बैंक के मैनेजिंग डॉयरेक्टर के कुछ निर्णय आरबीआई के बैंकिंग मानदंडों से उल्ट है. ऐसे में केंद्र सरकार को निश्चित रूप से इस मामले की उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए.

जय सिंह के मुताबिक शुगर मिल्स ने कर्जे नहीं वापस किए हैं ऐसे में इस साल कोऑपरेटिव बैंक का एनपीए और बढ़ जाएगा. जय सिंह के अनुसार ओबीसी बैंक ने एनपीए की वजह से सीबीआई के पास मामला दर्ज कराया है लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि ओबीसी से ज्यादा रकम एनपीए के रुप में फंसे होने के बावजूद यूपी कोऑपरेटिव बैंक ने अभी तक ऐसा नहीं किया है, ऐसे में इसका मतलब साफ है कि प्रबंधन दोषियों को बचाने की कोशिश में लगा हुआ है.

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