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RBI और केंद्र सरकार की रस्साकशी देश के हित में नहीं

देखना ये होगा कि क्या सरकार आरबीआई के बीच सुलह हो जाएगी? ऊर्जित पटेल का कार्यकाल अगले साल सितंबर में खत्म होने वाला है. क्या पटेल अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे?

Updated On: Nov 01, 2018 09:26 PM IST

Kumud Das

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RBI और केंद्र सरकार की रस्साकशी देश के हित में नहीं
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आरबीआई और सरकार के मतभेद पहली बार सार्वजनिक नहीं हुए हैं. पहले भी कई बार वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक गवर्नर की अनबन जगजाहिर हो चुकी हैं. RBI बैंकिंग संस्थानों की नियामक है. हर दो महीने पर RBI आर्थिक नीतियों की समीक्षा करता है. RBI की इन द्विमासिक समीक्षाओं को लेकर सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों में विरोधाभास नजर आता है.

सरकार का जोर नीतियों को पॉपुलिस्ट बनाने पर होता है. लिहाजा सरकार चाहती है कि आरबीई पॉलिसी रेट कम रखे. दूसरी तरफ आरबीआई का फोकस महंगाई पर काबू पाने का रहता है. इसलिए केंद्रीय बैंक पॉलिसी रेट घटाने से बचते हैं. पॉलिसी रेट घटने से लोन सस्ता होता है तो लोगों के पास खर्च करने लायक रकम बढ़ती है. नतीजतन, ज्यादा खर्च से महंगाई बढ़ती है.

पॉलिसी रेट घटाने को लेकर केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच मनमुटाव आम है. अमूमन जनता इसपर खास ध्यान भी नहीं देती हैं. लेकिन इस बार डिप्टी गवर्नर विरल अाचार्या की स्पीच की वजह से इस अनबन ने आम लोगों का ध्यान खींच लिया है. अाचार्या ने कहा था कि सरकार आरबीआई की स्वायत्ता का अतिक्रमण करने की कोशिश कर रही है.

इस विवाद का चर्चा में आना लाजिमी भी है क्योंकि इसका सीधा असर शेयर बाजार पर पड़ने लगा था. हालांकि राहत की बात यह है कि सरकार के बयान को शेयर बाजार ने सकारात्मक तौर पर लिया. यही वजह रही कि बुधवार को 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 550 अंक बढ़कर बंद हुआ. लेकिन जरूरी नहीं है कि शेयर बाजार का यही हाल आगे रहे. सरकार और रिजर्व बैंक का यह विवाद अगर लंबा खिंचता है तो बाजार में गिरावट आ सकती है.

कब हुई इस फसाद की शुरुआत?

इस पूरे फसाद की शुरुआत आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्या के एक स्पीच के साथ हुआ. विरल आचार्या और आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल के  रिश्ते काफी अच्छे हैं. पटेल ने ही आचार्या को न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से सीधा आरबीआई में काम करने के लिए बुलाया था. आरबीआई के कामकाज में सरकार के दखल को लेकर विरल अचार्या ने कहा था, 'सरकार को आरबीआई की स्वायत्ता पर हाथ नहीं डालना चाहिए.'

उनहोंने आगे कहा था कि केंद्रीय बैंक की शक्तियों को कमजोर करना संभावित रूप से विनाशकारी हो सकता है. आचार्या ने अपने भाषण में आरबीआई की स्वायत्ता की पुरजोर वकालत भी की थी.

विरल आचार्या को गुस्सा क्यों आया?

आचार्या के सरकार के प्रति गुस्से की एक वजह है RBI एक्ट, 1934 का सेक्शन 7. दरअसल सरकार ने कई बार ऐसी मंशा जाहिर की है कि वह इस सेक्शन का इस्तेमाल कर सकते हैं. सेक्शन 7 के तहत आरबीआई की पूरी कुंजी सरकार के हाथों में आ जाएगी. सरकार जन कल्याण या पब्लिक इंटरेस्ट के नाम पर इस सेक्शन का इस्तेमाल करने का दावा करती है.

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मीडिया रिपोर्टस की मानें तो आरबीआई गवर्नर पटेल ने यह साफ कर दिया है कि जिस दिन सरकार सेक्शन 7 लागू करेगी, उसी दिन वह अपनी इस्तीफा सौंप देंगे. हालांकि सरकार की तरफ से ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं. एक सरकारी अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्त कर यहां तक कह दिया कि सरकार के पास ऐसा प्रस्ताव फिलहाल नहीं है.

अब हमें उन मुद्दों पर विचार करना चाहिए कि आखिर सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच इतना दुराव कैसे आया? आरबीआई पॉलिसी रेट तय करने में सरकार की बात ना मानकर अपने हिसाब से कदम उठाती है. यह भी विवाद की अहम वजह है. वहीं सरकार ने नीरव मोदी के घोटाला और बैंकों की खस्ता माली हालत की वजह आरबीआई की लापरवाही को बताया है. इन मामलों पर आरबीआई की चुप्पी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अरुण जेटली ने दो दिन पहले यह कहा था कि बैंक जब लोन बांट रहे थे तब आरबीआई कहीं और देख रहा था.

सरकार द्वारा अलग भुगतान नियामक बनाए जाने की योजना भी अनबन की वजहों में अहम है. नियामक फिलहाल आरबीआई के अधिकार क्षेत्र में आता है. आरबीआई और केंद्र में सबसे बड़ी दरार तब पैदा हुई जब सरकार ने आरबीआई के बोर्ड में एक ऐसे शख्स को नॉमिनेट किया जो पहले से ही गवर्नर के खिलाफ बोल रहे थे. रुपए के लगातार अवमूल्यन पर आरबीआई के कोई एक्शन ना लेने से भी सरकार में नाराजगी है. आरबीआई ने पिछले कुछ दिनों में सख्त फैसले लिए हैं. बैंकों के लिए PCA (Prompt Corrective Action) के नियम पहले से ज्यादा सख्त कर दिए गए हैं. इस वजह से बैंक क्रेडिट देने का काम ठीक तरह से नहीं कर पाए हैं. ये भी एक बड़ी वजह है. आरबीआई PCA उन बैंकों पर लगाता है जिनपर NPA बहुत ज्यादा है.

हाल ही में आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल दिल्ली में संसदीय समिति की बैठक में कह दिया था कि नोटबंदी के दौरान कितनी करेंसी सिस्टम में वापस आए उसका हिसाब होना अभी बाकी है. इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करके काफी मजाक उड़ाया. राहुल गांधी ने कहा था, 'सरकार को मैथ्स ट्यूटर की सख्त जरूरत है. कृप्या जल्द आवेदन करें.'

आरबीआई बनाम सरकार के गहराते विवादों को अभी कई मील के पत्थर पार करने बाकी हैं. अगल 19 नवंबर को आरबीआई की बोर्ड मीटिंग होनी है. उस मीटिंग में आरबीआई के शीर्ष अधिकारी और सरकार की तरफ से नॉमिनेटेड एस गुरुमूर्ति फिर आमने-सामने हैं. हालांकि चर्चा ये भी है कि 19 नवंबर को सरकारी प्रतिनिधि नरम रुख अपनाते हुए ऊर्जित पटेल को इस्तीफा ना देने के लिए मना लेंगे. फिलहाल सरकार ने आरबीआई गवर्नर के प्रति सौहार्द्रपूर्ण रवैया अपनाए हुए है. सरकार ने अपने बयान में आरबीआई को स्वायत्ता दिए जाने की भी बात कही है.

क्या सुलह हो पाएगी?

देखना ये होगा कि क्या सरकार आरबीआई के बीच सुलह हो जाएगी? ऊर्जित पटेल का कार्यकाल अगले साल सितंबर में खत्म होने वाला है. क्या पटेल अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे? इस संदर्भ में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के बयानों के जैसे ही हैं. उन्होंने अपनी किताब, 'I do what I do' के विमोचन के दौरान कहा था कि आरबीआई गवर्नर के रूप में काम करते हुए उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था.

आरबीआई और फाइनेंस मिनिस्टर के बीच बढ़ती दूरियों की एक नई वजह 30 अक्टूबर को हुई FSDC की बैठक भी बताई जा रही है. उस बैठक में मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने आरबीआई और HFC सेक्टर में पनप रहे लिक्विडिटी क्राइसिस की ध्यान दिलाया है. इसके लिए आरबीआई को ही जिम्मेदार बताया गया था. हालांकि आरबीआई ने इस आरोप को पूरी तरह खारिज कर दिया है.

केद्रीय बैंक का कहना है कि चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि सिस्टमेटिक ड्यूरेबल लिक्विडिटी के जरिए आरबीआई सरकारी बॉन्ड की खरीदारी खुले बाजार के माध्यम से करता है ताकि उन सेक्टर को आर्थिक तंगी से ना गुजरना पड़े. हालांकि मंत्रालय के अधिकारी आरबीआई की इस दलील से सहमत नहीं हैं. वैसे अभी आरबीआई और सरकार के बीच तनाव को नियंत्रित कर लिया गया है. लेकिन यह कब तक मुमकिन होगा कि यह तो आने वाले समय पर निर्भर करेगा.

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