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देसी अनुभव वाले अर्थशास्त्री हैं, नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष राजीव कुमार

नवनियुक्त उपाध्यक्ष राजीव कुमार नीति आयोग को क्या दिशा देते हैं, आने वाले समय में यह देखना काफी दिलचस्प रहेगा

Updated On: Aug 06, 2017 12:43 PM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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देसी अनुभव वाले अर्थशास्त्री हैं, नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष राजीव कुमार

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया का स्थान कौन लेगा, अब  इन अटकलों पर विराम लग गया है. केंद्र सरकार ने डॉ. राजीव कुमार को इस पद पर नियुक्त कर दिया है. अब अगले माह में वह सरकार के इस शीर्ष थिंक टैंक की अगुवाई करेंगे.

राजीव कुमार सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ फेलो हैं. देश के कॉरपोरेट जगत में उनका नाम काफी जाना-पहचाना है. वह बड़े उद्योगों की संस्था फिक्की के डायरेक्टर जनरल रहे हैं. वह सीआईआई जैसे प्रभावशाली कॉरपोरेट संगठन के मुख्य अर्थशास्त्री भी रह चुके हैं. वह पहल इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक हैं. यह गैर सरकारी संगठन आर्थिक नीतियों के उन्नयन के लिए काम करता है.

वह पुणे की डीम्ड यूनिवर्सिटी गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स ऐंड इकोनॉमिक्स के चांसलर भी हैं. देश की शीर्ष वित्तीय और आर्थिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं. इनमें भारतीय रिजर्व बैंक के बोर्ड के नामित स्वतंत्र निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट, दिल्ली के निदेशक, लखनऊ के गिरि इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज आदि उल्लेखनीय हैं.

अचरज भरी नियुक्ति

एशियन डेवलपमेंट बैंक के 1995 से 2005 तक प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट का पद भी वह संभाल चुके हैं. उनको आप देश में पला-बढ़ा देसी टेक्नोक्रेट और अर्थशास्त्री कह सकते हैं. उनकी यह खूबी शायद अन्य दावेदारों पर भारी पड़ी है. पर उनके नाम से कुछ लोगों को अचरज हो सकता है.

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नीति आयोग में विवेक देबरॉय, रमेश चंद और वी. के. सारस्वत जैसे वरिष्ठ नामों के इतर उनकी नियुक्ति हुई है. यह सच है कि डॉ. राजीव कुमार का प्रोफाइल उतना हाई-फाई नहीं है, जितना पूर्ववर्ती अरविंद पनगढ़िया, डॉ. मनमोहन, मोंटेक सिंह अहलूवालिया का रहा है. पर मनमोहन सिंह की तरह उनके पास दीर्घ देसी अनुभव है.

ArvindPanagariya

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया

घरेलू उद्योग, व्यापार और ज्वलंत आर्थिक मुद्दों पर उनका अपना नजरिया है और उनमें प्रबल जनमत के खिलाफ जाकर लिखने-सोचने का माद्दा है. देश में रह कर ही उन्होंने अपना अधिकांश शोध लेखन और काम किया है.

बीजेपी जब विपक्ष में थी, तब अनेक आर्थिक मुद्दों पर उसका नजरिया अलग था, और डॉ. राजीव कुमार का अलग. पर वह अपने नजरिए पर अडिग रहे हैं. पर केंद्र में सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपानीत मोदी सरकार का नजरिया कई आर्थिक मुद्दों पर बदल चुका है और दोनों ही आज एक पिच पर खड़े दिखाई देते हैं. ऐसे कई मुद्दे हैं.

खुदरा बाजार में विदेशी निवेश के समर्थक

डॉ. राजीव कुमार खुदरा बाजार में विदेशी निवेश के शुरू से प्रबल समर्थक रहे हैं. 2011 में जब खुदरा व्यापारियों और बीजेपी, सीपीएम जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रबल विरोध के कारण मनमोहन सिंह सरकार को अपने निर्णय से कदम वापस खींचने पड़े, तब डॉ. राजीव कुमार ने लिखा था कि महज एक करोड़ खुदरा और थोक व्यापारियों ने देश के 1.20 अरब लोगों को बंधक बना लिया और देश की आर्थिक प्रगति को बाधित कर दिया है.

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उन्होंने हिंदी के मशहूर लेखक मुंशी प्रेमचंद के हवाले से खुदरा व्यापारियों को शोषणकारी ठहराया और कहा कि इस क्षेत्र में कामकाज की स्थितियां बेहद खराब हैं और कोई सामाजिक सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं है. गनीमत है कि अब मोदी सरकार का नजरिया बदल चुका है और वालमार्ट जैसी विदेशी दानवी कंपनी को इस क्षेत्र में निवेश की अनुमति मिल गयी है.

narendra modi in allahabad

भूमि अधिग्रहण अधिनियम के घोर विरोधी

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम का राजीव कुमार ने घोर विरोध किया और अंत तक उस पर कायम रहे. उन्होंने खुल कर कहा कि इससे देश के बुनियादी ढांचे के विकास को जबरदस्त खतरा पैदा हो जाएगा. विशेषकर  यू.पी., बिहार, झारखंड और प. बंगाल में, जहां बुनियादी ढांचे के विकास की भारी आवश्यकता है.

इस अधिनियम से पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की अवधारणा ही भंग हो जाएगी, जिसकी तीव्र आर्थिक विकास के लिए देश को नितांत आवश्यकता है. किसानों को मिलने वाले भुगतान, खेतिहर मजदूरों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति, पूंजी लाभ में हिस्सेदारी आदि प्रावधानों को वह विकास-विरोधी मानते हैं. खनन और खनिज (विकास और नियंत्रण) विधेयक के वह सख्त खिलाफ हैं और मानते हैं कि इससे औद्योगिक विकास अवरुद्ध होगा. उनका मानना है कि इन दोनों विधेयकों से देश की उच्च विकास दर गाथा पर विराम लग सकता है.

manmohan singh

मनरेगा कभी रास नहीं आया

राजीव कुमार को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (मनरेगा) कभी पसंद नहीं आई. वह इसे बोझ मानते थे. उनका विश्लेषण है कि इससे उद्योग को श्रमिकों की किल्लत हो गई है. मनरेगा के कारण कंस्ट्रक्शन और कपड़ा उद्योग ज्यादा पूंजी-साध्य हो गया है, लागत बढ़ गई है.

मनरेगा अनुत्पादक है. इससे अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा होगा, सरकारी घाटा पैदा होगा, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा बना रहेगा. वह इसी श्रेणी में ही खाद्य सुरक्षा कानून को भी रखते हैं. आज प्रधानमंत्री मोदी मनरेगा को मनमोहन सिंह सरकार की विफलताओं का स्मारक मानते हैं.

कॉरपोरेट के लिए धड़कता है दिल

कई टीवी बहसों में राजीव कुमार का सान्निध्य मिला है. पर उनका दिल कभी गरीबों के लिए नहीं धड़कता है. गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी पर उनसे कभी मतैक्य नहीं हो पाया. उन्हें कॉरपोरेट सेक्टर को मिलने वाली औसतन पांच लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी से कभी कोई ऐतराज नहीं रहा.

असल में वह इस आंकड़े को भ्रामक मानते हैं. कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) को अनिवार्य बनाये जाने को वह विवेकसंगत निर्णय नहीं मानते हैं. उन्हें सकारात्मक कारणों से अन्ना हजारे आंदोलन के पीछे विदेशी फंड और शक्तियों का हाथ नजर आता था, क्योंकि लोकपाल की मांग विदेशी पूंजी के निर्बाध प्रवाह के लिए उन्हें मौजूं कदम लगता था.

एयर इंडिया के निजीकरण के शुरू से ही प्रबल समर्थक हैं और उन्हें चीनी पूंजीवाद में कई विशेषताएं नजर आती हैं. अब वह नीति आयोग को क्या दिशा देते हैं, आने वाले समय में यह देखना काफी दिलचस्प रहेगा. वैसे भी इतनी बड़ा दायित्व उन्हें पहली बार मिला है.

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