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बैंक घोटाला: घोटालेबाजों के चेहरे बदले, फ्रॉड का तरीका नहीं

पहले हर्षद मेहता फिर विनसम डायमंड्स और नीरव मोदी के जालसाजी का तरीका लगभग एक जैसा था लेकिन बैंकों ने कभी नहीं चेता

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Feb 20, 2018 11:54 AM IST

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बैंक घोटाला: घोटालेबाजों के चेहरे बदले, फ्रॉड का तरीका नहीं

पंजाब नेशनल बैंक भले ही 11,400 करोड़ रुपए के इस घोटाले से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करे कि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है. लेकिन इस बात से बैंक के सीएमडी सुनील मेहता भी इनकार नहीं कर सकते कि पीएनबी के बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे छोटे अफसरों से मिलीभगत करके नीरव मोदी और मेहुल चोकसी ने इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया.

दिलचस्प है कि एक तरफ छोटे अधिकारी बैंक के SWIFT सिस्टम का बेजा इस्तेमाल करके नीरव मोदी के लिए जाली लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी कर रहे थे तो दूसरी तरफ बैंक को लगातार तीन साल तक ‘एक्सिलेंस इन बैंकिंग विजिलेंस’ का अवॉर्ड मिलता रहा.

पीएनबी के जाली एलओयू के आधार पर दूसरे बैंकों की विदेशी शाखाओं ने नीरव मोदी को जमकर लोन दिया. ऐसा पहली बार नहीं है कि बैंकों में इस तरह का घोटाला हुआ है. संयोग देखिए कि 2012 में भी पंजाब नेशनल बैंक को चूना लग चुका है. तब भी एक डायमंड ज्वैलर ने ही बैंक को 6000 करोड़ रुपए का झटका दिया था. इतना ही नहीं घोटाले का तरीका भी यही था, जो नीरव मोदी ने आजमाया है. यानी एक के बाद एक डायमंड ज्वैलर्स पंजाब नेशनल बैंक को चूना लगाते रहे और बैंक अपनी विजिलेंस पर गर्व करता रहा. पहला मामला विनसम डायमंड्स ग्रुप का है.

क्या था विनसम डायमंड्स का खेल?

विनसम डायमंड्स ने 2011 में 14 अलग-अलग बैंकों से 3420 करोड़ रुपए जुटाए थे. 2012 की पहली तिमाही तक लोन लिमिट बढ़ाकर 4617 करोड़ रुपए कर दिया था. ग्रुप की तीन कंपनियों को लोन बांटे गए. इसमें विनसम डायमंड एंड ज्वैलर्स को 4366 करोड़ रुपए, फॉरएवर प्रीसियस डायमंड एंड ज्वैलरी को 1932 करोड़ रुपए और सूरज डायमंड्स को 283 करोड़ रुपए का लोन दिया गया.

भारतीय बैंकों ने विनसम डायमंड्स के लिए स्टैंडबाय लेटर्स ऑफ क्रेडिट जारी किया था. यह इंटरनेशनल बैंक के लिए एक तरह की गारंटी थी. भारतीय बैंकों ने यह लेटर स्टैंडर्ड ऑफ साउथ अफ्रीका, स्टैंडर्ड चार्टर्ड लंदन और स्कोटिया बैंक के नाम जारी किया था. ये सभी विदेशी बैंक विनसम ग्रुप की कंपनियों को गोल्ड सप्लाई करते थे. अभी तक की इस व्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं थी. मामला साफ था. अगर विनसम ग्रुप बुलियन बैंक को पैसे नहीं चुका पाता है तो भारतीय बैंक उसका पैसा चुकाते.

पूरा लोन लेने के बाद कुछ महीने में जतिन मेहता ने कंपनी के डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया. मेहता ने सबसे पहले 13 अगस्त 2012 को फॉरएवर प्रीसियस डायमंड एंड ज्वैलरी से इस्तीफा दिया. उसके बाद 9 नवंबर 2012 को फ्लैगशिप कंपनी विनसम डायमंड्स का भी पद छोड़ दिया.

Mumbai: A Punjab National Bank (PNB) branch in Mumbai on Wednesday. PNB detected fraudulent transcations worth USD 1.77 bn in one of its branches today. PTI Photo by Shashank Parade (PTI2_14_2018_000161B)

मेहता का दावा था कि उनकी कंपनी इसलिए पेमेंट नहीं कर पाई क्योंकि विनसम के कस्टमर्स को नुकसान हुआ है. उनका कहना था कि यूएई के ज्वैलर्स को डेरिवेटिव में लॉस हुआ है और वे विनसम को पेमेंट नहीं कर सकते हैं. लिहाजा पूरा पैसा भारतीय बैंकों को चुकाना पड़ा.

2013 के मध्य से विनसम ग्रुप ने लोन पर डिफॉल्ट करना शुरू कर दिया था. उसी साल अक्टूबर में बैंक ने विनसम ग्रुप को विलफिल डिफॉल्टर घोषित कर दिया. विलफुल डिफॉल्टर का मतलब है कि विनसम ग्रुप जानबूझकर लोन नहीं चुका रहा है.

2014 की शुरुआत में बैंक ने सीबीआई का दरवाजा खटखटाया. सीबीआई और मुंबई पुलिस के इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) ने विनसम के दफ्तरों पर छापे मारे.

कहां गया जतिन मेहता?

नीरव मोदी की तरह जतिन मेहता भी करोड़ों रुपए का लोन लेकर विदेश भाग गया और किसी को भनक तक नहीं लगी. यूके की रजिस्ट्रार इंफॉरमेशन कंपनीज 'कंपनीज हाउस' के मुताबिक, जतिन रजनीकांत मेहता अब कैरेबियन में सेंट किट्स एंड नेविस का नागरिक है. उसने 1 अगस्त 2016 को एक नई कंपनी शुरू कर ली. इस कंपनी का नाम डायमंड डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी (यूके) लिमिटेड है.

विनसम के फाउंडर जतिन ने अपने पीछे बैंकों की वसूली के लिए कुछ नहीं छोड़ा था. तब टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, विनसम की वैल्यू सिर्फ 250 करोड़ रुपए थी जबकि लोन 6000 करोड़ रुपए का था.

जतिन मेहता की भारत में कुछ खास संपत्ति नहीं थी. और यही हाल नीरव मोदी का भी है. दोनों ने अपनी ज्यादातर संपत्तियां यहां से पहले ही समेट ली हैं. मेहता किराए पर ही अपना ऑफिस चलाया करते थे. यह धंधा कुछ चुनिंदा और भरोसेमंद स्टाफ और मैनेजर के जरिए चलता था. जांच एजेंसियों के हाथ मेहता के कुछ रिश्तेदारों की प्रॉपर्टी लगी.

सालों पहले भी ऐसा ही हुआ था 

ऐसा नहीं है कि विनसम पहली कंपनी थी जिसने बैंकों को ऐसे धोखा दिया था. इससे कई साल पहले हर्षद मेहता ने भी कुछ इसी तरीके से करोड़ों का फर्जीवाड़ा किया था.

हर्षद मेहता शेयर ब्रोकर थे और बाजार में पैसा लगाने के लिए रेडी फॉरवर्ड (आरएफ) डील के जरिए बैंकों से फंड उठाते थे. आरएफ डील के मायने शॉर्ट टर्म लोन से है. बैंकों को जब शॉर्ट टर्म फंड की जरूरत पड़ती है तो वे इस तरह का लोन लेते हैं. इस तरह का लोन कम से कम 15 दिनों के लिए होता है.

इसमें एक बैंक सरकारी बॉन्ड गिरवी रखकर दूसरे बैंकों को उधार देते हैं. रकम वापस करने के बाद बैंक अपना बॉन्ड दोबारा खरीद सकते हैं. इस तरह के लेनदेन में बैंक असल में सरकारी बॉन्ड का लेनदेन नहीं करते हैं. बल्कि बैंक रसीद जारी करते थे. इसमें होता ये है कि जिस बैंक को कैश की जरूरत होती है वह बैंक रसीद जारी करता था. यह हुंडी की तरह होता था.

इसके बदले में बैंक लोन देते हैं. दो बैंकों के बीच यह लेनदेन बिचौलियों के जरिए किया जाता है. मेहता को इस तरह के लेनदेन की बारीकियों की जानकारी थी. बस फिर क्या! हर्षद मेहता ने अपनी पहचान का फायदा उठाते हुए हेरफेर करके पैसे लिए. फिर इसी पैसे को बाजार में लगाकर जबरदस्त मुनाफा कमाया.

लालच बड़ी बला है 

हर्षद मेहता बाजार में ज्यादा से ज्यादा पैसा लगाकर मुनाफा कमाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने जाली बैंकिंग रसीद जारी करवाई. इसके लिए उन्होंने दो छोटे-छोटे बैंकों को हथियार बनाया. बैंक ऑफ कराड और मेट्रोपॉलिटन को-ऑपरेटिव बैंक में अपनी अच्छी जानपहचान का फायदा उठाकर हर्षद मेहता बैंक रसीद जारी करवाते थे.

इन्हीं रसीद के बदले पैसा उठाकर वह शेयर बाजार में लगाते थे. इससे वह इंट्रा डे में प्रॉफिट कमाकर बैंकों को उनका पैसा लौटा देते थे. जब तक शेयर बाजार चढ़ता रहा, किसी को इसकी भनक नहीं पड़ी. लेकिन बाजार में गिरावट के बाद जब वह बैंकों का पैसा 15 दिन के भीतर नहीं लौटा पाए, उनकी पोल खुल गई. हर्षद मेहता के करतूतों का खुलासा होने के बाद ही शेयर बाजार के लिए रेगुलेटर की कमी महसूस हुई. इसी के बाद मार्केट रेगुलेटर सेबी का गठन हुआ.

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