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अब तक के बजट भाषण में पुराना है शेरो-शायरी का अंदाज

बजट भाषण देते वक्त वित्त मंत्री शेरो-शायरी का भी सहारा लेते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बजट का भाषण उबाऊ न हो

FP Staff Updated On: Feb 01, 2018 01:58 PM IST

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अब तक के बजट भाषण में पुराना है शेरो-शायरी का अंदाज

सरकार और आमजन के लिए बजट एक खास मौका होता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इसके लिए खास तैयारियां काफी पहले से शुरू हो जाती हैं. सबसे अहम बात यह कि बजट के दस्तावेज बजट आने से दो दिन पहले आधी रात को प्रिंटर्स को सौंपे जाते हैं. संसद में जो भाषण वित्त मंत्री देते हैं उसे वे खुद या मुख्य आर्थिक सलाहकार की मदद से लिखते हैं. हालांकि भाषण का मसौदा क्या हो, इसके लिए वित्त सचिव और एक-दो आला अधिकारियों के भी विचार ले लिए जाते हैं. आपने देखा होगा कि बजट भाषण देते वक्त वित्त मंत्री शेरो-शायरी का भी सहारा लेते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बजट का भाषण उबाऊ न हो.

मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अन्य नेताओं से इतर संस्कृत में यह श्लोक पढ़ा-सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुख भागभवेत। ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः. इसका अर्थ है- सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

मनमोहन सिंह के भाषण में विक्टर ह्यूगो

जेटली ही अकेले ऐसे वित्त मंत्री नहीं हैं जो भाषण के दौरान नामी-गिरामी लोगों या उनकी रचनाओं को उद्धृत करते हैं. कभी प्रणब मुखर्जी भी अपने बजट भाषणों में कौटिल्य के अर्थशास्त्र का जिक्र करते थे. इतना ही नहीं, 1991 में राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई को अपने बजट भाषण में फ्रेंच लेखक विक्टर ह्यूगो की एक पंक्ति, नो पावर ऑन अर्थ कैन स्टॉप एन आइडिया हूज टाइम हैज कम दोहराकर नई शुरुआत की थी. यानी कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसके आने का वक्त हो चुका है. संसद के बाहर-भीतर मनमोहन सिंह के इस कथन की काफी चर्चा हुई थी.

चिदंबरम ने तिरुवल्लूर को किया था याद

पी चिदंबरम ने 1996-97 का बजट पेश किया था. अपने भाषण में उन्होंने तमिल ऋषि-कवि तिरुवल्लुवर की ये लाइनें इयात्तरालुम, एत्तालुम, कत्तालुम, कट्टा; वकुथालम वल्लाथ अरासु दोहराई थीं. इसका अर्थ है-धन बढ़ाने लायक बनो, इसे संभालो और इसकी रक्षा करो; और बेहतर है इसे बांटो और अपनी अपनी बेहतर पहचान बनाओ. संसद में भाषण देते वक्त उन्होंने गालिब का एक शेर भी पढ़ा था, रेख्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था.

जब दिनकर की लाइनें सबको छू गईं

यशवंत सिन्हा ने 1998-99 में एनडीए सरकार का बजट पेश किया. वित्त मंत्री के तौर पर सिन्हा का यह पहला बजट भाषण था. सिन्हा ने मौका न गंवाते हुए और बरसों से चली आ रही परिपाटी को आगे बढ़ाते हुए रामधारी सिंह दिनकर की कुछ लाइनें पढ़ी थीं. ये लाइनें थीं- अंधेरी रात के सितारों का रंग फीका पड़ रहा है, अब पूरा आसमान तुम्हारा है.

ममता पढ़ती थीं शेर

ममता बनर्जी अपने जमाने में शेर पढ़ती थीं. 2002 का उनका रेल बजट भाषण सबको याद है क्योंकि तब ममता ने शहीदों के सम्मान में की जाने वाली बजट घोषणाओं से पहले लता मंगेशकर की एक प्रसिद्ध गीत की पंक्तियां पढ़ी थीं. कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गोरखा कोई मद्रासी, सरहद पर मरने वाला हर वीर था भारतवासी. जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी. शहीदों की याद में ममता बनर्जी के ये श्रद्धांजलि शब्द सबकी आंखें नम कर गई थीं.

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