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एक्सक्लूसिव: सरकारी बैंकों की निगरानी के लिए बनेगी नई संस्था!

सरकारी बैंकों के लगातार बढ़ते घाटों की वजह से पीएमओ एक नई संस्था बनाने वाली है

Updated On: May 21, 2018 08:59 PM IST

Yatish Yadav

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एक्सक्लूसिव: सरकारी बैंकों की निगरानी के लिए बनेगी नई संस्था!

सरकारी बैंकों में हो रहे घोटाले और उसके बढ़ते एनपीए को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय बैंक बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) में बदलाव करना चाहता है. पीएमओ अब बीबीबी की जगह एक नई संस्था बनाने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहा है. ये संस्था एक होल्डिंग कंपनी के रूप में काम करेगी और सरकारी बैंकों में सुधार की रूपरेखा तैयार करेगी.

अभी हाल ही में पंजाब नेशनल बैंक में हुए बड़े घोटाले के बाद बैंकिंग सेक्टर में सुधार की मांग तेजी से उठ रही है. लिहाजा नई संस्था बनाने का विचार बैंकिंग सुधारों के लिए काफी अहम माना जा रहा है. पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो इकनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल ने सलाह दी है कि बीबीबी को अपग्रेड कर दिया जाए और उसे एक होल्डिंग कंपनी बना दिया जाए. यह कंपनी ही बैंकों के बड़े अधिकारियों की नियुक्ति रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की सलाह पर करे. इकनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की सलाह के मुताबिक जो नई संस्था बने वो सीधे पीएमओ को रिपोर्ट करे न कि वित्त मंत्रालय को.

क्या है पीएमओ की तैयारी?

फ़र्स्टपोस्ट को प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्र ने बताया कि इकनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल ने सलाह दी है कि वित्त मंत्रालय के 'डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज' को नई बनने वाली संस्था से अलग रखा जाए. यह डिपार्टमेंट बैंकिंग, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन और इंश्योरेंस कंपनियों के कामकाज पर नजर रखता है. इसका मतलब साफ है कि इकनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल नहीं चाहता है कि वित्त मंत्रालय का 'डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज' बैंकों के डायरेक्टर्स और अन्य बड़े अधिकारियों की नियुक्ति में किसी तरह का हस्तक्षेप करे.

ये भी पता चला है कि इकनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल के सुझाव, जिसका शीर्षक है-‘काउंटिन्यूइंग रिफार्म्स इन पीएसबी फॉर बेटर पर्फार्मेंस’, पर पीएमओ गंभीरता से विचार कर रहा है. ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस संबंध में फैसला लिया जा चुका है और जल्द ही बैंक बोर्ड ब्यूरो को अपग्रेड करने की घोषणा हो सकती है.

कानून बदलने की जरूरत!

बीबीबी की जगह नई होल्डिंग कंपनी बनाने के लिए सरकार को कुछ कानूनों में बदलाव करना पड़ेगा. इसके लिए बैंक एलोकेशन ऐक्ट,1980 में संशोधन करना पड़ेगा. सूत्रों के मुताबिक इसके अलावा इससे जुड़े कुछ अन्य सुझाव भी हैं जिनकी जांच-पड़ताल करने में पीएमओ जुटा हुआ है.

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सरकार से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि बैंक बोर्ड ब्यूरो ने अप्रैल 2016 में काम करना शुरू किया था. इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों के बड़े पदों पर होने वाली नियुक्तियों के लिए नाम प्रस्तावित करना था.  लेकिन वो इस काम में नाकाम रहा. बैंकिंग सेक्टर में जिस तरह के सुधारों की जरूरत थी वह उसे भी पूरा नहीं कर पाया.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने बीबीबी के कामकाज में न केवल हस्तक्षेप किया बल्कि कई अहम मुद्दों पर टांग अड़ाकर बीबीबी का काम मुश्किल कर दिया. बीबीबी जैसी स्वायत्त संस्था को कई महत्वपूर्ण मामलों में नजरंदाज किया गया. वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक, डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने बीबीबी की शुरुआत से ही उसके पर कतर दिए थे. डिपार्टमेंट ने बीबीबी के कई अधिकारों को समाप्त कर दिया था जिसका इस्तेमाल बीबीबी सरकारी बैंकों के शीर्ष पदों पर नियुक्ति के लिए करना चाहता था.

हस्तक्षेप से परेशान बीबीबी!

वित्त मंत्रालय के एक और उच्च अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि सरकारी बैंकों के शीर्ष पदों पर नियुक्ति में डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज का रोल एक पोस्ट ऑफिस जैसा था और उन्होंने उन नियुक्तियों में मंत्रालय का कोई भी हस्तक्षेप हाल में नहीं देखा था.

वित्त मंत्रालय के इस अधिकारी के मुताबिक 'अधिकतर फैसले राजनीतिक स्तर पर लिए जाते हैं और वो लोग मुख्यरूप से केवल नामों को शार्टलिस्ट करते हैं. सचिव केवल उस पैनल का हिस्सा होता है जिसमें आरबीआई गवर्नर, डिप्टी गवर्नर, एक्सपर्ट और एक पूर्व बैंक चेयरमैन शामिल रहते हैं. इन सबके बावजूद प्रस्तावित नामों को उच्च स्तर से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद ही नियुक्त किया जाता है. उस आदेश की समीक्षा में डिपार्टमेंट का रोल सीमित होता है. इन सबके बावजूद अगर सरकार को लगता है कि नई संस्था इस काम को अच्छे से अंजाम दे सकती है तो सरकार को एक मौका दिया जाना चाहिए.'

अधिकारी का कहना है, 'हालांकि नई संस्था बनने के बाद भी ये उम्मीद बेमानी है कि नई संस्था के 100 फीसदी प्रस्तावों को राजनीतिक स्तर पर मान लिया जाएगा. ऐसा शायद संभव भी नहीं है और उपयुक्त भी नहीं होगा.'

कैसे शुरू हुआ था बैंक बोर्ड ब्यूरो?

बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना का विचार सरकार के मन में पी जे नायक कमिटी की 2014 की रिपोर्ट के बाद आया था. इस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि सरकार को कई बैंकों के कामकाज से दूरी बना कर रखनी चाहिए क्योंकि अगर बैंक डायरेक्टर्स के चयन में थोड़ी भी गड़बड़ी हुई तो बोर्ड का गवर्नेंस कमजोर हो जाएगा.

नायक पैनल ने अपनी रिपोर्ट में टिप्पणी की थी कि सरकारी बैंकों की मुश्किलें कई बाहरी कारणों से होती हैं. इसमें आरबीआई के साथ वित्त मंत्रालय का दोहरा रेगुलेशन, बोर्ड का संविधान (जहां पर किसी भी डायरेक्टर को स्वतंत्र कैटेगरी में रखने में मुश्किल हो) और प्राइवेट बैंक से बढ़ती दूरी शामिल है.

सरकार को चाहिए वो सरकारी बैंकों में प्रभावशाली बोर्ड का गठन करे. इन शक्तिशाली बोर्ड का काम हो कि वो बैंकों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दें. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2015 के बजट भाषण में बीबीबी के स्थापना को लेकर घोषणा की थी. उन्होंने कहा था कि सरकारी बैंकों के कामकाज और शासन के सुधार के लिए सरकार एक स्वायत्त संस्था बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना करना चाहती है. यह ब्यूरो सरकारी बैंकों के शीर्ष पदों पर बैठने वाले सही लोगों को खोजकर नियुक्त करेगी. यह बैंकों के लिए होल्डिंग और इनवेस्टमेंट कंपनी शुरू करने का एक अंतरिम कदम है.'

क्या कहना था सरकार का?

अगस्त 2015 में सरकार ने एक बयान जारी करके कहा, 'ब्यूरो में ख्यातिप्राप्त प्रोफेशनल्स और अधिकारी होंगे जो सरकारी बैंकों में पूर्णकालिक डायरेक्टर्स और नॉन एग्जीक्यूटिव चेयरमैन की नियुक्ति करने वाले अप्वाइंमेंट्स बोर्ड की जगह लेंगे. इसके अलावा ब्यूरो के लोग सभी सरकारी बैंकों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के संपर्क में रहेंगे. उन बैंकों के विकास और वृद्धि के लिए नई रणनीतियों को बनाने में उनकी मदद करेंगे.'

बैंक बोर्ड ब्यूरो और डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज के बीच अधिकारों को लेकर टकराहट

बैंक बोर्ड ब्यूरो की शुरुआत के समय सामान्य तौर पर ये समझा गया कि बैंकों के शीर्ष पदों पर होनेवाली नियुक्तियों को लेकर ब्यूरो को ज्यादा अधिकार दिए जाएंगे. 8अप्रैल 2016 को हुई एक बैठक (इसमें वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा और तत्कालीन आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन शामिल थे) में यह महसूस किया गया कि सरकारी बैंकों में प्रभावी कॉर्पोरेट गवर्नेंस सुनिश्चित करने के लिए बीबीबी को और अधिक अधिकार दिए जाएं.

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इसी के अनुसार संशोधित ‘टर्म ऑफ रेफरेंस’ वित्त मंत्रालय के पास मंजूरी के लिए भेज गया. लेकिन डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने बीबीबी द्वारा मांगे गए कम से कम 4 अधिकारों को देने से इंकार कर दिया. इनमें अपने प्रस्तावों को सीधे कैबिनेट की अप्वाइंटमेट कमिटी को भेजना, सरकारी बैंकों के बोर्ड्स के नॉन ऑफिशियल डायरेक्टर्स की खोज और चयन का अधिकार शामिल है.

बीबीबी को कितने अधिकार मिले?

कुल मिलाकर बीबीबी को काम करने के लिए 13 अधिकार दिए गए जिसमें बैंकों के पूर्णकालिक डायरेक्टर्स के प्रस्ताव, चयन और नियुक्ति का अधिकार, एक उपयुक्त व्यवस्था को विकसित करने का अधिकार जिससे योग्य और उच्च प्रदर्शन करने वाले सरकारी बैंकों के पूर्णकालिक डायरेक्टरों की खोज और चयन शामिल है.

इसके अलावा बीबीबी को नॉन एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के चयन और नियुक्ति को प्रस्तावित करने का अधिकार दिया गया. बीबीबी को बैंको में ऐसी व्यवस्था विकसित करने की भी जिम्मेदारी दी गई जिससे वो अहम पदों पर नियुक्ति के लिए एक उपयुक्त नेतृत्व करने वाले उत्तराधिकारी का नाम समय पर एक निश्चित व्यवस्था के अंतर्गत तैयार करके रख सके.

डिपार्टमेंट से जुड़े एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'प्रस्तावित नई संस्था का सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट करना एक सही दिशा में उठाया सही कदम है. उनके अनुसार नियमों में संशोधन करके इसे सुविधाजनक बनाया जा सकता है लेकिन नई संस्था में अधिक से अधिक विशेषज्ञों को पैनल में रखना चाहिए ताकि वह न केवल बाजार से सही टैलेंट चुन सके बल्कि सरकारी बैंकों में नई ऊर्जा डालने के लिए नई रणनीति बना सके.

क्या है बीबीबी की राय?

बीबीबी के तत्कालीन चेयरमैन विनोद राय ने जुलाई 2017 में वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर इस बात पर जोर दिया कि ब्यूरो और सरकार में सही तरीके से समन्वय स्थापित होना चाहिए. विनोद राय ने अपने पत्र में लिखा कि अगर सरकार इस बात के लिए गंभीर है कि ब्यूरो, सरकारी बैंक की गवर्नेंस के मुद्दों को सही तरीके से संबोधित कर सके तो इसके लिए ब्यूरो और सरकार के बीच बेहतर संबंध होना चाहिए.

सरकारी बैंकों के विशेषज्ञों की संस्था होने के नाते ब्यूरो वित्त मंत्रालय के लिए महत्वपूर्ण ईकाई साबित होना चाहिए था जो कि मंत्रालय को सरकारी बैंकों के प्रदर्शन और शासन के संबंध में सुझाव दे सके. लेकिन राय का मानना था कि ब्यूरो का काम अब केवल नियुक्ति से संबंधित रह गया है.

राय ने ये साफ कर दिया था कि भारत अब एक ऐसा पब्लिक सेक्टर बैंकिंग सिस्टम चाहता है जो कि देश को लंबी अवधि के लिए ग्रोथ का रास्ता दिखा सके. ऐसा नहीं जिसकी बुनियाद कर्ज पर टिकी हो और ये कर्ज देश के करदाताओं की जेब से भरा जा रहा हो.

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