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ऑर्गेनिक खेती: उत्तराखंड के किसानों की लाइफलाइन बनने की उम्मीद

खेती लायक जमीन और मिट्टी की उर्वरता घटने के कारण किसानों के पास आखिरी विकल्प ऑर्गेनिक फार्मिंग है

Updated On: Jul 30, 2017 06:34 PM IST

Namita Singh

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ऑर्गेनिक खेती: उत्तराखंड के किसानों की लाइफलाइन बनने की उम्मीद

उत्तराखंड एक ऐसा पहाड़ी राज्य है जिसमें राज्य की 75 से 85 फीसदी जनसंख्या की रोजी रोटी खेती पर आधारित है. लेकिन खेती की जमीन घटने और आधुनिक तकनीक का अभाव कृषि क्षेत्र को निरंतर कमजोर कर रहा है.

किसानों की समस्याएं दिन ब दिन बढ़ती जा रही है. इसका नतीजा पिछले महीने प्रदेश में दो किसानों की आत्महत्या के रूप में सामने आया. प्रदेश के 9 जिले पहाड़ में हैं. पहाड़ में पानी की कमी और खेती लायक जमीन नहीं होने से कृषि योग्य भूमि और उर्वरता में कमी आई है.

क्या है रास्ता?

राज्य में खेती लायक जमीन सिर्फ 12 फीसदी है, जो खेती से पलायन की समस्या को जन्म देती है. ऐसे में पारंपरिक खेती को छोड़कर अन्य वैकल्पिक खेती ही समाधान के रूप में दिखाई देती है. आर्गेनिक फार्मिंग एक ऐसे समाधान के रूप में सामने आया है जो राज्य में किसानों की स्थिति बेहतर कर सकता है.

क्या है ऑर्गेनिक फार्मिंग?

ऑर्गेनिक फार्मिंग या जैविक खेती कृषि का वह तरीका है जिसमें फसलों की वृद्धि के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और आनुवांशिक रूप से संशोधित जीवों का प्रयाग न करते हुए , प्राकृतिक संसाधनों और अनुप्रयोगों का ही प्रयोग किया जाता है.

ऑर्गेनिक फार्मिंग 1990 के बाद अधिक प्रचलन में आया. आज अनुमानित तौर पर 170 देशों में ऑर्गेनिक खेती की जा रही है. इनमें ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और अमेरिका प्रमुख हैं.

भारत में भी ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं बनाई गई हैं जैसे राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, एवं जैविक मूल्य श्रृंखला विकास इत्यादि. सिक्किम और उत्तराखंड राज्यों ने 2003 में जैविक राज्य बनने का संकल्प लिया था.  सिक्किम ने 2016 में यह लक्ष्य हासिल कर लिया परन्तु उत्तराखंड अभी काफी पीछे है.

क्या हैं ऑर्गेनिक खेती के फायदें?

उत्तराखंड में बारिश पर निर्भर रहने वाले इलाकों में ऑर्गेनिक खेती लाभदायक है. जैविक पदार्थ नमी को रोकते हैं अतः सिंचाई के पानी में बचत होती है. गोबर और केंचुओं से बनी खाद जमीन को उपजाऊ बनाती है.

ऑर्गेनिक भोजन अच्छी गुणवत्ता, स्वाद और स्वाथ्यवर्धक होने के कारण अच्छी मांग के साथ काफी अधिक दामों में बिक रहा है.  पहाड़ों में घटते पशुधन पर अंकुश लगेगा क्योंकि पालतू पशु ऑर्गेनिक खेती के पूरक हैं.

आर्गेनिक खेती के विकास के लिए और बढ़ावा देने के लिए  राज्य सरकार द्वारा उत्तराखंड ऑर्गेनिक कमोडिटी बोर्ड का गठन 2003 में किया गया. इसका मकसद ग्रामीण विकास के साथ राज्य को भारत की जैविक राजधानी बनाने का है.  बोर्ड किसानों और उनके खेतों को अपना कर उन्हें जैविक रूप में परिवर्तित कराता है और फिर इन खेतों का जैविक प्रमाणिकरण करता है. बोर्ड खेती के प्रति किसानों के कौशल और जानकारी बढ़ाने का काम भी करता है.

कितनी होती है ऑर्गेनिक खेती?

वर्तमान में लगभग 60000 हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती हो रही है. तकरीबन 25000 किसान इसमें लगे हुए हैं.  राज्य में कुछ जिलों को जैविक जिला घोषित करने की भी योजना है.

कुछ क्षेत्रों को आर्गेनिक ब्लॉक बनाने की भी योजना है. राज्य निर्माण के बाद पहाड़ों से आने वाली उपजों की मांग में वृद्धि हुई है. शहरों में आयोजित होने वाली प्रदर्शनियों में पर्वतीय जैविक उत्पाद हाथोहाथ बिक जाते हैं.

farmer

फिलहाल सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थानों द्वारा जैविक उत्पादों वाले ग्रीन रेस्टॉरेंट खोले जा रहें हैं.  इन उत्पादों की खरीद के लिए  लगातार प्राइवेट कंपनियां उत्तराखंड सरकार के संपर्क में हैं.

इसी हफ्ते नाबार्ड के 36वें फाउंडेशन डे पर आयोजित सेमिनार में नाबार्ड उत्तराखंड के चीफ जनरल मैनेजर डी. एन. मागर ने ऑर्गेनिक खेती की उत्तराखंड में अपार संभावनाओं पर बल दिया.  मई में बेल्जियम से आए प्रतिनिधि मंडल ने सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत से मिलकर ऑर्गेनिक फार्मिंग और हर्बल फूड प्रोसेसिंग में इनवेस्टमेंट की इच्छा जाहिर की.

फूड प्रोसेसिंग पर फोकस

पिछले साल दिसंबर में एसोचैम और फूड प्रोसेसिंग मिनिस्ट्री के एक कॉन्फ्रेंस में उत्तराखंड गवर्नर  पॉल ने कहा कि यदि आर्गेनिक फूड प्रोसेसिंग पर ध्यान दिया जाता है तो उत्तराखंड को ग्लोबल लेवल पर पहचान मिल सकती है. इससे रोजगार के कई रास्ते भी खुल सकते हैं. उत्तराखंड में लगभग 1500 ऑर्गेनिक ब्लॉक्स हैं जो विश्व बाजार में अपनी पहचान बना सकते हैं.

अभी हाल ही में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में ऑर्गेनिक फार्मिंग सभी दलों के घोषणापत्र का प्रमुख अंग था.  जैविक उत्पाद परिषद् की पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मी राणा बताती हैं कि ऑर्गेनिक फार्मिंग पहाड़ में पहले से होती रही है. उन्होंने कहा, 'हम रुद्रप्रयाग से ऑर्गेनिक हल्दी जर्मनी भेजते हैं. रुद्रप्रयाग ऑर्गेनिक जिला घोषित किया जा चुका है. चौलाई, बासमती और राजमा जैसी फसलों को हम जापान और जर्मनी के बाजार में भेज रहे हैं. इससे किसानों की माली हालत में बड़ा सुधार आया हैं.' ऑर्गेनिक फार्मिंग को और भी बड़े पैमाने पर करने की तयारी है.

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