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नोटबंदी@एक साल: काला धन नहीं मिटा लेकिन कुछ फायदे जरूर हुए

नोटबंदी ने ऑनलाइन लेन-देन की ओर मजबूरी में धकेला था, पर अब सामान्य परिस्थितियों में यह काम प्रशिक्षण और साक्षरता बढ़ाने के जरिये होना चाहिए

Alok Puranik Alok Puranik Updated On: Nov 08, 2017 12:38 PM IST

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नोटबंदी@एक साल: काला धन नहीं मिटा लेकिन कुछ फायदे जरूर हुए

एक साल हो गया नोटबंदी को. विकट हाहाकारी दौर गुजर गया. नोटबंदी सिर्फ आर्थिक कार्रवाई नहीं थी. गहरे राजनीतिक निहितार्थ छिपे थे इसमें. पब्लिक को तमाम समस्याएं हुईं, फिर भी नोटबंदी की वजह से बीजेपी ने कोई चुनाव हारा हो, ऐसा सामने नहीं आया. यूपी विधानसभा के महत्वपूर्ण चुनावों में नोटबंदी की बतौर राजनीतिक मुद्दा परीक्षा हो चुकी है. विपक्ष के लिए यह मुद्दा कारगर नहीं रहा.

नोटबंदी जिन उद्देश्यों के लिए की गयी थी, वह भले ही पूरे तौर पर हासिल नहीं किए गए हों, पर और बहुत कुछ नोटबंदी से हासिल हुआ है. अगर नोटबंदी को कक्षा सात की डिबेट की विषय ना बनाया जाए, जिसमें या पक्ष या विपक्ष में ही बोलने की इजाजत होती है, तो साफ होता है कि नोटबंदी ने बहुत कुछ दिया है भारतीय अर्थव्यवस्था को और बहुत कुछ डूबा भी नोटबंदी में.

नोटबंदी के एक साल के बाद तमाम मसलों के विश्लेषण में एक बात खास है कि नकद के अलावा भी भुगतान के दूसरे माध्यमों की जगह अर्थव्यवस्था में तेजी से बनी है. पेटीएम अब अपरिचित ब्रांड नहीं है कईयों के मोबाइल में है. नोटबंदी ने पेटीएम कंपनी को यह आत्मविश्वास दिया कि यह कंपनी अगले तीन सालों में करीब 50 करोड़ ग्राहक हासिल करने के लक्ष्य पर काम कर रही है. पचास करोड़ की संख्या का मतलब है कि अमेरिका और पाकिस्तान की पूरी आबादी को ही पेटीएम का ग्राहक बना दिया जाना.

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यह लक्ष्य एक साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था. नोटबंदी के बाद पेटीएम को जबरदस्त बढ़ावा मिला, पेटीएम जैसे उन माध्यमों को बढ़ावा मिला, जो नकदहीन भुगतान सुनिश्चित करते हैं. इस समय देश में करीब तीन करोड़ क्रेडिट कार्ड हैं और करीब 9 करोड़ डेबिड कार्ड हैं. ये नकदहीन अर्थव्यवस्था के आधारभूत ढांचे के हिस्से हैं. अब से करीब एक साल पहले जब अर्थव्यवस्था नोटबंदी के चलते नकदी की न्यूनता से जूझ रही थी, तब पेटीएम, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, भीम एप्लीकेशन समेत तमाम नकदहीन माध्यमों को बढ़ावा मिला था.

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नकद-न्यूनतम की तरफ का सफर

पेटीएम अगर अपने लक्ष्य में कामयाब हो गया,तो पचास करोड़ ग्राहक का मतलब है कि इस मुल्क की एक तिहाई से ज्यादा जनसंख्या पेटीएम के दायरे में आ चुकी होगी. ऐसी खबरें लगातार आयीं कि किसी महिला ने अपनी हाऊसिंग सोसाइटी की कामवाली बाईयों को डेबिट कार्ड का प्रयोग सिखाया. ऐसी खबरें लगातार आयीं कि सत्तर साल के दादाजी के ऑनलाइन बैंकिंग सीखने की कोशिश की. यानी कुल मिलाकर नकदहीन लेनदेन के प्रति जागरुकता का माहौल बना.

नवंबर में नोटबंदी के फौरन के बाद तो यह मजबूरी की वजह से बना. कैश है नहीं तो पेटीएम या कार्ड का इस्तेमाल मजबूरी थी. उस दौर में गोलगप्पे से लेकर गोभी तक पेटीएम के जरिये बिकी है. पर उस वक्त की मजबूरी बाद में एक हद तक आदत के तौर पर भी नियमित हो गयी.

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मजबूरी के दौर में जिन्होने नकदहीन लेनदेन शुरु किए थे, वो अब भी अपने लेन-देन का बड़ा हिस्सा नकदहीन ही कर रहे हैं, मजबूरी में नहीं, बल्कि सुविधाओं और कैश बैक लेने के लिए. कैश बैक-यानी खर्च की गयी रकम की वापसी-यह शब्द कईयों की डिक्शनरी में नोटबंदी के बाद ही आया है. तो नकदहीन लेन-देन में बढ़ोत्तरी के आधार पर अगर नोटबंदी का मूल्यांकन किया जाए, तो यह योजना कामयाब मानी जाएगी. लोगों को नकदहीन लेनदेन के लिए मजबूरी में ही सही, जितनी गति से नोटबंदी ने प्रेरित किया, उतनी गति आम परिस्थितियों में हासिल करना असंभव था.

नकद-न्यूनतम का सकारात्मक असर

अर्थव्यवस्था को नकदहीन किया जाना तो असंभव है, खास तौर पर भारत जैसे देश में. जहां पर अशिक्षा, वित्तीय साक्षरता के मसले हैं. जहां पर कई इलाकों में बुनियादी टेलीकाम इन्फ्रास्ट्रक्चर की समस्या है. मुंबई समेत किसी भी महानगर के मुख्य इलाकों में भी कई बार नेटवर्क काम नहीं कर रहा होता है. ऐसी सूरत में कई बार बिना नकद के काम नहीं चलता.

हालांकि अर्थव्यवस्था के लिए यही श्रेष्ठ होता है कि जितना काम नकद बिना चल जाए, उतना ही ज्यादा लेन-देन का रिकार्ड रखने का इंतजाम संभव हो पाता है. बिचौलियों की घुसपैठ की आशंकाएं खत्म हो जाती हैं. सीधे खाते में रकम का लेनदेन संभव हो जाता है.

आंकड़ों के मुताबिक आधार आधारित प्रमाणीकरण और खातों में सीधे लेन-देन के चलते सरकार ने 2016-17 में करीब 57000 करोड़ रुपये की बचत कर ली. नवंबर 2016 में यूनीफाइड पेमेंट सिस्टम (भीम एप्लीकेशन के जरिये ट्रांसफर आदि) के जरिये रकम का हस्तांतरण लगभग नगण्य था, अक्तूबर 2016 में यह बढ़कर 7057 करोड़ रुपये का हो गया. गोलगप्पेवालों से लेकर चायवालों तक के बीच पेटीएम का नाम अपरिचित ना रहा.

कर दायरे में बढ़ोत्तरी

हालांकि नोटबंदी की शुरुआत में एक उद्देश्य को मुख्य बताया गया था-वह था कालेधन पर प्रहार. नोटबंदी से बड़ी उम्मीद यह थी कि करीब तीन लाख करोड़ रुपये का कालाधन रद्द हो जाएगा. ऐसा नहीं हुआ. सारा काला धन सिस्टम में आ गया यानी सारा का सारा धन वापस जमा हो गया. और गौर की बात यह है कि इस तरह के आकलन में नेता ही नहीं, बैंकिंग एक्सपर्ट तक विफल हुए.

कई एक्सपर्ट कह रहे थे कि कालेधन वाले अपने बड़े नोटों को वापस बैंक में जमा नहीं करवायेंगे, इसलिए वो नोट रद्द हो जायेंगे यानी काला धन इन रद्द नोटों की शक्ल में रद्द हो जाएगा. पर ऐसा नहीं हुआ. यानी काले धन की वापसी के उद्देश्य पर अगर नोटबंदी की स्कीम का मूल्यांकन हो तो यही कहा जाएगा कि नोटबंदी कालेधन पर कड़ा प्रहार करने में कामयाब नहीं हुई है.

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यह बात इस संदर्भ में और समझी जानी चाहिए कि कैश करेंसी में उपस्थित काला धन कुल काली संपदा एक छोटा हिस्सा भर होता है. यानी जो काला धन मकान, स्विस बैंकों के खातों, सोने आदि की शक्ल में बदल लिया गया था, पहले ही, वह कालाधन तो इस नोटबंदी से कतई अछूता रहा है.

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अब जबकि आंकड़े सामने हैं कि प्रतिबंधित करेंसी का करीब 99 प्रतिशत सिस्टम में वापस आ गया, तो यह मान ही लिया जाना चाहिए नोटबंदी कालेधन पर निर्याणक प्रहार करने में कामयाब नहीं हुई. पर इसके दूसरे सकारात्मक परिणाम जरुर सामने आए. नकदहीनता की वजह से कश्मीर में पत्थरबाजी कम हुई क्योंकि उन्हे देने के लिए नकद रकम अलगाववादियों के पास नहीं थी.

नोटबंदी अपने मूल उद्देश्य यानी कालेधन पर प्रहार करने में भले ही कामयाब नहीं रही हो, पर सरकार की वित्तीय दिक्कतें इससे एक हद कम हुईं. 18 सितंबर 2017 तक 2017-18 में प्रत्यक्ष कर संग्रह में करीब 16 प्रतिशत का इजाफा हुआ. 2012-13 में कुल चार करोड़ 72 लाख करदाता थे, 2016-17 में यह बढ़कर 6 करोड़ 26 लाख हो गए. नोटबंदी के बाद की गयी कार्रवाईयों में 5,400 करोड़ रुपये की अघोषित आय पकड़ में आयी. 2016-17 में करीब नब्बे लाख नए करदाता जुड़े कर व्यवस्था में. हर साल जितने करदाता आम तौर पर बढ़ते हैं, उसके मुकाबले यह करीब 80 प्रतिशत ज्यादा बढ़ोत्तरी है यह. यह सब नोटबंदी के चलते हुआ, लोगों के मन में खौफ आया है कि सरकार कुछ कड़े कदम उठा सकती है. इसलिए सरकार का कर आधार व्यापक हुआ है.

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असर ब्याज दर पर

ब्याज दरों में कमी ऐसा प्रभाव है जो नोटबंदी का घोषित उद्देश्य नहीं था. पर देखा यह जा रहा है कि तमाम बैंक हाऊसिंग लोन समेत कई तरह के लोन की ब्याज दरों में कमी कर रहे हैं. इसकी एक वजह नोटबंदी से जुड़ती है. तमाम बैंकों के पास कई लोगों ने अपने पुराने नोट जमा कराए. बैंकों के पास बहुत नोट आए.

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बैंकों का कारोबार नोट रखने से नहीं, नोटों को आगे लोन पर देने उनसे ब्याज कमाने से चलता है. यानी बैंकों पर दबाव बना कि वह कर्ज दें, कर्ज देना हो तो ब्याज दर सस्ती कर के दें. इस तरह से ब्याज दरों में एक गिरावट देखी गयी, जिसका क्रेडिट नोटबंदी को दिया जाना चाहिए.

कुल मिलाकर नोटबंदी ऐसी फायरिंग साबित हुई, जो निशाने पर ना लगने के बावजूद कुछ सकारात्मक परिणाम लेकर आयी. और इसका एक सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि लोग नकदहीन अर्थव्यवस्था की तरफ उन्मुख हुए. नकद-न्यूनतम अर्थव्यवस्था के कई फायदे हैं, कालेधन के नए सृजन पर इसमें एक हद तक रोक लग जाती है. पर नकदहीन अर्थव्यवस्था के रास्ते में अब भी बहुत रोड़े हैं.

मुल्क की आबादी एक बड़ा हिस्सा अब भी एटीएम के इस्तेमाल से वाकिफ नहीं है. ऑनलाइन लेन-देन में पूरी आश्वस्ति महसूस नहीं करता है. यानी ऑनलाइन लेनदेन के क्षेत्र में व्यापक जनशिक्षण की जरुरत है. नोटबंदी ने ऑनलाइन लेन-देन की ओर मजबूरी में धकेला था, पर अब सामान्य परिस्थितियों में यह काम प्रशिक्षण और साक्षरता बढ़ाने के जरिये होना चाहिए.

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