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नोटबंदी@एक साल: भ्रष्टाचार न रुके तो हर दशक में एक बार हो नोट बैन

Jagdish Shettigar Updated On: Nov 08, 2017 04:14 PM IST

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नोटबंदी@एक साल: भ्रष्टाचार न रुके तो हर दशक में एक बार हो नोट बैन

नोटबंदी ने अर्थव्यव्यवस्था को बीते एक साल में किस तरह प्रभावित किया है, यह हमारी आंखों के आगे है. सो, अब वक्त खुद से सवाल पूछने का है कि नोटबंदी का मकसद पूरा हुआ या नहीं. नरेंद्र मोदी सरकार का यह फैसला लीक से हटकर था, सो इसकी भारी आलोचना हुई. आलोचना करने वालों में दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों ही धाराओं के अर्थशास्त्री शामिल हैं.

सियासी विरोधियों ने आलोचना की है तो वह बिल्कुल समझ में आने वाली बात है क्योंकि भारत जैसे देश में अभी लोकतंत्र के लिहाज से मन-मानस का परिपक्व होना बाकी है. इसी तर्ज पर वामपंथी टेक के अर्थशास्त्रियों की आलोचना को भी परे किया जा सकता है. हालांकि कायदे से उन्हें इस फैसले के साथ होना चाहिए था क्योंकि यह कदम कालेधन को बाहर निकालने के लिए उठाया गया था.

सबसे ज्यादा चौंकाऊ आलोचना उस एक व्यक्ति की रही जिसका दावा है कि वह कालेधन के मसले का एक्सपर्ट है और उसने एक दशक पहले ही इस विषय पर किताब लिखकर लोगों को जागरुक बनाने की कोशिश की थी. अचरज की बात ये भी है कि आर्थिक सुधारों की तरफदारी करने वाले कुछ ऐसे अर्थशास्त्रियों ने भी नोटबंदी की आलोचना की जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं और भारत के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता किसी खास के काम के लिए मिलने वाले सरकारी न्यौते तक ही सीमित है.

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सरकार बदल जाय और सरकार बदलने के साथ उससे मिले न्यौते से झांकता मौका खत्म हो जाय तो किसी भी अन्य कंसल्टेन्ट की तरह ये अर्थशास्त्री भी अपने विदेशी एम्पलॉयर(नियोक्ता) के पास लौट जाते हैं. ऐसे चंद अर्थशास्त्री अब भी नोटबंदी की आलोचना कर रहे हैं जबकि उनकी आलोचना में कोई आर्थिक तर्क नहीं है. अब ऐसे अर्थशास्त्रियों की बौद्धिक ईमानदारी का क्या कहना!

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आलोचक अक्सर पूछते हैं कि नोटबंदी के दायरे में आयी 99 फीसद नकदी बैंकिंग-व्यवस्था में फिर से लौट आयी है तो क्या सरकार कालाधन की पहचान कर पायी? इनका तर्क कुछ ऐसा है मानो बैंकों में जमा की गई सारी रकम सफेद धन हो. कालाधन का अर्थ जानने की उनकी काबिलियत पर किसी को संदेह नहीं है. कम पढ़े-लिखे भ्रम में पड़कर सोचते हैं कि जाली(फर्जी) नोट का मतलब है, कालाधन सो उनकी इस नासमझी को दरकिनार किया जा सकता है.

कालाधन का सीधा-सरल मतलब है वह धन जिसे टैक्स-अदायगी के मकसद से तैयार किए गए ब्यौरे में दर्ज नहीं किया गया, उसके बारे में जानकारी नहीं दी गई. चूंकि नोटबंदी के दायरे में आई सारी ही रकम बैंकिंग व्यवस्था में लौट आई है सो आयकर विभाग का काम अब आसान हो गया है. अब यह जिम्मा आयकर विभाग का बनता है कि वह 8 नवंबर 2016 से लेकर 31 दिसंबर 2016 तक की अवधि में बैंकों में जमा नकदी की खोजबीन करे और पता लगाये कि उसमें कितना हिस्सा कालाधन है.

एक बार आयकर विभाग आमदनी के स्रोत के बारे में पता लगाना शुरु कर दे तो वह कालाधन की पहचान करने की हालत में आ जायेगा बशर्ते आयकर विभाग के अधिकारी रातो-रात धनकुबेर बनने का हाथ आया मौका लपकने का लालच छोड़ सकें.

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नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने मकसद को हासिल किया सो वह बधाई की हकदार है. इस मकसद को हासिल करने में नोटबंदी की तरह कोई और भी उपाय कारगर हो सकता था, ऐसा सोच पाना मुश्किल है. नोटबंदी के दायरे में आयी सिर्फ 1 फीसद नकदी बैंकिंग-व्यवस्था में नहीं लौट सकी है तो उसकी वजह बड़ी जाहिर सी है. बैंक खाते में जमा करके जिन लोगों ने अपने कालेधन का खुलासा किया उनका अपराध बस इतना है कि उन्होंने अपनी जायज आमदनी को टैक्स अदायगी से बचाने के लिए छुपाया.

यह जानकर कि 8 नवंबर 2016 के बाद उनके लिए ऐसा मौका हमेशा के लिए बंद हो चुका है, ऐसे लोगों ने आयकर विभाग की जांच के दायरे में आने का जोखिम उठाया और नियमों के हिसाब से पेनाल्टी टैक्स जमा किया. दूसरे शब्दों में कहें तो इन लोगों ने अपने धन को पाक-साफ बनाने का विकल्प चुना सो उनकी आमदनी का स्रोत जायज कहलायेगा.

लेकिन दूसरी तरफ यह भी दिख रहा है कि नोटबंदी के दायरे में आयी रकम का एक फीसदी से भी कम नगदी बैकिंग-व्यवस्था के भीतर नहीं लौटी है और इस नगदी का ब्यौरा सार्वजनिक होने से रह गया. इस मामले में अपराध सिर्फ इतना भर नहीं है कि उसे आयकर की अदायगी से बचने के लिए छुपाकर रखा गया. दरअसल, कहानी इससे आगे जाती है. ऐसे मामले में आमदनी का स्रोत ही सवाल के दायरे में आ जाता है. अपनी आमदनी के इस हिस्से का ब्यौरा लोगों ने घोषित नहीं किया तो इसलिए कि यह रकम अवैध तरीके से कमायी गई थी और एक हद तक इस रकम का सबंध राजनीतिक वर्ग या फिर नौकरशाही से है.

राजनीतिक वर्ग और नौकरशाही के लोग सिर्फ पेनाल्टी टैक्स देने भर से बचकर नहीं निकल सकते. अगर आमदनी का यह हिस्सा घोषित किया जाता तो इस अवैध रकम के मालिकान कहीं ज्यादा बड़े अपराध पर लागू होने वाले कानूनों के तहत गिरफ्तार किए जाते. यह भी सकता था कि कई राजनेताओं और नौकरशाहों के करिअर पर ही ग्रहण लग जाता.

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बढ़ सकती है विकास दर

नोटबंदी सरीखे प्रधानमंत्री के चौंकाऊ फैसले की एक बड़ी आलोचना यह कहकर की जाती है कि इससे आर्थिक वृद्धि में कमी आयी है. यह बात सच है कि चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में वृद्धि दर 5.7 फीसद की रही जो हाल के सालों की सबसे कम वृद्धि-दर है. हालांकि इस बात की संभावनाएं हैं कि बाकी बची तीन तिमाहियों में अर्थव्यवस्था उड़ान भरे और सालाना वृद्धि-दर 6.7 से 7.0 फीसद तक पहुंच जाये और अगर ऐसा होता है तो यह पिछले साल की वृद्धि दर यानि 7.1 फीसद से थोड़ा ही कम होगा. इस बात की भी आशंका है कि सबसे तेज गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के एतबार से भारत चीन के मुकाबिल पिछड़ जाये.

अर्थव्यवस्था की सुस्ती को लेकर चैन तो किसी के मन में नहीं है लेकिन सदन में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वृद्धि-दर के 2 प्रतिशत घट जाने की बात कही थी लेकिन वृद्धि-दर का घटना इस सीमा तक नहीं हुआ है. इससे हमारी राजनीतिक संस्कृति का पता चलता है क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिष्ठा सिर्फ इसी बात के लिए नहीं कि उन्होंने दस साल तक सरकार चलायी बल्कि इस बात के लिए भी है कि वे अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ हैं.

नोटबंदी सरीखा साहसी फैसला जब लिया गया तो यह बात मानकर चली जा रही थी कि अर्थव्यवस्था के आगे बाधाएं आयेंगी. नकदी की किल्लत हो तो उपभोग पर खर्च कम होता है और इसका असर सकल घरेलू उत्पाद पर पड़ता है. यह तो शुरुआती स्तर की अर्थशास्त्र की किताबों की बात है. एक तथ्य यह है कि फैसला लेने से पहले प्रधानमंत्री ने इसके बारे में राष्ट्र के सामने ऐलान किया जिससे जाहिर होता है कि सरकार नोटबंदी के कारण आमजन को होने वाली परेशानियों के बारे में आगाह थी और उसे इस बात का भी भान था कि अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर हो सकता है.

ऐसा ना होता तो यह फैसला रोजमर्रा के आधार पर जारी की जाने वाली अधिसूचना के जरिए होता. प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान करके लोगों को अपने विश्वास में लिया तो वे इसके लिए बधाई के पात्र हैं क्योंकि यह एक बहुत बड़ा फैसला था और वे जानते थे कि इस फैसले से लोगों के आगे परेशानियां आ सकती हैं.

Illustration photo of an India Rupee note

बहरहाल, चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में आयी वृद्धि दर की कमी के लिए सिर्फ नोटबंदी (या फिर इसके साथ अब जीएसटी को जोड़कर) को दोष देना उचित नहीं है. अगर ऐसी वजह थी तो फिर वृद्धि-दर 2015-16 के 7.6 फीसद से फिसलकर 2016-17 में 7.1 प्रतिशत पर कैसे आ गई, इस वक्त तो कोई नोटबंदी नहीं हुई थी.

बड़ी संभावना यही है कि चालू वित्तवर्ष में वृद्धि-दर में उतनी कमी नहीं आएगी जितनी कि पिछले साल आयी थी बशर्ते 2017 में दिख रही तेज-रफ्तारी को कायम रखा जाय. दोषारोपण के खेल में लगे आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ दो तथ्यों को बड़ी आसानी से भुला देते हैं, एक तो यह कि अमेरिका और यूरोजोन सरीखे निर्यात के हमारे बड़े मोर्चों पर तंगी की हालत चल रही है और खेतिहर क्षेत्र में आर्थिक सुधारों का विस्तार ना हो पाने के कारण ग्रामीण संकट जारी है.

सौभाग्य कहिए कि अमेरिका और यूरोजोन में इस साल के कुछ महीनों से फिर से आर्थिक मोर्चे पर बेहतरी आयी है. यह बदलाव बड़ा अहम है क्योंकि यूरोपीय संघ और अमेरिका के बाजार में हमारे निर्यात के कुल हिस्से के एक तिहाई की खपत होती है और यह हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था के 15 फीसद हिस्से के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

कारोबार को सुगम बनाने के लिहाज से भारत ने लंबी छलांग लगायी है, दिवालियापन के हालात से उबरने के लिए नया बैंकरप्सी कोड बनाया गया है और जीएसटी जैसे बड़े कदम(हालांकि इसे अभी दुरुस्त करना जरुरी है) उठाये गये हैं. इससे कारोबारी जगत में उत्साह का माहौल है. इस साल के आखिर तक अर्थव्यवस्था फिर से सबसे तेज-रफ्तार इकॉनॉमी का दर्जा हासिल करता नजर आयेगी.

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अभी आधा हुआ है काम

बहरहाल, प्रधानमंत्री को गवर्नेंस और व्यापारिक माहौल के मोर्चे पर हालात को साफ-सुथरा बनाने में मिली कामयाबी भर से संतोष नहीं कर लेना चाहिए. साफ कहें तो अब तक के कदम बीमारी का उपचार करने वाले रहे हैं. इन कदमों से यह निश्चित नहीं हो जाता कि बीमारी फिर से नहीं लगेगी.

नोटबंदी से निश्चित ही कालाधन जमा करने वाले लोगों को बड़ी चोट लगी है. मुमकिन है, आयकर बचा रहे लोगों के लिए अब कोई रास्ता ना रह गया हो और अब वे अपनी आमदनी का ब्यौरा बताने के लिए मजबूर हो जायें. लेकिन क्या सरकार दावे के साथ कह सकती है कि फिर से कालाधन जमा नहीं होगा, खासकर यह देखते हुए कि 2000 के नोट चलन में हैं और इन नोटों के कारण कालाधन की जमाखोरी आसान हो गयी है?

केंद्र और सूबों के सत्ता के गलियारों में चलने वाली गपशप तक जिनकी पहुंच है वे जानते हैं कि भ्रष्टाचार तो जारी है. भ्रष्टाचार और व्यवसाय के नाजायज तरीकों तथा राजनीतिक प्रक्रिया में पेंच फंसाकर जमा किए जा रहे कालाधन को रोकने के लिए उपाय नहीं किए गए तो नोटबंदी जैसा फैसला हर दशक में एक दफे लेना पड़ सकता है. लेकिन नोटबंदी की पीड़ा को अगली बार झेल सकने की हालत में ना तो अर्थव्यवस्था है और ना ही इस देश के गरीब.

(लेखक बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर हैं और प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके हैं)

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