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नीति आयोग ने जो बोला वो सच है, फिर बुरा क्यों लगा?

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने आंकड़ों की हकीकत बताई, इस पर नाराजगी जाहिर करने के बजाय सुधार की दिशा में काम करना चाहिए

Updated On: Apr 25, 2018 08:36 AM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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नीति आयोग ने जो बोला वो सच है, फिर बुरा क्यों लगा?
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नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने एक बयान क्या दिया, कुछ राज्यों की अपना भक्ति जाग गई. उन्हें नीति आयोग का यह बयान पूरी तरह नागवार गुजर रहा है. आम आदमी के अलावा इस पर राजनीतिक पार्टियां इस बात से काफी नाराज हैं. राजनीतिक पार्टियों की खुशी और नाराजगी इसी बात से होती है कि उनकी किस प्रतिक्रिया का जनता पर क्या असर होगा.

मसलन अमिताभ कांत के इस बयान के बाद बिहार में आरजेडी पार्टी हरकत में आ गई.  लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव तुरंत इस मौके को भुनाने में जुट गए. फटाफट बयानों का दौर शुरू हो गया. आरोप लगा कि नीतीश कुमार बिहार मॉडल की धज्जियां उड़ा रहे हैं. कुछ महीने पहले जब आरजेडी और जेडीयू का गठबंधन बरकरार था, तब अमिताभ कांत का यह बयान आता तो शायद तेजस्वी यादव को इतना गुस्सा नहीं आता.

अमिताभ कांत का यह बयान सिर्फ बिहार के लिए ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़, यूपी और एमपी के लिए भी थी. एमपी और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से बीजेपी की सरकार है.

अमिताभ कांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में अब्दुल गफ्फार खान स्मारक के पहले लेक्चर में अमिताभ कांत ने कहा था, ‘ बिहार, यूपी, छत्तीसगढ़,  मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के कारण भारत पिछड़ा बना हुआ है.’ उन्होंने कहा था कि सामाजिक संकेतों की बात करें तो ईज ऑफ बिजनेस डूइंग में हमने तेजी से सुधार किए हैं. लेकिन ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (मानव विकास सूचकांक) में हम पिछड़े हैं.

amitabh kant

नीति आयोग के इस खुलासे पर राजनीति करने से पहले यह समझना होगा कि ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स क्या है और बिहार, यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़ में इसमें क्यों पिछड़े हुए हैं.

क्या है ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स?

इसके जरिए हम किसी देश के सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर उसकी सफलता का अंदाजा लगा सकते हैं. किसी भी देश का सामाजिक और आर्थिक पहलू उस देश के लोगों की सेहत, उनकी साक्षरता दर और जीवन स्तर पर निर्भर करता है. ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में बिहार 21वें नंबर, छत्तीसगढ़ 23, यूपी 18 और एमपी 20वें नंबर पर है.

सेहत, शिक्षा और जीवन स्तर पर इन राज्यों की क्या हालत है. इसका अंदाजा आप इन आंकड़ों से लगा सकते हैं.

भारत में साक्षरता दर 2001 से 2011 के बीच 8.66 फीसदी बढ़कर 74.04 फीसदी हो गया है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार में साक्षरता दर 61.8 फीसदी, राजस्थान में 67.1 फीसदी, यूपी में 67.7 फीसदी और मध्य प्रदेश में 70.6 फीसदी है. यह देश के औसत 74.04 फीसदी साक्षरता दर से कम है. सबसे ज्यादा साक्षरता दर 94 फीसदी केरल का है. इसी तरह बाकी राज्यों में साक्षरता दर जानने के लिए यहां क्लिक करें. अब सवाल यह उठता है कि जब शिक्षा की हालत ही बद्तर है तो ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में बिहार, एमपी, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की रैंकिंग कैसे बढ़ेगी.

छत्तीसगढ़ में महिलाओं की सामाजिक स्थिति की बात करें तो और भयावह हालात नजर आएगा. यहां 34 फीसदी महिलाओं की शादी 15 से 19 साल की उम्र तक हो जाती है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक, 20 से 49 साल की उम्र का औसत निकाले तो यह 15.4 साल होता है.

2013 में एशिया एंड पैसेफिक पॉलिसी स्टडी में छपी एक स्टडी के मुताबिक, किसी भी राज्य में शिक्षा, सेहत और रोजगार के स्तर से ही यह तय होता है कि वहां की आबादी की जिंदगी कैसी होगी.

उदाहरण के तौर पर जिन राज्यों में साक्षरता दर बेहतर है वहां के लोगों की औसत उम्र भी ज्यादा है. 2011 में महाराष्ट्र में साक्षरता दर 82.3 फीसदी थी. पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से 2016 के बीच पैदा हुए बच्चों की औसत जीवन अनुमानिक 70.4 साल था. इसके मुकाबले मध्यप्रदेश में पैदा हुए बच्चों का अनुमानित जीवन कम रहा. मध्यप्रदेश में साक्षरता दर 70.6 फीसदी रहा और 2011 से 2016 के बीच पैदा हुए बच्चों का अनुमानित जीवन 61.5 साल रही. हर आंकड़ा इन राज्यों की हकीकत बयान कर रहा है फिर अमिताभ कांत के बोलने पर नाराजगी क्यों.

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