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बेरोजगारी के तस्वीर क्यों छुपा रहा है नीति आयोग?

बेरोजगारी की स्थिति को छुपाने की बात आती है, तो सरकार और सरकार से जुड़ी सभी स्वायत्त नीति-निर्माण की शीर्ष संस्थाएं साथ नजर आती हैं.

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Aug 29, 2017 06:04 PM IST

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बेरोजगारी के तस्वीर क्यों छुपा रहा है नीति आयोग?

एक अर्थशास्त्री के रुप में आपने सरकार के किसी रुझान पर अंगुली उठाई हो, कहा हो कि सरकार के प्रवक्ता ऐसे रुझान से बाज आएं लेकिन एक प्रशासक के रुप में आप पर उसी रुझान से सोचने-बरतने की नैतिक जिम्मेवारी आन पड़े तो आप क्या करेंगे?

सितंबर महीने में अर्थशास्त्री राजीव कुमार जब देश के आर्थिक विकास की नीति और कार्य-योजना तैयार करने की शीर्ष संस्था नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेवारी संभालेंगे तो उनके सामने कुछ ऐसा ही नैतिक संकट उठेगा.

आयोग के उपाध्यक्ष के रुप में अरविन्द पनगढ़िया का कार्यकाल 31 अगस्त को खत्म हो रहा है और कार्यकाल की समाप्ति से चंद रोज पहले आयोग ने एनडीए सरकार के शेष बचे सालों के लिए एक त्रिवर्षीय योजना पेश की है.

और इस कार्ययोजना में देश में मौजूद बेरोजगारी के हालत को लेकर जो नजरिया पेश किया गया है वह नये उपाध्यक्ष राजीव कुमार की सोच के एकदम अलग है.

राजीव कुमार की राय और कार्य-योजना की सोच

सितंबर में नीति आयोग के उपाध्यक्ष का पद संभालने जा रहे राजीव कुमार की पिछले साल एक किताब आई ‘मोदी एंड हिज चैलेंजेज’ शीर्षक इस किताब में एक जगह एनडीए सरकार के प्रवक्ताओं को आगाह किया गया है कि वे दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के रुप में भारत की कामयाबियों के किस्से बयान करने के अपने लालच से बाज आएं.

किताब में राजीव कुमार ने एक जगह लिखा है कि ‘आंकड़ों के सहारे किए जा रहे दावों की सच्चाई चाहे जो हो, हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में रोजगार और उत्पादन या तो घट रहे हैं या उनमें ठहराव आया है. सरकार की ऐसी बड़बोलियों से लोगों में यही संदेश जाता है कि उसे लोगों के वास्तविक सरोकारों की चिंता या जानकारी नहीं. इसके नतीजे बुरे हो सकते हैं.’

अब जरा तुलना करें राजीव कुमार की इस बेबाक राय की नीति आयोग की तीनवर्षीय कार्य-योजना की बातों से. कार्य-योजना भाषा की भंवर में बेरोजगारी के तथ्य को कुछ यों डूबो देती है कि किनारे पर खड़े लोगों को पता ही ना चले कि देश में बेरोजगारी हाल के सालों में घटी है या बढ़ी है.

अलग-अलग अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक, नीति आयोग ने अपनी तीनवर्षीय कार्य-योजना में कहा है कि देश की ज्यादा बड़ी समस्या बेरोजगारी नहीं बल्कि ‘छुपी हुई बेरोजगारी’ (अंडर एम्पलॉयमेंट) है यानी जिस काम को करने के लिए सिर्फ एक व्यक्ति की जरुरत है भारत में अक्सर उस काम को करने के लिए एक से ज्यादा व्यक्ति नौकरी पर रखे जाते हैं.

कार्य-योजना के दस्तावेज में नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि देश में बेरोजगारी की दशा खास गंभीर नहीं है, बीते तीन दशकों से बेरोजगारी एक तो बहुत कम रही है दूसरे उसमें ऐसी उछाल या गिरावट नहीं आई कि असामान्य कहा जा सके.

यह साबित करने के लिए बेरोजगारी नहीं बल्कि छुपी हुई बेरोजगारी ही भारत की कार्यबल की सबसे बड़ी समस्या है कार्य-योजना का तर्क है कि देश की जीडीपी में कार्यबल का क्षेत्रवार योगदान असंतुलित है यानी किसी क्षेत्र में काम तो ज्यादा लोग कर रहे हैं लेकिन जीडीपी में उनका योगदान प्रतिशत पैमाने पर कम है.

मिसाल के लिए खेती-किसानी में देश के कार्यबल का 49 प्रतिशत हिस्से को रोजगार हासिल है लेकिन खेती-किसानी का देश की जीडीपी में योगदान महज 17 फीसद का है. इसी तरह विनिर्माण क्षेत्र में लगे कुल कार्यबल के एक लगभग तिहाई (72 फीसद) को वैसी इकाइयों में रोजगार हासिल है जहां 20 से कम लोग काम करते हैं लेकिन जीडीपी में इसका योगदान 12 प्रतिशत है.

नीति आयोग की कार्य-योजना के दस्तावेज के मुताबिक असंतुलन की कुछ ऐसी ही तस्वीर अर्थव्यवस्था के सेवा-क्षेत्र में दिखती है. 650 सबसे बड़ी इकाइयों में सेवा-क्षेत्र के कुल कार्यबल का 2 फीसद हिस्सा कार्यरत है और सेवा-उत्पादों में इस कार्यबल का योगदान 38 प्रतिशत है जबकि शेष इकाइयों में सेवा-क्षेत्र का 98 प्रतिशत कार्यबल लगा है लेकिन सेवा-उत्पादों में उसका योगदान 62 प्रतिशत का है.

कार्यबल की तादाद और जीडीपी में क्षेत्रवार योगदान के अंसतुलन के आधार पर नीति-आयोग की कार्य-योजना का दस्तावेज समाधान सुझाता है कि ‘जरुरत कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं के तर्ज पर’ उच्च उत्पादकता और ज्यादा वेतन के रोजगार सृजन करने की है.

जाहिर है, देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि-दर 15 सालों तक 8 फीसद पर कायम रखने के लिए देश के बाहर के आर्थिक मॉडल को नजीर बनाने की कार्य-योजना यह दलील भी नीति आयोग के नये उपाध्यक्ष के सोच से मेल नहीं खाती.

राजीव कुमार की राय है कि भारत को अपनी वास्तविकताओं के अनुकूल विकास का अपना मॉडल तैयार करने की जरुरत है. ‘मोदी एंड हिज चैलेंजेज’ में एक जगह बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि 'भारत पुरानी पड़ चुके और जंग खाये विकास के मॉडल या आर्थिक-दर्शन के सहारे कामयाब नहीं हो सकता. ना तो वाशिंग्टन कन्सेन्सस को ही भारत में थोक के भाव से अपनाया जा सकता है और ना ही बीजिंग कान्सेन्सस को.'

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देश में बेरोजगारी की तस्वीर

उच्च उत्पादकता और ज्यादा वेतन के रोजगार के सृजन की जरुरत से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन रोजगार के मोर्चे पर हो रही प्रगति नीति आयोग की कार्य-योजना से मेल नहीं खाती. छुपी हुई बेरोजगारी को दूर करने की जरुरत को आगे करके बढ़ रही बेरोजगारी के तथ्यों से आंख नहीं मूंदा जा सकता.

श्रम-मंत्रालय के हाल के आंकड़े और श्रम-मंत्री का सदन में दिया गया नवीनतम बयान इस तथ्य की निशानदेही करता है कि विगत तीन सालों में जरुरत के अनुरुप रोजगार का सृजन नहीं हुआ है. मिसाल के लिए श्रम-मंत्रालय के जुलाई महीने में जारी तथ्यों को देखा जा सकता है.

श्रम-मंत्रालय के नए आंकड़े साल 2012 से 2015 के सितंबर महीने तक रोजगार खोजने वाले लोगों और उन्हें हासिल रोजगार की तस्वीर पेश करते हैं. साल 2012 में 4.47 करोड़ लोगों ने देश के रोजगार कार्यालयों में अपना रजिस्ट्रेशन कराया था. साल 2014 में ऐसे लोगों की तादाद बढ़कर 4.82 करोड़ हो गई.

साल 2015 के सितंबर महीने में रोजगार कार्यालय में रजिस्ट्रेशन कराने वाले लोगों की संख्या 4.48 करोड़ थी और इस आंकड़े को बढ़वार की रफ्तार को ध्यान में रखते हुए सालाना रुप दें तो कहा जा सकता है कि 2015 में रोजगार कार्यालयों में 5.98 करोड़ रोजगार खोज रहे लोगों ने पंजीयन करवाया.

इस आंकड़े के बरक्स अगर रोजगार हासिल करने वाले लोगों की तादाद की तुलना करें तो स्थिति गंभीर नजर आती है. श्रम-मंत्रालय के आंकड़ों से जाहिर होता है कि अगर 2015 में रोजगार खोजने वाले लोगों ने किसी रोजगार-कार्यालय में 500 की संख्या में पंजीयन कराया है तो इसमें से मात्र 3 लोगों को ही नौकरी मिल पाई है.

रोजगार-कार्यालयों के आंकड़ों से जाहिर होता है कि 2012 में रोजगार के लिए पंजीकृत कुल लोगों में मात्र 0.95 प्रतिशत को नौकरी हासिल हुई, 2013 में यह तादाद घटकर 0.74 प्रतिशत पर आयी और 2014 में 0.70 प्रतिशत रही. 2015 में रोजगार-कार्यालयों में पंजीकृत कुल लोगों में से मात्र 0.57 प्रतिशत को रोजगार हासिल हुआ है.

गौरतलब है कि रोजगार कार्यालय नेशनल करिअर सर्विस पोर्टल से जुड़े होते हैं. नौकरियों के लिए इस पोर्टल ने सरकारी और निजी क्षेत्र के 53 सेक्टर के तकरीबन 3000 पेशों की पहचान की है और नौकरी खोजने तथा नौकरी देने वालों के बीच ये कार्यालय किसी मध्यस्थ की तरह काम करते हैं. सो, रोजगार हासिल करने वाले लोगों की तादाद और उन्हें हासिल वास्तविक अवसर के बारे में एक विश्वसनीय तस्वीर रोजगार-कार्यालय के आंकड़ों के सहारे बनाई जा सकती है.

रोजगार कार्यालय के आंकड़ों से झांकती तस्वीर की पुष्टि केंद्रीय श्रममंत्री के हाल के बयान से भी होती है. बीते छह फरवरी को केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि 2013-14 की तुलना में 2015-16 में बेरोजगारी दर में इजाफा हुआ है.

केंद्रीय मंत्री के लिखित उत्तर से पता चलता है कि देश में 2013-14 में संगठित और असंगठित क्षेत्र में रोजगार प्राप्त लोगों की संख्या 48.04 करोड़ थी जो साल 2014-15 में घटकर 46.62 करोड़ हो गई. इस अवधि में देश के 29 में से 14 राज्यों में बेरोजगारी दर बढ़ी है.

बेरोजगारी की स्थिति को छुपाने की बात आती है, तो सरकार और सरकार से जुड़ी सभी स्वायत्त नीति-निर्माण की शीर्ष संस्थाएं साथ नजर आती हैं.

नीति-आयोग की कार्य-योजना के दस्तावेज में कहा जाता है कि बेरोजगारी नहीं छुपी हुई बेरोजगारी ज्यादा बड़ी समस्या है. और, सरकार की तरफ से बेरोजगारी की दशा को साफ ही नकारने के अंदाज में कह दिया जाता है कि माइक्रो यूनिटस् डेवलपमेंट एंड रिफाइनान्स एजेंसी लिमिटेड(मुद्रा) के जरिए दो सालों में तकरीबन सवा तीन करोड़ रुपये का कर्ज उद्यमियों को देकर 7 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है.

एनडीए के मुख्य घटक बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने यही दावा किया गया बीते जुलाई महीने में और इस दावे की पड़ताल की जरुरत ना समझी गई कि आखिर दो साल में सात करोड़ लोगों को रोजगार देने का अर्थ क्या हुआ. हर साल लगभग 1.2 करोड़ लोगों की तादाद रोजगार मांगने वालों में जुड़ जाती है. क्या बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व (अमित शाह) यह बताना चाह रहा था कि सरकार ने मांग की तुलना में तीन गुना ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा किए किए?

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