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जीएसटी बदलाव दिखाता है कि सरकार की नीतियों में कोई प्लानिंग नही है

अरुण जेटली का बयान दिखाता है कि पब्लिक पॉलिसी से संबंधित फैसले तर्क की बजाय राजनीतिक मजबूरियों में लिए जाते हैं

Sreemoy Talukdar Updated On: Nov 13, 2017 02:53 PM IST

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जीएसटी बदलाव दिखाता है कि सरकार की नीतियों में कोई प्लानिंग नही है

शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल के दरों पर लिए गए बड़े फैसले को दो तरीके से देखा जा सकता है. इस फैसले में 178 आइटमों को सबसे ऊंचे 28 फीसदी के स्लैब से निकालकर 18 फीसदी रेट वाले स्लैब में डाल दिया गया और साथ ही 35 अन्य आइटमों को निचले स्लैब्स में डाला गया.

पहली चीज, यह एक ऐसा संकेत है जो दिखाता है कि नरेंद्र मोदी सरकार जमीनी स्तर पर चीजों पर नजर रख रही है और आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया दे रही है. ऐसे में यह कदम जुलाई में जीएसटी लागू होने के बाद से रिव्यू कमेटी के दरों में बदलावों की सिफारिशों को अमल में लाया जा रहा है.

सरकार स्पष्टीकरण क्यों दे रही है?

वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक, ‘पिछली कुछ मीटिंग्स में, जीएसटी स्ट्रक्चर को तार्किक बनाने की हमारी कोशिशों के तौर पर काउंसिल समय-समय पर दरों की समीक्षा करती रहती है. जब दरें मूलरूप में पिछली दरों के हिसाब से फिक्स की गई थीं, तो समानता का सिद्धांत लागू करने के लिए ऐसा किया गया था. पिछली तीन मीटिंग्स में हमने 28 फीसदी टैक्स ब्रैकेट के बारे में चरणबद्ध तरीके से विचार किया है और हम आइटमों को कम टैक्स वाली कैटेगरी में तार्किक रूप से ला रहे हैं.’

प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, ‘जीएसटी काउंसिल की आज की गई सिफारिशें हमारे नागरिकों को और फायदा देंगी और जीएसटी को मजबूत बनाएंगी. ये सिफारिशें जीएसटी पर संबंधित पक्षों से लगातार मिलने वाले फीडबैक की तर्ज पर हैं.’

ये स्पष्टीकरण बेमतलब के हैं क्योंकि इस कदम का बचाव करने के लिए समानता के सिद्धांत या इसी तरह के अनोखे शब्दों के इस्तेमाल की जरूरत नहीं थी क्योंकि शुरुआत से ही इस कदम को उठा लिया जाना चाहिए था. कई आइटम जिन्हें शुक्रवार की मीटिंग में 28 फीसदी रेट से बाहर किया गया उन्हें कभी भी इस रेट में नहीं होना चाहिए था. किसी को भी यह बात हजम नहीं होगी कि आखिर क्यों च्यूइंग गम, चॉकलेट, शेविंग क्रीम, आफ्टर-शेव, शैंपू, डियोड्रेंट्स और डिटर्जेंट पाउडर जैसे घर-परिवार में इस्तेमाल होने वाले आइटमों को लग्जरी कारों या तंबाकू उत्पादों जैसे सिन आइटमों के साथ शामिल क्यों किया गया?

सरकार कर रही है बेकार के बचाव

जेटली का स्पष्टीकरण कि ये दरें पिछले दरों के हिसाब से तय किए गए हैं और समानता के सिद्धांत को लागू करना, एक बेकार का बचाव दिखता है और यह नौकरशाही के उलझे हुए कामकाज के तरीकों की एक मिसाल भर है. निश्चित तौर पर, जीएसटी के पीछे लॉजिक दरों को तार्किक लेवल पर लाने का और करों को आसान बनाने का है, और इसका मतलब केवल मौजूदा दरों को ही नए नाम से पेश कर देना भर नहीं है.

वित्त मंत्री एक समझदार शख्स हैं और शुक्रवार प्रेस ब्रीफिंग के दौरान उनके शब्द- ‘कुछ आइटमों को 28 फीसदी स्लैब में नहीं होना चाहिए था.’ उनका यह बयान इस बड़ी गलती की स्वीकार्यता दर्शाता है. इससे दूसरी संभावना का पता चलता है कि जीएसटी दरों को बार-बार ‘तार्किक स्तर पर लाना ऐसे हालात को दिखाता है जिसमें पब्लिक पॉलिसी से संबंधित फैसले तर्क की बजाय राजनीतिक मजबूरियों में लिए जाते हैं.’

जीएसटी एक बड़ा टैक्स रिफॉर्म है और इतनी बड़ी आबादी और विविधता वाले देश में इसे लागू करने में दिक्कतों का आना स्वाभाविक है. इस तरह की मुश्किलों को समझते हुए भी बड़े लेवल पर नीतिगत फैसले इस तरह के होने चाहिए जो कि इसे अच्छा और आसान टैक्स बनाने वाले हों. दुर्भाग्य से इतने बड़े बदलाव के बाद भी टैक्स रिटर्न फाइल करना अभी भी नौकरशाही के पेचों में फंसा हुआ है और कुछ रेट्स अभी भी तर्क के दायरे से बाहर बने हुए हैं.

मिसाल के तौर पर, सीमेंट को सबसे ऊंचे 28 फीसदी वाले टैक्स ब्रैकेट में रखा गया है, जबकि कंस्ट्रक्शन में ही इस्तेमाल होने वाले स्टील को 18 फीसदी स्लैब में रखा गया है. यह पॉलिसी में मौजूद खामियों को दर्शाता है.

असम में हुए जीएसटी बैठक से पहले की तस्वीर. (पीटीआई)

असम में हुए जीएसटी बैठक से पहले की तस्वीर. (पीटीआई)

जीएसटी लागू करते वक्त सरकार का फोकस मार्केट को नए सिस्टम के हिसाब से सेटल होने देने की बजाय रेवेन्यू न्यूट्रेलिटी को हासिल करना था. इससे हो सकता है कि कुछ वक्त के लिए महंगाई में इजाफा होता और शायद एक या दो तिमाहियों तक फिस्कल टारगेट हासिल न हो पाते, लेकिन आसान टैक्स व्यवस्था से और ज्यादा कंज्यूमर स्पेंडिंग को बढ़ावा मिलता. यह रेवेन्यू टारगेट्स हासिल करने का ज्यादा अच्छा तरीका होता, न कि यह जिसमें 277 आइटमों को सबसे ऊंचे टैक्स ब्रैकेट में डाल दिया गया था.

120 दिन गुजरने के बाद समझ आई असलियत

जीएसटी लागू होने के 120 दिन गुजरने के बाद सरकार ने आखिरकार असलियत को समझा है, लेकिन ऐसा करने में उसने कंज्यूमर के लिए बड़ी दिक्कतें पैदा की हैं और साथ ही उसने करों में गिरावट का श्रेय लेने का दावा करने का मौका विपक्ष को दिया है.

आर जगन्नाथन स्वराज्यमग में लिखते हैं, ‘अगर आप बिना यह जाने कि किस तरह से जीएसटी शॉर्ट-टर्म में रेवेन्यू पर नतीजे देगा, फिस्कल डेफिसिट के टारगेट पर टिके रहते हैं तो आपके बाबू इसी तरह के बेवकूफी भरे सिस्टम तैयार करते हैं जिन्हें बार-बार बदलने की जरूरत पड़ती है.’

टैक्स रिफॉर्म का मुख्य सिद्धांत यह है कि शॉर्ट-टर्म के नतीजे अनिश्चित होते हैं, अगर आप रेवेन्यू ग्रोथ चाहते हैं तो यह आर्थिक गतिविधि में बढ़ोतरी के जरिए होना चाहिए. ज्यादा उत्पादन होगा तो ज्यादा टैक्स भी मिलेगा. इसमें वक्त लगता है, भले ही यह इनकम टैक्स कटौती हो या अप्रत्यक्ष कर कटौती हो. इसी तरह से जीएसटी फाइलिंग सिस्टम को देश में कंप्यूटर की अशिक्षा को ध्यान में रखकर तैयार करना चाहिए था. देश में नेटवर्क कनेक्टिविटी खराब है और जीएसटीए प्लेटफॉर्म में कई मुश्किलें हैं. इसे बहुत आसान बनाना चाहिए था.

जीएसटी रेट कम होने के बाद लोगों ने खुशियां मनाईं. (पीटीआई)

जीएसटी रेट कम होने के बाद लोगों ने खुशियां मनाईं. (पीटीआई)

स्लैब बदलने से नहीं होगा कुछ

जीएसटी एक ऐसा बड़ा पब्लिक पॉलिसी कदम है जिसे इस तर्क के आधार पर तैयार किया गया है कि समाज में असमानता को टैक्सेशन के जरिए खत्म किया जा सकता है. आइटमों को एक स्लैब से दूसरे टैक्स स्लैब में बार-बार डालने से भी वह असर पैदा नहीं हो सकता जो कि गरीबों के लिए कल्याणकारी स्कीमों के जरिए हासिल किया जा सकता है.

टीएन निनान ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है, ‘कहीं बेहतर होता कि असमानता को बजट के व्यय के मोर्चे के जरिए हल किया जाता, जिसमें गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा के उपाय होते, जैसा कि विकसित लोकतंत्रों में होता है, और टैक्स रेट्स को आसानी और प्रभावी होने के लिए तैयार किया जाता.’

रिफॉर्म्स को सफलतापूर्वक लागू करना एक मजबूत पॉलिसी के आधार पर बनता है जिसमें शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म दोनों मकसदों को ध्यान में रखा जाता है. जितनी जल्दी सरकार इसे समझ लेगी उतना ही अच्छा होगा.

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