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जेपी, माल्या और सहारा: अर्श से फर्श पर पहुंचने की कहानी

कभी ये तीनों कारोबारी प्रतिष्ठान अपने-अपने क्षेत्र के सरताज हुआ करते थे, लेकिन आज ये अपनी-अपनी बर्बादी का शोक-गीत लिख रहे हैं

Updated On: Aug 27, 2017 11:04 AM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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जेपी, माल्या और सहारा: अर्श से फर्श पर पहुंचने की कहानी

कभी यह तीन कारोबारी प्रतिष्ठान या समूह अपने-अपने क्षेत्र के सरताज हुआ करते थे, लेकिन आज ये अपनी-अपनी बर्बादी का शोक-गीत लिख रहे हैं. पर इस नियति के कोई और नहीं, ये खुद जिम्मेदार हैं. एयर इंडिया, सहारा समूह और जेपी समूह आज अपनी तबाही के लिए सुर्खियों में हैं.

इन तीनों कारोबारी प्रतिष्ठानों में कोई समानता नहीं है, तीनों की मिल्कियत अलग है, अलग-अलग कारोबार है. पर इन तीनों में एक समानता है कि यह तीनों ही कर्ज के बोझ से मरणासन्न हैं. कर्ज लेकर घी पीने की नियत ने आज उन्हें इस कगार पर ला खड़ा कर दिया है.

एयर इंडिया पूर्ण रूप से सरकारी कंपनी है. अब इसे बेचने का सैद्धांतिक फैसला मोदी सरकार ने ले लिया है. निवेशकों का पैसा लौटाने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत ने सहारा समूह की मुंबई-पुणे मार्ग पर स्थित भीमकाय एंबे वैली को बेचने का निर्णय सुना दिया है.

जेपी समूह की जेपी इंफ्राटेक को नए कानून के तहत दिवालिया घोषित कर दिया है जिससे इस कंपनी की आवास परियोजनाओं में फ्लैट खरीदने वाले हजारों निवेशक कानूनी चौखटों पर दर-दर भटकने को मजबूर हैं. इनमें एयर इंडिया सबसे पुरानी है, जिस पर कभी देश को नाज था.

शान-शौकत में ही लुट गए

सहारा समूह के जनक सुब्रत रॉय की रंक से राजा फिर जेल-सफर की कहानी किंवदती- सी लगती है. पैसा उड़ाने में सुब्रत रॉय का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है. अकूत परिसंपत्तियां हैं, लेकिन निवेशकों का पैसा लौटाने की उनकी कोई मंशा नजर नहीं आती है. यह भी अबूझ पहेली है.

बच्चों की अकाल मौत के लिए बदनाम उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से एक लैम्ब्रेटा स्कूटर और दो हजार रुपए की पूंजी से सुब्रत रॉय ने अपना कारोबार शुरू किया. 30 सालों के अंदर सुब्रत रॉय जो अपने को सहाराश्री  कहलवाना पसंद करते हैं, ने देश का सबसे बड़ा गैर-बैंकिंग वित्तीय समूह खड़ा कर दिया, जिसकी चार हजार से अधिक कारोबारी इकाइयां हैं.

सहारा समूह के दावों के अनुसार इसका कारोबारी साम्राज्य तकरीबन दो लाख करोड़ रुपए का है. उसके एक करोड़ 30 लाख से ज्यादा निवेशक हैं. उसके पास 11 लाख कर्मी हैं जिन्हें सहाराश्री कार्यकर्ता कहते हैं.

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कहना होगा कि सुब्रत रॉय विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं. सभी कलाओं में निपुण हैं. भाषण देने की क्षमता उनकी बेमिसाल है, जिसे देख कर देश के बड़े से बड़े नेता को रश्क पैदा हो सकता है. 8-10 घंटे भाषण देना उनके लिए मामूली बात है. सहयोगियों और कर्मियों में अपनी भाषण कला से उत्साहित करने में उन्हें कमाल हासिल है. किसी का भरोसा जीतना उनके बांये हाथ का काम है.

जैसे-जैसे सहारा समूह में पैसों का प्रवाह बढ़ता गया, वैसे-वैसे उनके खर्च बेलगाम हो गए, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े महाराजा और दुनिया के धन कुबेर हीनभावना से ग्रस्त हो सकते हैं. बड़ी-बड़ी पार्टियां देना, उनमें राजनीतिज्ञों सहित फिल्म और खेल की मशहूर हस्तियों को बुलाना उनका शौक बन गया था.

लखनऊ में पूरी जागीर सहारा शहर खड़ा कर दिया जिसमें निजी उपयोग के लिए हेलीपैड, क्रिकेट स्टेडियम, गोल्फकोर्स, एसी आडिटोरियम और 124 दर्शकों की क्षमता वाला सिनेमा हाल है.

2004 में अपने दो बेटों की शादी में तकरीबन 500 करोड़ रुपए फूंक दिए. पूरी एयर सहारा एयरलाइन दिल्ली, मुंबई और कलकत्ता से तकरीबन 10 हजार अतिथियों को ढोने में लगा दी. आईपीएल में सबसे महंगी टीम भी खरीदी. उनका दंभ उनके सर चढ़कर बोलने लगा, जो उन्हें अतंत: ले डूबा.

पर सहारा समूह का कामकाज कभी साफ-सुथरा नहीं रहा. पर 2010 तक उन्हें कोई कानूनी अड़चन भी नहीं आई. इससे उन्हें लगने लगा कि कोई उनका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता है और कानून उनकी जेब में है.

30 हजार करोड़ रुपए का पब्लिक इश्यू लाने के चक्कर में 2010 में सेबी (पूंजी बाजार की नियामक संस्था) के ऐसे शिकंजे में फंसे कि 2014 में सुब्रत रॉय को जेल की हवा खानी पड़ी. जमानत राशि 10 हजार करोड़ जमा करने में दो साल लग गए और उन्हें तिहाड़ जेल में ही रहना पड़ा. पर एंबे वैली के लिए सुरक्षित बोली तकरीबन 37 हजार करोड़ रुपए अदालत ने रखी है.

तब यह सवाल जेहन में उठना स्वाभाविक है कि जमानत के लिए 10 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम करने में सुब्रत रॉय ने दो साल क्यों लगाए. सेबी के दायर मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने के आदेश दिए हैं जिसके लिये अब एंबे वैली की नीलामी होनी है. फिलवक्त सुब्रत रॉय पेरोल पर बाहर हैं.

नियत में नहीं, नीति में खोट

इन दोनों कारोबारी प्रतिष्ठानों से इंफ्रा उद्योग के नामी समूह जेपी की कहानी कुछ जुदा है. जेपी समूह की नियत में कभी कोई खोट नहीं आई, लेकिन कुछ आर्थिक निर्णय इस समूह के गले की हड्डी बन गए. क्रिकेट के अद्भूत फैन, धार्मिक प्रवृत्ति के जयप्रकाश गौड़ ने इस समूह की नींव 1969 में रखी.

गौड़ ने रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग से ओवरसियर की नौकरी से अपना सफर शुरू किया, लेकिन 1957 में नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू किया. फिर कभी पलट कर नहीं देखा. उनके शुरुआती कारोबारी जीवन में कई झटके लगे, लेकिन हार नहीं मानी और 1985 के आते मजबूत कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया.

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इन सालों में विदेश में ठेके, देश में अनेक जल- बिजली परियोजनाओं के ठेके लिये, सीमेंट संयत्र लगाए, होटल खोले. 2006 में जेपी समूह को नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे का ठेका मिला जिससे जेपी समूह की महत्वाकांक्षाएं आसमान छूने लगीं. जेपी समूह को इस परियोजना से एक लाख 35 हजार करोड़ रुपए के लाभ की उम्मीद थी. यह भरोसा केवल समूह को ही नहीं था, तब अनेक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय वित्त कंपनियों और सलाहकारों को भी यही उम्मीद थी.

2008 में इस समूह की स्टॉक बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर छलांग मार रहे थे. इस परियोजना को पूरा करने के लिए समूह ने काफी कर्ज बाजार से उठाया. इस समूह ने देश का पहला फार्मूला वन ट्रैक बनाया जिससे इस समूह का नाम घर-घर पहुंच गया. पर यह ट्रैक समूह के लिए आर्थिक बोझ बन गया. इन परियोजनाओं से समूह को वह लाभ नहीं मिला, जिसकी उम्मीद जेपी समूह और उनके निवेशकों को थी.

नतीजतन समूह पर कर्ज भार बढ़ता ही गया. इन कर्जों को पटाने के लिए यह समूह पिछले 4-5 सालों में अपनी कई मूल्यवान परिसंपत्तियां बेच चुका है. इनमें कई हाइड्रो- पॉवर परियोजनाएं और सीमेंट प्लांट शामिल हैं. पर इसके बाद भी आज समूह पर 75 हजार करोड़ का कर्ज है.

इन इंफ्रा परियोजनाओं को समय से पूरा करने के लिए बाजार से महंगा कर्ज लेना समूह के लिए अभिशाप बन गया. राजनीतिक दोस्ती की भारी कीमत समूह को चुकानी पड़ी है जिससे अरबों रुपए सेवा भाव में ही स्वाहा हो गए.

अब समूह की एक कंपनी जेपी इंफ्रा को दिवालिया घोषित किया जा चुका है. यह कंपनी जेपी विश टाउन बना रही है जिसमें फ्लैट खरीदने वाले 32 हजार निवेशकों का गाढ़े पसीने की कमाई अटक गयी है.

जानकार लोग बताते हैं कि जय प्रकाश गौड़ वचन के पक्के हैं. कभी लाभ के लिए किसी को धोखा नहीं दिया. भारी आर्थिक दिक्कतों के बाद भी हजारों लाखों फिक्स्ड डिजॉजिट करने वालों की ब्याज सहित पूरी रकम लौटाने में यह समूह अब भी पीछे नहीं हटा है. लेकिन गलत आर्थिक फैसलों की  समूह को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है.

बाप का लाडला बिगड़ गया

विजय माल्या पहले भी मीडिया के निशाने पर रहते थे और अब भी. पहले अच्छे समय में अपने रंगीन मिजाज और विलासता के लिए सुर्खियों में रहता थे, आज एक भगोड़े के रूप में मीडिया के निशाने पर है. बैंकों का तकरीबन 9 हजार करोड़ रुपए जानबूझ कर न चुकाने का वह अपराधी हैं. देश के अनेक विभाग उसके पीछे पड़े हैं.

माल्या के प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार ने ब्रिटेन से अपील की है. ब्रिटेन की अदालत में उन पर मुकदमा भी चल रहा है. पर विजय माल्या इन सबसे बेफिक्र लंदन के अपने विशाल आवास में विलासी जीवन व्यतीत कर रहे हैं. आज विजय माल्या लुटेरे और लंपट पूजीपतियों के सबसे बड़े प्रतीक हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि विजय माल्या ने उद्यमियों की पूरी जमात को बदनाम कर दिया है. पर यह जमात ही उस पर सबसे ज्यादा फिदा थी.

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पिता की अकाल मृत्यु हो जाने से 28 साल की उम्र में यूनाइटेड ब्रेवरीज समूह का वह चेयरमैन बन गए. शराब इस समूह का सबसे बड़ा कारोबार था. उसके पिता ने बड़े उद्यम के साथ अपना कारोबार खड़ा किया था. पिता के लाड़ प्यार से उसकी आदतें बिगड़ गई . कारोबार संभालने के बाद  बड़े आक्रामक ढंग से उन्होंने कारोबारी विस्तार किया, लेकिन अधिकांश में विफलता ही उसके हाथ लगी. कम से कम 40 कारोबार उन्हें बंद करने पड़े या बेचने. आईपीएल में टीम खरीदी. फार्मूला वन मोटर रेस उनकी कमजोरी है.

शराब का कारोबार उन्हें विरासत में मिला, उसमें हुस्न-ग्लैमर जोड़ना विजय माल्या के खाते में है. मॉडलिंग दुनिया की हुस्न की मलिकाएं जिस तरह उनके आगे पीछे फुदकती है, उसे देखकर अप्सराओं के देव इंद्र भी शरमा जाए. विजय माल्या के स्विमसूट कैलेंडर में स्थान पाना इन मालिकाओं का दिव्य स्वप्न रहता है. हुस्न के तलबगार इस कैलेंडर के लिए बौराये रहते हैं.

शीर्ष कारोबारियों की सूची में विजय माल्या का स्थान काफी नीचे है. पर कारोबार जगत में उनकी ठसक काफी ज्यादा रही. शराब और शबाब से दहकती उसकी पार्टियों में शिरकत के लिए देश की जानी-मानी हस्तियां लालायित रहती थीं.

दुनिया भर के पॉश स्थानों पर उनके आलीशान भवन हैं. दुनिया की सबसे बड़ी याटों (क्रीड़ा-नौका) में एक इंडियन एम्प्रिस के वह मालिक हैं, जिस पर उनकी सालाना पार्टी अब भी बदस्तूर जारी है. 2003 में विजय माल्या ने किंग फिशर एयरलाइन शुरू की, जो अतंत: उन्हें ले डूबी. अब केवल उसकी चर्चाएं ही बाकी रह गई हैं.

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