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दिवालिया कानून होगा और सख्त: लोन हड़पने वालों की अब खैर नहीं

भारत में लोन हड़पने वाले यानी कर्ज लेकर न चुकाने वालों की मुश्किलें और बढ़ने जा रही हैं

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Nov 24, 2017 08:57 AM IST

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दिवालिया कानून होगा और सख्त: लोन हड़पने वालों की अब खैर नहीं

भारत में लोन हड़पने वाले यानी कर्ज लेकर न चुकाने वालों की मुश्किलें और बढ़ने जा रही हैं. केंद्र की मोदी सरकार ने दिवालिया कानून को और सख्त बनाने का फैसला किया है. सरकार इस मामले में अध्यादेश लाने की तैयारी में है. बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में दिवालिया कानून में बदलाव के अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) को मंजूरी दे दी गई. ये अध्यादेश संसद के शीतकालीन सत्र में पेश होगा. इस अध्यादेश के लागू होने पर दिवालिया घोषित हो चुकी कंपनियों के प्रोमोटरों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

नया कानून प्रभावी होने के बाद दिवालिया हो चुकी या नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) की कार्यवाही का सामना कर रही कंपनियों के और भी बुरे दिन शुरू हो जाएंगे. वर्तमान में दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही एस्सार, भूषण स्टील, भूषण पावर एंड स्टील, मॉनेट इस्पात और जेपी इंफ्राटेक जैसी कंपनियां बंद होने के कगार पर पहुंच जाएंगी.

 नीलामी नहीं होगी आसान

नए कानून के तहत दिवालिया हुई कंपनियों के प्रमोटर अब नीलामी के दौरान अपनी संपत्तियों को नहीं खरीद पाएंगे. इसके अलावा, बैंकों द्वारा एक साल से ज्यादा अवधि तक एनपीए के दायरे में रखी गई कंपनियों पर भी नया कानून लागू होगा. यानी एनपीए की कार्यवाही का सामना कर रही कंपनियों के प्रमोटर भी अब अपनी संपत्तियों की नीलामी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकेंगे.

वहीं दिवालिया कानून में होने वाले बदलाव से सरकारी बैंकों को बड़ी राहत मिलेगी. दिवालिया हो चुकी कंपनियों को कर्ज देने वाले बैंक अब उन कंपनियों की संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को आराम से बेच सकेंगे. बैंकों को अब ऐसी कंपनियों के प्रमोटरों के हस्तक्षेप का सामना नहीं करना पड़ेगा.

फिलहाल, दिवालिया घोषित हो चुकी और एनपीए के दायरे में आ चुकी कंपनियों की संपत्तियों की नीलामी की प्रक्रिया बहुत मुश्किल है. कर्ज देने वाली बैंक जब अपने पैसों की उगाही के लिए ऐसी कंपनियों की नीलामी प्रक्रिया शुरू करती हैं, तब कंपनियों के प्रमोटर उसमें तरह-तरह के अड़ंगे लगाते हैं.

NEW DELHI, INDIA MAY 3: View of RBI buidling on May 3, 2013 in New Delhi, India. (Photo by Ramesh Pathania/Mint via Getty Images)

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बैंक को जब नीलामी की इजाजत मिलती है, तब ज्यादातर प्रमोटर नीलामी में हिस्सा लेने पहुंच जाते हैं. ये प्रमोटर नीलामी के दौरान कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी दोबारा खरीदने का हर संभव प्रयास करते हैं. ज्यादातर बैंकरों के लिए प्रमोटरों का हस्तक्षेप एक बड़ी समस्या है.

पहले ही सौंपी जा चुकी है लिस्ट

एनपीए के मामले में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मुहिम अब एक स्पष्ट और ठोस चरण में प्रवेश कर चुकी है. इस साल जून में, रिजर्व बैंक दिवालिया घोषित करने की कार्यवाही शुरू करने के लिए बैंकों को 12 कंपनियों की पहली लिस्ट सौंप चुकी है.

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इन कंपनियों पर जितना कर्ज बकाया है, वह बैंकों के कुल सकल एनपीए के एक चौथाई हिस्से के बराबर है. आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के मुताबिक, अरसे से एनपीए के दायरे में चल रही कंपनियों की दूसरी सूची भी बैंकों को भेजी जा चुकी है, ताकि उन्हें भी दिवालिया घोषित करने की कार्यवाही शुरू हो सके. हालांकि, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर ने जिस दूसरी लिस्ट का जिक्र किया है, उसका विवरण उपलब्ध नहीं है.

एनपीए के खिलाफ आरबीआई ने अपनी 'ऑल आउट वार' यानी निर्णायक लड़ाई जनवरी 2015 में शुरू की थी. तब सेंट्रल बैंक ने संकटग्रस्त संपत्तियों की जल्द पहचान के लिए नए नियम बनाए थे. इस नियम के तहत बैंकिंग सिस्टम में कई नए दंडात्मक प्रावधान किए गए थे. लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पब्लिक सेक्टर बैंक्स) तब भी संकटग्रस्त और जोखिम वाले लोन (कर्ज) को लेकर गंभीर नहीं हुए. दरअसल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रभावशाली और राजनीति से जुड़े प्रमोटरों के बकाया कर्ज का खुशी-खुशी तकनीकी समायोजन करते आ रहे हैं.

खास बात यह है कि देश के बैंकिंग सिस्टम में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी है. जबकि एनपीए का करीब 90 फीसदी भाग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के हिस्से में आता है. जाहिर है कि, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की लापरवाही और मनमानी देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ रही है.

इसलिए प्रभावित हुआ बैंकिंग सिस्टम

कॉरपोरेट जगत और राजनीतिक का कुख्यात गठजोड़ देश में बेलगाम होकर काम करता आ रहा है. बीते कुछ सालों के भीतर संकटग्रस्त लोन का अंबार लग चुका है. दिलचस्प बात यह है कि, जिस दौर में बैंकिंग सेक्टर के संकटग्रस्त लोन के आंकड़ों में सबसे ज्यादा इजाफा हुआ, वो बाकी सेक्टरों के लिए बूम का दौर था. यानी उस दौर में बाजार में खूब उछाल आया, जिसका सभी उद्योगपतियों ने जमकर लाभ कमाया. लिहाजा संकटग्रस्त लोन और एनपीए के पीछे सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों की लापरवाही के अलावा कोई और बड़ा कारण नहीं है.

सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों ने अपनी लोन बुक की फेहरिस्त लंबी करने और बाकी बैंकों से प्रतियोगिता की होड़ में बहुत ही लापरवाही के साथ लोन बांटे. बैंकों ने तब लोन देते वक्त न तो कंपनियों का इतिहास देखा और न ही जरूरी मानदंडों का पालन किया. नतीजा ये रहा कि, अब ये बैंक अपना बकाया कर्ज वसूल नहीं कर पा रहे हैं. जिससे न सिर्फ बैंकिंग सिस्टम बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.

manmohan singh

कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार एनपीए और संकटग्रस्त लोन के बढ़ते आंकड़ों से पूरी तरह अनजान बनी रही. यहां तक कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा एनडीए सरकार को भी इस समस्या की सुध काफी देर से आई. लेकिन अब इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (नया दिवालिया कानून) की तैयारी से इस मामले में महत्वपूर्ण मोड़ आ गया है.

इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड से आरबीआई समेत सभी बैंकों की शक्तियां बढ़ जाएंगी. जिससे एनपीए की समस्या के निदान की प्रक्रिया को गति मिलेगी. फिलहाल एनपीए के आंकड़े खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं. 30 सितंबर 2017 तक, भारतीय बैंकों के सकल एनपीए और संकटग्रस्त लोन की राशि 8.40 लाख करोड़ रूपए हो चुकी थी. अगर रेस्ट्रक्टिड लोन एसेट्स के आंकड़े भी जोड़ लिए जाएं, तो संकटग्रस्त लोन की राशि दोगुनी भी हो सकती है.

सख्ती की जरूरत

एनपीए की समस्या के समाधान के बिना बैंकिंग सेक्टर को भविष्य के सुधारों के लिए तैयार नहीं किया जा सकता है. इस मुहिम में अयोग्य बैंकों का नियंत्रण निजी क्षेत्र के कारोबारियों को देने पर भी विचार किया जाना चाहिए. यानी खराब प्रदर्शन करने वाली बैंकों को निजी पार्टियों को बेचने का प्रावधान होना सख्त जरूरी है. लिहाजा नए दिवालिया कानून को लेकर आरबीआई और केंद्र सरकार ने जो कदम उठाया है, वो एकदम सही दिशा में है.

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बैंकिंग सेक्टर की सेहत सुधारने के लिए सरकार ने एक और अच्छी पहल की है. सरकार ने आखिरकार सरकारी बैंकों में पूंजी की कमी की समस्या को मान लिया है. लिहाजा इन बैंकों के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये आवंटित करने का ऐलान कर दिया है. अगर सरकार की यह योजना कामयाब होती है, तो बैंकिंग सेक्टर में जबरदस्त उछाल आ सकता है.

दिवालिया कंपनियों के प्रमोटरों और एनपीए पर लगाम करने के लिए इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) को पुख्ता बनाने की सख्त जरूरत है. अगर आईबीसी का ढांचा पुख्ता होगा तो दिवालियापन की प्रक्रिया का सामना कर रही कंपनियों के शेयरों की कीमती पर नजर रखना आसान होगा.

तब शेयर बाजार के घाघ खिलाड़ी और संकटग्रस्त कंपनियों के प्रमोटर अपनी कंपनी के शेयरों की कीमतों में हेरफेर नहीं कर पाएंगे. दरअसल संकटग्रस्त कंपनियों के शेयरों की कीमतों में जमकर फर्जीवाड़ा होता है, जिसके शिकार अक्सर छोटे शेयरधारक बनते हैं.

रेजल्यूशंस, स्पेशल सिचुएशन ग्रुप के साझादीर और प्रमुख मनीष अग्रवाल के मुताबिक, 'आईबीसी के तहत अब कंपनियों के स्टॉक प्राइज पर नियंत्रण रखा जा सकेगा. नए कानून से संकटग्रस्त कंपनियों के ऋण के निवेश या फिर इक्विटी के निवेश की राह भी आसान होगी. आईबीसी के तहत एक ऐसा तंत्र विकसित होगा, जिसके माध्यम से संकटग्रस्त कंपनियों के शेयरों की कीमत पर निगाह रखी जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर कीमतों पर नियंत्रित भी रखा जा सकेगा.

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मोदी सरकार ने किंगफिशर-विजय माल्या मामले से अहम सबक हासिल किया है. माल्या ने 17 अलग-अलग बैंकों और निवेशकों से करीब 9000 करोड़ का कर्ज ले रखा था. लेकिन जब माल्या पर कर्ज वापसी का दबाव बना, तो वह निवेशकों और सरकार को चकमा देकर देश से भाग गए.

जिसके बाद माल्या-निवेशकों-सरकार के बीच लंबी और कठिन कानूनी लड़ाई की शुरूआत हुई. ये कानूनी लड़ाई कब खत्म होगी और माल्या निवेशकों के पैसे कब लौटाएंगे, यह कोई नहीं जानता. लेकिन अब मजबूत और पुख्ता बैंकरप्सी कोड के जरिए माल्या जैसी घटना को दोबारा होने से रोका जा सकता है. हालांकि, इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ना होगी.

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