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सही नीतियों के जरिए कर्ज के अनुपात को कम कर रहा है भारत : IMF

आईएमएफ के शीर्ष अधिकारी का कहना है कि भारत संघीय स्तर पर अपने राजकोषीय घाटे को तीन प्रतिशत और कर्ज के अनुपात को 40 प्रतिशत के मध्यम स्तर पर लाने का प्रयास कर रहा है

Updated On: Apr 19, 2018 03:56 PM IST

FP Staff

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सही नीतियों के जरिए कर्ज के अनुपात को कम कर रहा है भारत : IMF

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि GDP के अनुपात में भारत पर ‘बहुत ज्यादा’ कर्ज है लेकिन वह ‘सही नीतियों’ के माध्यम से इसे कम करने का प्रयास कर रहा है.

आईएमएफ के वित्तीय मामलों के विभाग के उपनिदेशक अब्देल सेन्हादजी का कहना है कि वित्त वर्ष 2017 में भारत सरकार का कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 70 प्रतिशत रहा.

उन्होंने कहा , ‘कर्ज का स्तर (भारत में) काफी ज्यादा है लेकिन अधिकारी सही नीतियों के माध्यम से इसे मध्यम स्तर पर लाने का प्रयास कर रहे हैं.’

आईएमएफ के शीर्ष अधिकारी का कहना है कि भारत संघीय स्तर पर अपने राजकोषीय घाटे को तीन प्रतिशत और कर्ज के अनुपात को 40 प्रतिशत के मध्यम स्तर पर लाने का प्रयास कर रहा है. उन्होंने कहा , ‘हमें लगता है कि यह लक्ष्य सही हैं.’

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं से ऐसी नीतियों से बचने के लिए कहा है जो आर्थिक उतार-चढ़ाव को बढ़ाती हों. ऐसा उसने इनका सार्वजनिक कर्ज अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद कहा है.

IMF में राजकोषीय मामले विभाग के निदेशक विटोर गैस्पर ने देशों को सुझाव दिया कि बढ़ते जोखिम के बीच समय रहते वे अपनी सार्वजनिक वित्तीय हालत को मजबूत बनाएं.

गैस्पर ने कहा कि 2016 में वैश्विक ऋण 164 हजार अरब डॉलर की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया. यह वैश्विक जीडीपी के लगभग 225% के बराबर है. पिछले दस सालों में अधिकतर ऋण उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के पास है. और ऋण में बढ़ोतरी के लिए अधिकतर उभरती अर्थव्यवस्थाएं जिम्मेदार हैं. कर्ज की वृद्धि में 2007 के बाद से अकेले चीन ने 43% का योगदान दिया है.

कर्ज का उच्च स्तर विशेषकर जब वह लगातार तेजी से बढ़ रहा हो

गैस्पर ने एक प्रेसवार्ता में कहा , ‘उन्नत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का सार्वजनिक कर्ज इस समय ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर है. उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का कर्ज और जीडीपी अनुपात जीडीपी के 105% से ज्यादा है. ऐसा स्तर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अब तक नहीं देखा गया है.’

उन्होंने कहा , ‘देशों को ऐसी राजकोषीय नीतियों को आगे बढ़ाना चाहिए जो आर्थिक उतार-चढ़ाव और सार्वजनिक ऋण को कम करने को प्रोत्साहन दें.’

एक सवाल के जवाब में गैस्पर ने कहा कि कर्ज का उच्च स्तर विशेषकर जब वह लगातार तेजी से बढ़ रहा हो तो वह वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम लाता है और व्यापक आर्थिक गतिविधियों के लिए घातक होता है.

‘यह उन कारणों में से एक है जिसके चलते हम सरकारों से अब इस बेहतर समय में उनके राजकोषीय बफर के पुनर्निमाण के लिए कह रहे हैं. उन्हें मजबूत सार्वजनिक वित्तीय प्रणाली बनाने के लिए कह रहे हैं ताकि वह कभी भी आ जाने वाले बुरे वक्त के लिए तैयार रहें.’

उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कर्ज का औसत स्तर उनके जीडीपी का 50% है जिसे भूतकाल में वित्तीय संकट के तौर पर देखा जाता था. वहीं कम आय वाले विकासशील देशों में ऋण और जीडीपी का औसत अनुपात जीडीपी के 44% के बराबर है.

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