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IL&FS: एक कंपनी जिसे हर दिन कामकाज के लिए चाहिए 100 करोड़ रुपए

IL&FS डिफॉल्ट कर चुकी है. अब यह अपने शेयरधारकों की रहमोकरम पर है

Updated On: Oct 10, 2018 10:56 PM IST

FP Staff

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IL&FS: एक कंपनी जिसे हर दिन कामकाज के लिए चाहिए 100 करोड़ रुपए

एक तरफ दुनिया लीमैन ब्रदर्स के धराशायी होने की 10वीं बरसी मना रहा है तो दूसरी तरफ भारत में ऐसे ही संकट का पर्दाफाश हुआ है. देश की दिग्गज इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड पेमेंट पर डिफॉल्ट करने लगी, जिससे बाजार में गिरावट का दौर शुरू हो गया.

क्या है IL&FS का कारोबार?

यह एक इनवेस्टमेंट कंपनी है और IL&FS ग्रुप की होल्डिंग कंपनी के तौर पर काम करती है. इस ग्रुप की कंपनियों का दखल इंफ्रास्ट्रक्चर, फाइनेंस, सोशल और एनवॉयरमेंट सर्विसेज में है. इस कंपनी की शुरुआत स्वर्गीय एमजे फेरवानी ने 1987 में की थी. इस कंपनी में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया और हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी (HDFC) का पैसा लगा था. इस कंपनी का काम इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को कर्ज देना था.

किसका है मालिकाना हक?

IL&FS के संस्थागत निवेशकों में SBI, LIC, ORIX कॉरपोरेशन ऑफ जापान और अबूधाबी इनवेस्टमेंट अथॉरिटी (ADIA) हैं. संस्थागत निवेशकों के मायने ऐसे निवेशकों से है जो कोई व्यक्ति नहीं बल्कि संस्था हैं.

कंपनी के बहीखातों के मुताबिक, 31 मार्च 2018 तक IL&FS के सबसे बड़े शेयरधारक LIC और ORIX कॉरपोरेशन ऑफ जापान है. LIC के पास IL&FS में 25.34 फीसदी और ORIX कॉरपोरेशन ऑफ जापान के पास 23.54 फीसदी हिस्सेदारी है. इसके अलावा ADIA के पास 12.56 फीसदी, HDFC के पास 9.02 फीसदी, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के पास 7.67 फीसदी और SBI के पास 6.42 फीसदी हिस्सेदारी है.

कैसे हुआ खुलासा?

IL&FS की खराब वित्तीय हालत का खुलासा तब हुआ जब ग्रुप की एक कंपनी 14 सितंबर को बैंक लोन, ब्याज, शॉर्ट टर्म- लॉन्ग टर्म डिपॉजिट और कमर्शियल पेपर का रीडम्पशन नहीं कर पाई. 15 सितंबर को कंपनी ने रिपोर्ट किया कि इसके कुछ इंटरकॉरपोरेट डिपॉजिट पर डिफॉल्ट करने के बाद नोटिस मिला है. इस डिफॉल्ट के बाद रेटिंग एजेंसी इकरा ने इसकी शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म बॉरोइंग प्रोग्राम्स की रेटिंग घटा दी. किसी कंपनी की रेटिंग उसमें निवेश के लिहाज से काफी अहम है. इस डिफॉल्ट से कंपनी के सैकड़ों निवेशक, बैंक और म्युचुअल फंड को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है.

कैसे लगा IL&FS को चूना?

पिछले दो दशकों से देश में इंफ्रास्ट्रक्चर पर काफी जोर है. ऐसे में IL&FS इस सेक्टर में आगे बढ़कर ज्यादा से ज्यादा प्रॉफिट बटोरना चाहती है. कंपनी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को कर्ज देती रही लेकिन पैसा वापस नहीं आ रहा था. धीरे-धीरे कंपनी का डेट-इक्विटी रेशियो बढ़कर 18.7 हो गया.

इस ग्रुप की कम से कम 24 डायरेक्ट सब्सिडियरीज, 135 इनडायरेक्ट सब्सिडियरीज, 6 जेवी और 4 एसोसिएट कंपनियों का कर्ज मिलाकर कुल 91,000 करोड़ रुपए का लोन है.

इसमें से 60,000 करोड़ रुपए का कर्ज प्रोजेक्ट लेवल का है. इनमें रोड, पावर और वाटर प्रोजेक्ट शामिल हैं. IL&FS की समस्या बढ़ने की एक बड़ी वजह जमीन अधिग्रहण है. 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून की वजह से इसकी कई परियोजनाएं पूरी नहीं हो पाई. इससे प्रोजेक्ट की कॉस्ट भी बढ़ गई.

क्या होगा आगे?

IL&FS डिफॉल्ट कर चुकी है. अब यह अपने शेयरधारकों की रहमोकरम पर है. इसके सभी शेयरधारकों ने कंपनी के 4500 करोड़ रुपए के एसेट्स बेचने का फैसला किया है. कंपनी 25 परियोजनाओं को बेचने वाली है. इनमें रोड और पावर परियोजनाओं शामिल हैं. कंपनी को पहले ही 14 परियोजनाओं के लिए ऑफर मिल चुका है. इन परियोजनाओं को बेचने से कंपनी का कर्ज 90,000 करोड़ रुपए से घटकर 30,000 करोड़ रुपए पर आ जाएगा. लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यह प्रक्रिया पूरी होने में 18 महीने का वक्त लगेगा.

इस महीने की शुरुआत में NCLT ने सरकार को यह अनुमति दी कि वह कर्ज में दबी IL&FS के बोर्ड पर अधिकार कर ले. NCLT ने एक 6 सदस्यीय पैनल भी नियुक्त किया है जिसके अध्यक्ष कोटक महिंद्रा बैंक के एमडी उदय कोटक हैं. इस पैनल ने तुरंत प्रभाव से कंपनी के प्रबंधन को अपने अधिकार में ले लिया. कंपनी को फिलहाल अपने रोजमर्रा के कामकाज के लिए हर दिन 100 करोड़ रुपए की जरूरत है.

नए बोर्ड ने अभी इस मामले में कोई मुद्दा नहीं उठाया है. अपने क्लेम के सेटलमेंट के लिए IL&FS के बोर्ड ने नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से संपर्क किया है. इससे पहले IL&FS के बोर्ड ने कंपनी मामलों के मंत्रालय के सेक्रेटरी इनजेती श्रीनिवास से मुलाकात की है. श्रीनिवास से मिलकर बोर्ड ने पहली बैठक के बाद अपनी असेसमेंट रिपोर्ट की जानकारी दी. बैठक के बाद उदय कोटक ने कहा कि बोर्ड सरकार के साथ सलाह मशविरा करते हुए सही प्रोग्रेस कर रहा है.

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