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गुजरात का वुमन स्पेशल सेवा बैंक, जिसका काम नोटबंदी ने आसान कर दिया

इस बैंक में काम करने वाली भी महिलाएं हैं और ग्राहक भी. ये महिलाएं कमजोर तबके से हैं, जिन्हें अपने इलाके के विधायकों से कुछ नाराजगी है लेकिन लीडर चाहिए तो सिर्फ मोदी की तरह

Updated On: Nov 28, 2017 11:52 AM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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गुजरात का वुमन स्पेशल सेवा बैंक, जिसका काम नोटबंदी ने आसान कर दिया

अहमदाबाद के एलिसब्रिज इलाके में घूमते हुए आपकी नजर शायद सेवा बैंक पर ना पड़े. साकार-II इमारत की पहली मंजिल पर यह बैंक एक अलग पहचान लिए अपनी कामयाबी की कहानी बड़ी शान से कह रहा है. गुजरात के कमजोर तबके की महिलाओं के लिए यह किसी मंदिर से कम नहीं है. ऑफिस के दरवाजे पर जब मैंने पूछा कि क्या यहीं सेवा बैंक है, तो बताने वाली महिला की आंखें चमक गईं और आवाज में एक जोश था. कहा, ‘हां हां, ऊपर है.’

सेवा बैंक यानी श्री महिला सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड तमाम निजी और सरकारी बैंकों से अलग है. इसकी खासियत है कि इससे हर लेवल पर सिर्फ महिलाएं जुड़ी हैं. यानी बैंक के प्रबंधन से लेकर ग्राहकों तक आपको सिर्फ महिलाएं ही नजर आएंगी. ऑफिस की रिसेप्शनिस्ट से लेकर मैनेजर, डीजीएम से लेकर मार्केटिंग तक का जिम्मा सिर्फ महिलाओं पर है. 45 साल पुराने इस बैंक की कामयाबी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह बैंक कभी नुकसान में नहीं रहा है. सेवा बैंक की डीजीएम कश्यपी मेहता गर्व से बताती हैं, ‘भले ही हमारा प्रॉफिट प्राइवेट बैंकों की तरह ना हो लेकिन हमें कभी घाटा नहीं उठाना पड़ा.’

महिलाओं से, महिलाओं का बैंक

SEWA के मायने सेल्फ एंप्लॉयड विमेन एसोसिएशन से है. इस बैंक में आने वाली ज्यादातर महिलाएं कमजोर तबके से आती हैं. ये पापड़ बनाती हैं. कढ़ाई करती हैं. फूल या सब्जी बेचने का काम करती है. इनका सबसे ज्यादा भरोसा अपने आगेवान या लीडर पर होता है. इन्हीं के कहने पर ये पहली बार सेवा बैंक में अपना खाता खुलवाते हैं. और इन्हीं के इशारे पर यह फैसला करती हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वह किसे वोट देंगी.

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बैंक में आने वाली कुछ महिलाओं से जब यह पूछा गया कि इसबार में किसे वोट देंगी, उन्होंने छूटते ही कहा भाजप को. गुजरात में बीजेपी को भाजप कहते हैं. यानी भारतीय जनता पक्ष. उन महिलाओं का कहना था कि नरेंद्र मोदी ने गैस का बाटला (गैस सिलिंडर) देकर उनकी जिंदगी बदल दी है. हालांकि कुछ महिलाओं की यह भी शिकायत थी कि उन्हें अभी तक सिलिंडर नहीं मिल पाया है. उनका कहना था कि सरकार बाटला दे रही है लेकिन स्थानीय नेताओं की वजह से उनका यह काम नहीं हो पा रहा है. लिहाजा इन्हें कोई बदलाव नहीं चाहिए. गुजरात की आबादी का यह वो तबका है जिसे स्थानीय विधायकों से शिकायत हो सकती है. पार्टी से भी नाराजगी हो सकती है लेकिन लीडर चाहिए तो सिर्फ मोदी की तरह.

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सेवा बैंक में करीब दो घंटे बिताने के दौरान एक भी ऐसी महिला नहीं मिली जो गुजरात में बदलाव चाहती हो. वैसे यह अलग बात है कि कुछ महिलाओं ने कहा कि वे अपने आगेवान के कहने पर ही वोट डालती हैं.

क्या रहा नोटबंदी का असर?

सेवा बैंक की डीजीएम (प्लानिंग) कश्यपी मेहता से जब यह पूछा कि नोटबंदी का बैंक और उनके ग्राहकों पर क्या असर हुआ. वह मुस्कुराते हुए बताती हैं कि नोटबंदी के दौरान उन्हें नहीं लगा था कि उनकी बहनों के पास इतना कैश होगा. नोटबंदी ने उनका काम आसान बना दिया है. 500 और 1000 रुपए के नोट बदलने के दौरान गुजरात के दूर-दराज के इलाकों से काफी महिलाएं सेवा बैंक के अलग-अलग ब्रांच पर आईं. इससे बैंक का दायरा बढ़ गया है.

कश्यपी मेहता.

कश्यपी मेहता.

मेहता ने कहा, ‘बैंक पर इनका भरोसा एकबारगी नहीं होता. अपने आगेवान के कहने पर धीरे-धीरे ये अपनी जमा पूंजी बैंक में डालना शुरू करती हैं. नोटबंदी ने उनका काम आसान कर दिया था.’ मेहता आगे बताती हैं, ‘ये बहनें नोटबंदी से पहले तक जमीन में घड़ा गाड़कर उसमें पैसे छिपाती थीं. या किसी डिब्बे या बक्से में रख देती थी. इससे कई बार पैसे चोरी हो जाते थे या फिर उन्हें चूहे कुतर देते थे. लेकिन नोटबंदी के बाद उनके ग्राहक भी बढ़े हैं और उनका निवेश भी.’

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मेहता के मुताबिक, महिलाओं को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने का काम उनके आगेवान करते हैं. बैंक अपनी तरफ से उन्हें खर्च और बचत के बीच में सामंजस्य बिठाने के लिए प्रशिक्षित करता है. निवेश की सुविधा के साथ यह बैंक अपने ग्राहकों को लोन, पेंशन प्लान और इंश्योरेंस भी मुहैया कराता है. सेवा बैंक जमा खाते पर 6 फीसदी का ब्याज देता है. और लोन पर ब्याज दर 12.50 फीसदी से लेकर 18.50 फीसदी तक है. फिलहाल गुजरात में इसकी 13 शाखाएं और करीब 4.50 लाख ग्राहक हैं.

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कैसे शुरू हुआ सेवा बैंक?

सेवा बैंक के शुरू होने की कहानी दिलचस्प है. गांधी विचारधारा से प्रभावित इला बेन ने कुछ दूसरी बहनों के साथ सेवा बैंक शुरू किया था. इला बेन एलएलबी थी. बात 1970 की है. कुछ महिलाओं के साथ वे एक संस्था में सिलाई, कढ़ाई जैसे काम करती थीं. लेकिन उन महिलाओं को अपने काम की सही कीमत नहीं मिल पा रही थी. यहीं से इला बेन को खुद का बैंक शुरू करने का आइडिया आया. 19 जुलाई 1969 को ही इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था. अपना बैंक शुरू करने के आइडिया के साथ इला बेन जहां भी जातीं उन्हें यही सलाह दी जाती थी कि जिन अनपढ़ महिलाओं पर भरोसा करके वह बैंक शुरू करना चाहती हैं वो उसे डुबा देंगी. लेकिन इला बेन ने हार नहीं मानी.

इला बेन.

इला बेन.

कई बार मुलाकात के बाद जब आरबीआई ने उनकी बात मानी तो बात 40,000 पूंजी जुटाने पर अटक गई. बात 1973 की है. दिसंबर 1973 में इला बेन ने एक बैठक की. इसमें करीब 4000 महिलाएं आईं. इला बेन ने बताया कि बैंक शुरू करने के लिए कम से कम 40,000 रुपया जुटाना जरूरी है. तब सब महिलाओं ने अपनी गाढ़ी कमाई से 10-10 रुपए जमा किए और यह बैंक शुरू हुआ.

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ऐसा नहीं था कि उस दौर में बैंक नहीं थे. लेकिन अनपढ़ होने की वजह से इन महिलाओं को यह पता नहीं चलता था कि कब बैंक जाना है. कई बार ऐसा होता था कि दिन भर काम करने के बाद अपनी दिहाड़ी मजदूरी लेकर वो बैंक पहुंचती थी तो बैंक जमा लेने से मना कर देते थे. नतीजा होता था कि वो पैसे कहीं ना कहीं खर्च हो जाते थे. लेकिन सेवा बैंक ने इन सारी मुश्किलों को खत्म कर दिया. बैंक के कर्मचारी इन ग्राहकों के घर जाकर उनसे जमा लेते हैं. अगर कोई महिला पैसे जमा करने बैंक आई है और बैंक बंद होने वाला है तो भी कोई जमा लेने से इनकार नहीं करता. इस बैंक ने गुजरात की महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता में अहम कदम उठाया है, जिसका असर आज साफ नजर आ रहा है.

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