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अच्छे दिनों की पहली कड़ी साबित हो सकती हैं जीएसटी में मिली राहत

बीजेपी सबसे पुराने और पारंपरिक वोटबैंक यानी कारोबारी वर्ग के धैर्य को एक सीमा से ज्यादा टेस्ट करने का जोखिम नहीं लेना चाहती

Updated On: Oct 07, 2017 05:29 PM IST

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar
लेखक भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि मामलों के जानकार हैं

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अच्छे दिनों की पहली कड़ी साबित हो सकती हैं जीएसटी में मिली राहत

शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल की ओर से हुई राहत की बौछार 2018-19 के आम बजट से मध्य वर्ग और कारोबारियों के लिए आने वाले अच्छे दिनों की आहट हो सकती है.

जीएसटी काउंसिल की शुक्रवार को हुई बैठक यूं तो अपनी तरह की 22वीं बैठक थी, लेकिन जिस तरह इस पर मीडिया और आम लोगों की आंखें लगी थीं, वह कुछ अलग था.

खासतौर पर कंपनी सचिवों के एक सम्मेलन में दो दिन पहले जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी के कारण कारोबारियों को हो रही मुश्किलों से निजात दिलाने के लिए अहम बदलाव करने की घोषणा की थी, उसके बाद काउंसिल की बैठक के नतीजों की अहमियत बढ़ गई थी.

और देर शाम जब काउंसिल की बैठक खत्म हुई, तो उसके फैसलों ने सचमुच न केवल कारोबारियों को, बल्कि उपभोक्ताओं को भी राहत की सांस दी.

मुश्किल पैदा कर सकता है कार्यकर्ताओं के फीडबैक को इग्नोर करना 

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लेकिन शुक्रवार को लिए गए काउंसिल के फैसलों का महत्व कारोबारियों और कंज्यूमर्स के लिए जितना है, उससे कहीं ज्यादा राजनीतिक है. काउंसिल के फैसले अब जगजाहिर हैं और इन पर काफी कुछ लिखा जा चुका है.

लेकिन इसके राजनीतिक महत्व और असर का विश्लेषण होना अभी बाकी है. पहले मोदी के भाषण और अब काउंसिल के फैसलों से एक बात धीरे-धीरे साफ होने लगी है कि सरकार 'मूर्खों के स्वप्नलोक' में जीने को तैयार नहीं है.

बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों कार्यकर्ता, जो जमीन पर काम करते हैं और लगातार आम लोगों के संपर्क में रहते हैं, वे बहुत आसानी से मोदी सरकार के लिए उमड़ते जनसमर्थन में आती खलिश को महसूस कर रहे हैं.

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ऐसा हर पार्टी या संगठन के साथ होता है. लेकिन मुश्किल तब होती है जब पार्टी या संगठन के लोग जो सत्ता में बैठे हैं, सत्ता के नशे में नीचे से आ रहे फीडबैक पर मिट्टी डालकर अपनी मस्ती में मस्त रहने लगते हैं.

लेकिन बूथ मैनेजमेंट के बूते चुनाव जीतने के फॉर्मूले में सिद्धहस्त अमित शाह और दशकों संघ के प्रचारक रह चुके नरेंद्र मोदी शायद वही गलती करने के मूड में नहीं हैं, जो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और केंद्र में सोनिया गांधी ने की.

2019 के आम चुनावों का बिगुल बजने में अब भी देर है. लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी अच्छी तरह जानती है कि पब्लिक परशेप्सन का खेल एक बार बिगड़ने के बाद उसे समय रहते ठीक करना लगभग असंभव होता है. और इस बिगड़ते परसेप्शन को अब जमीन से जुड़ा हर कोई महसूस करने लगा है.

खेल बिगड़ने से पहले हो रही है मैदान ठीक करने की कवायद 

ऐसे में जीएसटी काउंसिल की ओर से कारोबारियों और उपभोक्ताओं को शुक्रवार की शाम दी गई भारी राहत को खेल बिगड़ने से पहले मैदान ठीक करने के लिए की गई एक अहम कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए.

काउंसिल ने छोटे कारोबारियों और निर्यातकों की बड़ी शिकायतों को एक झटके में दूर करते हुए 1.5 करोड़ रुपए तक के सालाना टर्नओवर वाले कारोबारियों को हर महीने रिटर्न फाइल करने और टैक्स भरने की जगह तिमाही आधार पर ऐसा करने की छूट दे दी.

इतना ही नहीं कंपोजिशन स्कीम की न्यूनतम सीमा भी 75 लाख रुपए से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दी गई और निर्यातकों को विभिन्न प्रमोशनल योजनाओं के अंदर टैक्स देने से भी छूट दे दी है.

कारोबारियों का एक बड़ा सिरदर्द वह नियम भी है, जिसके तहत जीएसटी नंबर वाले कारोबारियों को गैर जीएसटी पंजीकृत कारोबारियों के साथ कारोबार करने पर टैक्स का बोझ खुद वहन करना पड़ता था, लेकिन अब उन्हें 1 अप्रैल तक इस प्रावधान से भी मुक्ति मिल गई है. कारोबारियों के अलावा उपभोक्ताओं को भी 27 वस्तुओं पर जीएसटी दरें कम कर राहत दी गई है.

काउंसिल के फैसलों को सार्वजनिक किए जाने के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट कर कहा कि इन बदलावों से छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए जीएसटी और भी आसान हो गया है.

Arun Jaitley at his office

इससे पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि काउंसिल ने गहराई से टैक्स ब्यौरों का जो अध्ययन किया है, उससे साफ है कि कुल कर संग्रहण का 94-95 प्रतिशत केवल बड़े करदाताओं से आता है.

उन्होंने कहा, 'ऐसा महसूस किया गया कि छोटे कारोबारियों पर टैक्स का बोझ कम है लेकिन उप कम्प्लायंस का दबाव बहुत ज्यादा है.'

जाहिर है कि केंद्र सरकार बीजेपी के सबसे पुराने और पारंपरिक वोटबैंक यानी कारोबारी वर्ग के धैर्य को एक सीमा से ज्यादा टेस्ट करने का जोखिम नहीं लेना चाहती.

पहले नोटबंदी और अब जीएसटी की सबसे बड़ी मार इसी वर्ग पर पड़ी है और अब धीरे-धीरे यह वर्ग सरकार के प्रति अपने असंतोष को लेकर मुखर भी होने लगा है.

सरकार के खिलाफ बने माहौल के ठीक करना आसान नहीं 

मोदी जानते हैं कि व्यवस्था को बदलने की उनकी कोशिशों से मौजूदा व्यवस्था का लाभ उठा रहे उनके लाखों समर्थक विरोधी बन सकते हैं. अपने इसी नुकसान को पूरा करने के लिए मोदी पिछले 3 साल से लगातार अपनी सरकार की छवि गरीब-समर्थक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.

पहले उज्जवला और अब सौभाग्य जैसी योजनाओं से नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में काफी हद तक सफलता भी हासिल की है.

लेकिन मोदी-शाह यह भी जानते हैं कि एक बार यदि देश में सरकार के खिलाफ माहौल बना, तो फिर विरोधी बयार बहने में देर नहीं लगेगी. इसलिए उनके लिए इस बदलते माहौल में एक सार्थक हस्तक्षेप की तुरंत आवश्यकता थी, जो उन्होंने शुक्रवार की जीएसटी काउंसिल के माध्यम से की है.

इस बैठक के फैसलों का एक निहितार्थ यह भी है कि 2018-19 के लिए आम बजट कारोबारियों और मध्यवर्ग के लिए सौगातों का पिटारा लेकर आ सकता है. यदि सचमुच काउंसिल के फैसले इस श्रृंखला की पहली कड़ी साबित हुई तो अगले डेढ़ वर्ष में मध्य वर्ग और कारोबारियों के अच्छे दिनों का इंतजार खत्म हो सकता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)  

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