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पीएनबी घोटाला: निजीकरण नहीं, बैंक वालों के हालात सुधारे जाएं

बड़े बैंक अधिकारियों के स्तर पर सरकारी और निजी बैंकों की तनख्वाह का अंतर 20 गुना तक है

Milind Deora Milind Deora Updated On: Feb 24, 2018 05:46 PM IST

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पीएनबी घोटाला: निजीकरण नहीं, बैंक वालों के हालात सुधारे जाएं

पंजाब नेशनल बैंक में हुए कर्ज घोटाले को लेकर आरोपों, अफवाहों और विवादों का तूफान सा आया हुआ है. इस बारे में बहुत कुछ कहा-सुना जा रहा है. और जैसा कि किसी भी बड़े विवाद में होता है, इस मामले को लेकर भी सियासी आरोप-प्रत्यारोप का खेल हो रहा है.

मैं ये मानता हूं कि मौजूदा सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए. इस घोटाले को लेकर उसकी जवाबदेही बनती है. क्योंकि सरकार इस घोटाले को रोकने में नाकाम रही. लेकिन, मेरा ये भी मानना है कि इस मामले से राजनीति को अलग करके, बैंकिंग सिस्टम में आई सड़न को दूर करने के तरीके तलाशे जाने चाहिए.

तनख्वाह का फर्क

क्वार्ट्ज इंडिया की 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक निजी और सरकारी बैंकों के कर्मचारियों की सैलरी में जमीन आसमान का अंतर है. रिपोर्ट से पता चला था कि उस वक्त देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य को 2016-17 में 28.96 लाख रुपए सैलरी मिलती थी. वहीं निजी क्षेत्र के सबसे बड़े आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर को 6.09 करोड़ तनख्वाह मिल रही थी. उसी दौरान एचडीएफसी के मैनजिंग डायरेक्टर आदित्य पुरी की सैलरी 10.05 करोड़ थी.

SBI

निजी बैंकों की बैलेंस शीट मिलाएं तो ये सरकारी बैंकों के अधिकारियों की सैलरी के ठीक उलट हैं. कहने का मतलब ये कि सरकारी बैंक, निजी क्षेत्र के बैंकों से कई गुना ज्यादा कर्ज बांटते हैं. इनमें जोखिम भी ज्यादा होता है, जिसकी निगरानी सरकारी बैंकों के बड़े अधिकारियों को करनी होती है. यही पर तनख्वाह में ये फर्क असर दिखाता है और मुश्किलें खड़ी करता है. सरकारी बैंकों के काबिल अधिकारियों को इतनी कम सैलरी मिलना परेशानी की बात है. इसी से भ्रष्टाचार पनपता है.

इंडियन एक्सप्रेस में लिखे लेख में उदयन मुखर्जी कहते हैं कि कम तनख्वाह पाने वाले अधिकारियों की ये सेना ही सरकारी बैंकों में निक्कमेपन और भ्रष्टाचार को जन्म देती है. बहुत से दूसरे जानकारों की तरह उदयन मुखर्जी ने भी सरकारी बैंकों के निजीकरण की वकालत की है.

देश के बैंकिंग सेक्टर में आए संकट से निपटने के लिए बहुत से बैंकरों और अर्थशास्त्रियों ने सरकारी बैंकों के निजीकरण का सुझाव दिया है. मैं भी मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस का बहुत बड़ा समर्थक हूं. मेरा भी यही मानना है कि सरकार को नियामक का काम करना चाहिए, न कि कारोबार करना चाहिए.

मगर, याद रखिए कि बैंकिंग सेक्टर एकदम अलग है. मसलन, अगर हवाई क्षेत्र में कोई एयरलाइन नाकाम होती है, या किसी घोटाले में पकड़ी जाती है, तो इसका नुकसान सिर्फ उस एयरलाइन कंपनी के शेयरधारकों और कर्मचारियों को उठाना पड़ता है. लेकिन, एक निजी बैंक तबाह होता है, जैसा कि 2007-2008 में दुनिया भर में आए आर्थिक संकट के दौरान हुआ था, तो इसका असर सिर्फ बैंकों के शेयरधारकों और कर्मचारियों पर नहीं पड़ा था. इसका असर बैंकों में पैसा लगाने वालों पर भी पड़ा था.

बैंकिंग सेक्टर के ग्राहक किसी और कारोबार के मुकाबले ज्यादा जोखिम उठाते हैं. क्योंकि उन्होंने अपनी पूंजी बैंकों में जमा की होती है.

सरकारी बैंकों के फायदे

हमें ये भी याद रखना चाहिए कि भारत पर 2007-2008 की आर्थिक मंदी का ज्यादा असर नहीं पडा था. इसकी बड़ी वजह ये थी कि देश के कुल बैंकिंग कारोबार का 70.5 फीसद बाजार सरकारी बैंकों के पास था. वो आर्थिक संकट लालच की वजह से पैदा हुआ था. तब हमारे सरकारी बैंकों की अक्षमता ने ही हमें बचा लिया. तभी हम उस आर्थिक जलजले के कहर से बच गए थे.

icici bank

जो लोग सरकारी बैंकों के निजीकरण की वकालत करते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वो एक दशक पहले की अपनी करतूतें भूल गए हैं? जब उनके फैसलों की वजह से बैंकिंग सिस्टम की जड़ें हिल गई थीं.

मौजूदा घोटाले के संदर्भ में हमें दैत्य और राक्षस के बीच चुनाव करना है. हमें उसे चुनना चाहिए, जो कम खतरनाक और नुकसानदेह है. हमें ये तय करना होगा कि हमारा पैसा कम सैलरी पाने वाले सरकारी बैंकों के अधिकारियों के हाथों में सुरक्षित है. या फिर, ज्यादा तनख्वाह पाने वाले लालची और अनैतिक निजी क्षेत्र के बैंकर के हाथ में.

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