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कुशल प्रबंधन, सख्त कदम और नेकनीयती से फिर जोशीली उड़ान भर सकती है एयर इंडिया

इसकी दुर्दशा का एक बड़ा कारण राजनीतिज्ञ ही रहे हैं. सभी संबद्ध पक्षों की राय लेकर सरकार तुरंत ही कोई बड़ा कदम उठाए

Madhurendra Sinha Updated On: Jun 06, 2018 05:28 PM IST

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कुशल प्रबंधन, सख्त कदम और नेकनीयती से फिर जोशीली उड़ान भर सकती है एयर इंडिया

एयर इंडिया से पीछा छुड़ाने में सरकार विफल रही. उसकी योजना थी कि इस रुग्ण एयरलाइंस से छुटकारा पा लिया जाए और उसके कर्ज की भरपाई हो. सरकार ने इसमें अपनी 76 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का ऑफर दिया था. उसका इरादा 24 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखने का था जो असल में इसके न बिकने की महत्वपूर्ण वजह बनी.

पहले तो लगा कि टाटा या कोई बड़ी एयरलाइंस इसे खरीद लेगी लेकिन बाद वे पीछे हट गए. तब भारत की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइंस इंडिगो ने बोली लगाने की बात कही लेकिन वह भी पलट गई और पिछले हफ्ते इसे बेचने की तयशुदा तिथि निकल गई. फिलहाल इस एयरलाइंस को बेचने की बात टल गई है. कुल 27,000 कर्मचारियों वाली इस एयरलाइंस के पास सालाना 2500 विदेशी और 37 देसी उड़ानों की क्षमता है.

71 साल पहले जेआरडी टाटा द्वारा दो सिंगल इंजन विमानों से शुरू की गई इस एयरलाइन के पास आज 18 विमानों का विशालकाय बेड़ा है. यह दुनिया के सभी प्रमुख शहरों में उड़ान भरती है. 2007 के पहले एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस दो अलग-अलग कंपनियां थीं लेकिन उस साल दोनों का विलय कर दिया जो इसके पतन का एक बड़ा कारण भी था.

विदेशों को उड़ान भरने वाली एयर इंडिया भारी भरकम स्टाफ और उच्च प्रबंधन की उपेक्षा तथा भ्रष्टाचार के कारण घाटे में रहती थी. उसे इंडियन एयरलाइंस के साथ मिलाकर उसकी भी हालत खराब कर दी गई. इसे आगे बढ़ाने की बजाय राजनीतिज्ञों ने अरब मुल्कों की एयरलाइंस को वरीयता दी और लाभप्रद विदेशी रूट पर सीटें घटा दीं.

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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. फोटो: गेटी

यूपीए सरकार ने उसे उबारने के लिए एक आईएएस अधिकारी को एमडी बनाकर भी भेजा लेकिन वह भी कुछ नहीं कर पाए. बाद में अश्विनी लोहानी जो रेलवे सेवा के अधिकारी थे, इसके सीएमडी बनाए गए. उनके बाद आईएएस अधिकारी राजीव बंसल ने इसकी कमान संभाली है. भारतीय सेवा के इन अधिकारियों की वहां नियुक्ति के पीछे वजह यह थी कि यह एयरलाइन यूनियनबाजी और अनुशासनहीनता के दौर से गुजर रही थी जिससे किसी तरह के सुधार की गुंजाइश नहीं रह गई थी. इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे और सरकार को इसके निजीकरण का फैसला करना पड़ा. लेकिन अब कोई भी बड़ी कंपनी या एयरलाइंस इसे लेना नहीं चाहती है.

कहते हैं कि सरकार ने खरीदारों के लिए कई ऐसी शर्तें रखीं जो उन्हें मंजूर नहीं थीं. सबसे बड़ी बात यह थी कि इस सौदे में पारदर्शिता नाम की कोई चीज नहीं थी. सरकार 24 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखकर इसे पीछे से चलाना भी चाहती थी. इससे सरकारी हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहती और स्वतंत्र रूप से फैसले लेना मुश्किल होता. एक बीमार कंपनी को खरीदने के बाद कई कड़े फैसले लेने होते हैं जो इस हालत में संभव नहीं होता.

दूसरी बड़ी बात यह रही कि इस एयरलाइन में प्रति विमान स्टाफ की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा थी जो घाटे का बड़ा कारण है. एक समय प्रति विमान कर्मचारी संख्या प्रति उड़ान 300 थी जिसे अब घटाकर 108 कर दिया गया है. दरअसल इस एयरलाइंस में राजनीतिक हस्तक्षेप बहुत ज्यादा रहा और कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर नियुक्ति की गई. न तो जरूरत के हिसाब से लोग रखे गए और न ही उपयोगिता की दृष्टि से. इससे एयरलाइंस को बहुत नुकसान हुआ.

एक बात और भी इसके विनिवेश के खिलाफ रही और वह यह कि इस समय वित्तीय बाजारों की हालत खस्ता है और बैंक बड़े कर्ज देने में आनाकानी कर रहे हैं तथा ब्याज दरें आकर्षक नहीं हैं. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर आसमान छू रही हैं. ऐसी स्थिति में खरीदार के सामने संकट खड़ा रहेगा. अगर आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल न हों तो इस तरह का बड़ा सौदा बड़े घाटे का कारण बन सकता है.

कोई भी कंपनी इस तरह का जोखिम भरा कदम उठाना नहीं चाहेगी. एयर इंडिया पर 34,000 करोड़ रुपए का भारी कर्ज है जिसे खरीदार को ही चुकाना होगा. इसके अलावा यह घाटे में चल रही है. इसका मतलब हुआ कि खरीदार को न केवल यह भारी-भरकम कर्ज चुकाना होगा बल्कि साथ ही साथ कंपनी को घाटे से उबराना होगा.

यह बहुत बड़ा टास्क है और इसके लिए वित्तीय रूप से बहुत सक्षम कंपनी को मैदान में उतरना होगा. देश में एविएशन इंडस्ट्री की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कोई भी कंपनी इतना बड़ा जोखिम उठाना नहीं चाहेगी.

अब सवाल है कि सरकार क्या करेगी? उसके सामने कोई विकल्प नहीं है. उसे गंभीरता से इसके उद्धार को बारे में सोचना होगा और इसके लिए कई सुझाव आने शुरू हो गए हैं. उद्योगपति आनंद महिंद्रा, स्वदेशी जागरण मंच तथा अन्य कई विशेषज्ञों ने सरकार को अच्छी सलाह दी हैं. इन पर अमल करके सरकार इसे फायदे का सौदा बना सकती है.

Anand Mahindra

उद्योगपति आनंद महिंद्रा

महिंद्रा ने इसके लिए पांच सूत्रीय फॉर्मूला बताया है और उनका कहना है कि सरकार को पहले इसे लाभ देने वाली कंपनी बनाना चाहिए. इसके बाद ही इसे बेचने के बारे में सोचना चाहिए. उनका कहना है कि मेट्रो मैन श्रीधरन की तरह का ही कोई ईमानदार और प्रतिबद्ध व्यक्ति इसका चेयरमैन बनाया जाए. उसे पूरे अधिकार दिए जाएं और उसके काम में किसी तरह की दखलंदाजी न की जाए. उसे राजनीतिक दबाव से मुक्त रखा जाए. अगर वह कड़े कदम उठाता है तो उसमें सरकार का भी साथ होना चाहिए.

स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि प्रबंधन में बदलाव और लागत कम करके इसे लाभ की स्थिति में पहुंचाया जा सकता है. इसके अलावा इसे शेयर बाजार में उतारा जाए. इससे काफी रकम मिलेगी और उसका उपयोग इसके सुधार में किया जाए. जागरण मंच इसके लिए ब्रिटिश एयरवेज का उदाहरण दे रहा है जो बहुत घाटे में रहने के बाद बेहतर प्रबंधन और कुशलता से लाभदायक कंपनी बन गई और उसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उसका निजीकरण किया. अब एयरइंडिया के कामकाज में पारदर्शिता लाने की जरूरत है और इसे राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना होगा ताकि यह भ्रष्टाचार से बच सके.

घाटे में उड़ रही और भारी कर्ज से दबी इस एयरलाइंस को कड़े निर्णयों तथा कुशल कप्तान की जरूरत है. इससे ही यह लाभ में पहुंच जा सकती है. इसमें सभी का भला है. इतने बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर और बेड़े वाली एयरलाइंस प्रतिबद्धता और निष्ठा से लाभ में आ सकती है.

कुशल प्रबंधन, सख्त कदम, कर्मचारियों से बेहतर रिश्ते और नेकनीयती से महाराजा फिर से अपनी शान वापस पा सकते हैं. सबसे बड़ी बात है कि इसे राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाए. इसकी दुर्दशा का एक बड़ा कारण राजनीतिज्ञ ही रहे हैं. सभी संबद्ध पक्षों की राय लेकर सरकार तुरंत ही कोई बड़ा कदम उठाए और इसके लिए नई योजना की घोषणा करे तथा उसका समुचित कार्यान्वयन भी करे. यह सबके हित में है और इसमें ही महाराजा की भलाई है.

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