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जीडीपी ग्रोथ 3 साल में सबसे कम: सरकार संभल जाए नहीं तो आएगा और बुरा दौर

नोटबंदी और जीएसटी से असंगठित क्षेत्र पर तगड़ी मार पड़ी है, जिसका सीधा असर संगठित क्षेत्र के जीडीपी ग्रोथ पर नजर आ रहा है .

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Sep 01, 2017 09:35 AM IST

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जीडीपी ग्रोथ 3 साल में सबसे कम: सरकार संभल जाए नहीं तो आएगा और बुरा दौर

अर्थव्यवस्था अभी नोटबंदी के दर्द से उबर नहीं पाई है. इस फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही के आंकड़ों को देखकर तो कम से कम यही लगता है. अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक विकास दर घटकर 5.7 फीसदी पर आ गई. इससे पहली तिमाही (मार्च 2017 ) में विकास दर 6.1 फीसदी थी. पिछले साल की जून तिमाही से तुलना करें तो यह गिरावट और बड़ी नजर आएगी. उस दौरान आर्थिक विकास दर 7.9 फीसदी थी.

दिलचस्प है कि मार्च 2017 तिमाही के जब आंकड़ें आए थे, सरकार अपनी पीठ थपथपाकर यह कह रही थी कि नोटबंदी की जीडीपी ग्रोथ पर उतना बुरा असर नहीं पड़ा है, जितनी आंशका जताई जा रही थी. लेकिन इस तिमाही के आंकड़ों ने नोटबंदी के दुष्प्रभाव को पूरी तरह उजागर कर दिया है.

क्या है जानकारों की राय?

जाने-माने अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि सरकार को अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अहम कदम उठाना होगा, नहीं तो हालत और खराब होंगे. उन्होंने कहा, 'सही मायने में देखा जाए को भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ फिलहाल नकारात्मक है. सरकार ने जीडीपी की गणना ठीक से नहीं की है.' उन्होंने कहा, 'सरकार नोटबंदी से पहले और नोटबंदी के बाद एक ही पैमाने यानी संगठित क्षेत्र के आधार पर जीएसटी की गणना कर रही है.'

अरुण कुमार का कहना है कि नोटबंदी का संगठित क्षेत्र से ज्यादा असंगठित क्षेत्र पर बुरा असर पड़ा है. पहले ही नोटबंदी से परेशान असंगठित क्षेत्र को जीएसटी ने दोहरी चोट दी है. हालांकि जीडीपी की गणना में सिर्फ संगठित क्षेत्र शामिल हैं. लिहाजा असंगठित क्षेत्र पर नोटबंदी का जो असर पड़ा है वह जीडीपी के आंकड़ों में नजर नहीं आ रहा है. उन्होंने कहा है कि अगर असंगठित क्षेत्र की ग्रोथ को कैलकुलेट करें तो जीडीपी की ग्रोथ इससे भी कम होगी.

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यह पूछे जाने पर कि अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का असर कब तक रहेगा, उन्होंने कहा, 'बाजार में करेंसी की भरपाई होने से हालात एक झटके में बेहतर नहीं हो सकते हैं. मांग और आपूर्ति की चेन बिगड़ गई है. सेवा क्षेत्र में भी भारी गिरावट है. लिहाजा अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सरकार को अहम कदम उठाने होंगे. अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था एक कुचक्र में फंस जाएगी.' उन्होंने कहा, सरकार को मांग और निवेश बढ़ाने की दिशा में कुछ जरूरी कदम उठाना होगा तभी नोटबंदी और जीएसटी का असर कम किया जा सकता है.

मोदी राज की सबसे कमजोर ग्रोथ

सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (सीएसओ) के आंकड़े अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा रही है. इस आंकड़े के मुताबिक, 'रियल' या इनफ्लेशन एडजस्टेड जीडीपी की ग्रोथ पिछले तीन साल में सबसे कम रही. ये आंकड़े देखकर यह साफ है कि 8 फीसदी का ग्रोथ रेट हासिल करने में अभी काफी वक्त लगेगा. फिस्कल ईयर 2015-16 में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट 8 फीसदी थी. अगर आप साल को गौर से देखें तो आपको पता चलेगा कि 2014 में मोदी सरकार आने के बाद यह सबसे कम ग्रोथ रेट है.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सबसे कमजोर मैन्युफैक्चरिंग के आंकड़े रहे. जून 2017 तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ रेट सिर्फ 1.2 फीसदी रही. पिछले साल इसी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ रेट 10.7 फीसदी थी.

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग में गिरावट की अहम वजह जीएसटी को माना जा रहा है. दरअसल सरकार ने जीएसटी लागू करने की डेडलाइन 1 जुलाई तय की थी. जीएसटी लागू होने के बाद टैक्स कैलकुलेशन में बदलाव होना तय था. लिहाजा कारोबारियों का फोकस मैन्युफैक्चरिंग के बजाय पुराना स्टॉक निकालने पर रहा. मैन्युफैक्चरिंग का ज्यादातर काम इस दौरान रुका रहा, जिसका असर जीडीपी पर साफ नजर आ रहा है.

फाइनेंशियल, इंश्योरेंस, रियल एस्टेल और प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर में भी गिरावट आई है. इनकी ग्रोथ रेट जून तिमाही में 6.4 फीसदी रही, जो पिछले साल की इसी तिमाही में 9.4 फीसदी थी.

चीन से पिछड़ी भारत की ग्रोथ रेट

भारत अब तक सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था थी, लेकिन ताजा आंकड़े आने के बाद ऐसा नहीं रह गया है. आर्थिक विकास दर के मामले में अब चीन भारत से आगे निकल गया है. पिछले साल चीन की ग्रोथ रेट 6.9 फीसदी थी. जून 2017 तिमाही में भी चीन अपनी ग्रोथ रेट बरकरार रखने में कामयाब रहा है. जबकि इस दौरान भारत की ग्रोथ रेट घटकर  5.7 फीसदी पर आ गई है.

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