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GDP की बैक सीरिज: नया बेस ईयर तो ठीक है लेकिन नोटबंदी के बाद ग्रोथ कैसे बढ़ी?

ये भी सच है कि अलग तरीके से देखने पर हमें तस्वीर का दूसरा पहलू भी नज़र आ सकता है. यह अर्थशास्त्र में स्वीकार्य तरीका होता है, क्योंकि अतीत की व्याख्या करने के लिए जिन धारणाएं और तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है वो अलग-अलग होता है

Updated On: Nov 29, 2018 06:37 PM IST

Madan Sabnavis

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GDP की बैक सीरिज: नया बेस ईयर तो ठीक है लेकिन नोटबंदी के बाद ग्रोथ कैसे बढ़ी?

अर्थव्यवस्था के किसी भी सेगमेंट के पुराने आंकड़े नए बेस ईयर के हिसाब से निकालना हमेशा से विवादास्पद रहा है. इसमें कई तरह के अनुमान और डाटा मैच करना पड़ता है, जो सब्जेक्टिव है. यानी इसमें बदलाव मुमकिन है. इस साल अगस्त में 2011-12 से पहले के जीडीपी आंकड़ों पर एक पेपर प्रस्तुत किया था और पुराने डाटा को खारिज कर दिया गया. लिहाजा नए पेपर पर बहस शुरू हो दया है. यह उम्मीद पहले से थी कि क्योंकि पहले के बेस ईयर के आधार पर ग्रोथ रेट ज्यादा थी.

इसके बाद CSO यानी सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस को नए बेस ईयर के आधार पर जीडीपी डेटा जारी करने की जिम्मेदारी मिली. इसमें CSO ने एक्सपर्ट्स की नई टीम की मदद ली. पहले से उलट नेशनल एकाउंट्स स्टैटिस्टिक्स (NAS) ने बेस ईयर 2004-05 को नहीं बल्कि 2011-12 को बनाया है.

2011-12 को बेस ईयर बनाने से जीडपी के आंकड़ों में कमी दर्ज की गई. 2008-09 की ग्रोथ  रेट में यह कमी 0.6 फीसदी और 2006-07 में 2.2 फीसदी रही. औसतन ग्रोथ रेट में 1.4 फीसदी की कमी आई है. ये आंकड़े पुराने डिसकशन पेपर में शामिल नहीं था जब पहली बार जीडीपी के आंकड़े जारी किए गए थे.

दूसरी बात, ऐसा पहली बार हुआ था जब कोई डाटा CSO और नीति आयोग ने मिलकर जारी किया गया था. यह देखना दिलचस्प होगा कि ऐसा आगे होता है या नहीं. आमतौर पर अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़े CSO ही जारी करता है.

अलग-अलग आंकड़ों से उलझन

तीसरी और अहम बात ये है कि अगर एक ही विषय पर अलग-अलग विशेषज्ञ गणना के अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हुए अलग नतीजों पर पहुंचते हैं और उलझन पैदा करते हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा करना ठीक है. अगर ये अंतर मामूली होते तो इसे स्टैटिस्टिकल फर्क माना जा सकता था. लेकिन यह फर्क बड़ा है लिहाजा यह बहस का मुद्दा है.

अंत में यह कहा जा सकता है कि बेहतर तुलनात्मक अध्ययन के लिए CSO और नीति आयोग पुरानी विधि से 2011-12 के बाद के आंकड़े भी जारी करती. यह काम दफ्तर में बैठकर भी हो सकता है, लिहाजा यह इतना मुश्किल नहीं था.

इन इत्तेफाकों को दूर रखते हुए यह कहा जा सकता है कि नई पद्धति के जरिए जो आंकड़े पेश किए गए वे पिछले आंकड़ों से कम से कम 1 फीसदी ज्यादा था. लेकिन ये सच नहीं है क्योंकि ये नंबर 1 फीसदी कम हैं. ऐसे में ये अनुमान यहां उल्टा पड़ जाता है क्योंकि अगर हम 2004-05 को बेस इयर मानें तो उस लिहाज़ से साल 2011-12 के सीरिज़ में इसे तार्किक तौर पर ग्रोथ रेट ज्यादा होनी चाहिए थी.

नोटबंदी के बाद ग्रोथ कैसे बढ़ गई?

इसका मतलब है कि जब 2016-17 में नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था कमज़ोर पड़ गई थी और देश में आर्थिक गतिविधि पांच महीने तक स्थिर रही, तो उस समय देश में विकास का दर 7.1 प्रतिशत की बजाय 8.1- 8.6 प्रतिशत रही होगा. अब ये स्वीकार करना बहुत मुश्किल होगा, क्योंकि हमने ये देखा है कि जब विकास दर ऊंचा था तब भी उस अनुपात में देश में रोज़गार वृद्धि नहीं हुई थी.

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ऐसे में ज़रूरी है कि हम उन आंतरिक जानकारियों की तरफ देखें जो हमें दिया गया है. इस पूरे ट्रेंड के मुताबिक ये कहा जा रहा है कि प्राथमिक और माध्यमिक क्षेत्रों ने पुराने सिस्टम की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन कम संतोषजनक रहा है. यह बिल्कुल नए तरह का विचार है, जिसकी तस्दीक खनन क्षेत्र के असाधारण प्रदर्शन से साबित होता है.

मैन्युफैक्चरिंग की गणना के लिए ASI सिस्टम की जगह कॉरपोरेट आउटपुट वैल्यू-एडेड तरीके के इस्तेमाल ने भी नई सीरिज़ के मार्जिन में अंतर आया है, जिससे प्रदर्शन पहले से बेहतर दिख रहा है.

यहां पर दो दिलचस्प निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. पहला यह है कि यदि पहले की श्रृंखला में अनुमानित अनुमानों की तुलना में अगर विकास कम-उत्साहजनक था, तो वित्तीय संकट के बाद जो उपाय किए गए, उससे कोई ख़ास फायदा नहीं हुआ. तो फिर ये सोच कि राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन के कारण अर्थव्यवस्था में तेजी आई है, वो अतिश्योक्ति है.

इसके साथ ही, ये कहना कि हम इस स्थिती में इन संख्याओं के आधार पर पूरी दुनिया से अलग-थलग हो चुके थे, एक मजबूत तर्क नहीं था. दूसरी बात ये कि, उन दिनों जो एक टैग दिया जा रहा था कि हम दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, वो बढ़ा-चढ़ा कर की गई रंगीन बातें थीं जो सच्चाई से कोसों दूर थी. आज ये सभी निष्कर्ष काफी रोचक लग रहे हैं.

दिलचस्प बात ये भी है कि, देश का ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (GFCF) का आंकड़ा भी साल 2006-07 और 2011-12 के बीच 34 प्रतिशत की सीमा के बीच ही रहा, उसमें ज़्यादा बदलाव नहीं आए. लेकिन वित्त-वर्ष 08 में 35.8 प्रतिशत के उच्च स्तर से नीचे गिर गया.

इसका मतलब यह है कि निवेश में जिस लापरवाह तरह से पैसे उधार दिए गए और वो पैसे वहां फंस जाने की जो बात कही गई वो सच नहीं है, क्योंकि निवेश स्तर केवल 1-2 प्रतिशत से ही कम हुआ था. जबकि पिछले तीन वर्षों में यह 28.5 प्रतिशत तक गिर गया है, इसका मतलब ये भी है कि उत्पादकता में 7-8 प्रतिशत की वृद्धि पाने के लिए हमें 34-35 प्रतिशत निवेश की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उत्पादकता तो पहले से ही बढ़ी हुई है.

सच ये है कि नए बेस ईयर पर कोई चर्चा नहीं हो सकती क्योंकि इसे दुनिया भर में स्वीकार लिया गया है. जैसा कि हमने पहले ही कहा था कि ये इस बार के लिए किया गया आधिकारिक अनुमान है, हो सकता है कि कुछ लोग ये मान लें कि इन संख्याओं को पत्थर में अंकित कर दिया जाए. अब आगे से हम जब भी किसी तरह का अनुमान या किसी आंकड़े का विस्तार करेंगे तो विकास की इन संख्याओं को लगातार ध्यान में रखेंगे.

हालांकि, ये भी सच है कि अलग तरीके से देखने पर हमें तस्वीर का दूसरा पहलू भी नज़र आ सकता है. यह अर्थशास्त्र में स्वीकार्य तरीका होता है, क्योंकि अतीत की व्याख्या करने के लिए जिन धारणाएं और तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है वो अलग-अलग होता है. जब हमारे सामने जो कच्चा सामान रखा जाता है वो, और जो सेवाओं की टोकरी होती है अगर वो, अलग हो तो एक नए दृष्टिकोण से काम लिया जाता है. ऐसे में एक अनुरूप चीज़ें पाना मुश्किल होता है, जिनकी व्याख्या के लिए कई प्रॉक्सी का इस्तेमाल होता है और जिसे अपनी-अपनी तरह से परिभाषित किया जाता है. और बहस जारी रहती है.

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