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'रघुराम राजन और उनके जैसे अर्थशास्त्रियों ने बदलाव की बयार को महसूस नहीं किया'

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक बार फिर मोदी सरकार पर हमला बोला है. इस बार राजन ने मोदी सरकार के बड़े गेम चेंजर आर्थिक सुधारों, नोटबंदी और जीएसटी को 2017 में भारत की विकास दर की रफ्तार पर ब्रेक लगाने वाले विलेन ठहराया है.

Updated On: Nov 12, 2018 10:03 PM IST

S Murlidharan

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'रघुराम राजन और उनके जैसे अर्थशास्त्रियों ने बदलाव की बयार को महसूस नहीं किया'

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक बार फिर मोदी सरकार पर हमला बोला है. इस बार राजन ने मोदी सरकार के बड़े गेम चेंजर आर्थिक सुधारों, नोटबंदी और जीएसटी को 2017 में भारत की विकास दर की रफ्तार पर ब्रेक लगाने वाले विलेन ठहराया है. राजन कहते हैं कि सात प्रतिशत की विकास दर भारत के लिए पर्याप्त नहीं है. लेकिन नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने रघुराम राजन के तर्क का जवाब बिल्कुल सटीक अंदाज में दिया है.

राजीव कुमार ने कहा कि, 'ये कहना गलत है कि देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर धीमी रहने की वजह नोटबंदी थी. अगर आप विकास दर के आंकड़ों को देखें, तो नोटबंदी के बाद विकास दर अगर कम हुई, तो उस की वजह नोटबंदी नहीं थी. असल में पिछली छह तिमाहियों से विकास दर में गिरावट दर्ज की जा रही थी. इसकी शुरुआत 2015-16 की आखिरी तिमाही से हुई थी. तब से अगली छह तिमाहियों तक विकास दर में लगातार गिरावट आती रही. यानी विकास दर में गिरावट का जो सिलसिला नोटबंदी से पहले से चला आ रहा था, वो नोटबंदी के बाद भी जारी रहा. इसलिए ये दावा गलत है कि कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा और विकास दर में भारी गिरावट आई.'

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प्रतीकात्मक तस्वीर

इसमें कोई दो राय नहीं नोटबंदी की प्रलयंकारी मार के शिकार मंझोले और छोटे कारोबार पर पड़ी. नोटबंदी की वजह से एटीएम सूख गए. बैंकों के खजाने खाली हो गए. लेकिन, इस नुकसान की भरपाई अगले दो महीनों में कर ली गई थी. वहीं, इसके कुछ महीनों के बाद 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू होने के बाद से सरकारी खजाने में ज्यादा टैक्स आ रहा है. अक्टूबर 2018 में मासिक जीएसटी वसूली एक लाख करोड़ से ज्यादा रही और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. टैक्स वसूली का ये आंकड़ा पार करना अब आम बात हो गई है. राजन और उनके जैसे दूसरे अर्थशास्त्रियों को उस वक्त के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का तैयार किया हुआ आर्थिक सर्वे पढ़ना चाहिए. 2018 के बजट से ठीक पहले तैयार किए गए इस आर्थिक सर्वे को बारीकी से पढ़ने के बाद ही राजन को किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए.

आर्थिक सर्वे में जीएसटी के बारे में जो लिखा गया था, उसकी मुख्य बातें इस तरह हैं-

-गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स लागू होने से अप्रत्यक्ष करदाताओं की तादाद पचास फीसद से ज्यादा बढ़ गई है. 34 लाख नए कारोबारियों ने टैक्स देना शुरू किया है.

-जीएसटी में रजिस्ट्रेशन कराने वालों की संख्या इसलिए बढ़ी कि ज्यादातर लोगों ने खुद से इसमें खुद को दर्ज कराया. खास तौर से बड़े कारोबारियों से माल लेने वाले छोटे कारोबारियों ने इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा लेने के लिए खुद को जीएसटी में एनरोल कराया. करीब 17 लाख कारोबारियों ने जीएसटी में रजिस्ट्रेशन कराया, जबकि उनका टर्नओवर तय सीमा यानी बीस लाख रुपए से भी कम था.

-दिसंबर 2017 तक 98 लाख कारोबारियों ने जीएसटी में रजिस्ट्रेशन कराया था, ये पुराने टैक्स सिस्टम से कहीं ज्यादा है.

-जीएसटी से पहले केंद्र और राज्यों का राजस्व 9.7 लाख करोड़ था. जबकि अनुमानित जीएसटी राजस्व 10.9 लाख करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान है. मासिक राजस्व एक लाख करोड़ से ज्यादा होने का साफ मतलब है कि ये अनुमान हकीकत में तब्दील हो रहे हैं.

New Delhi: Indian Youth Congress (IYC) members stage a protest march on the 2nd anniversary of demonetisation outside RBI Headquarters, in New Delhi, Friday, Nov. 9, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI11_9_2018_000045B)

हकीकत ये है कि नोटबंदी और जीएसटी ने मिलकर भारत में कारोबार का तरीका बदल दिया है. जीएसटी के साथ-साथ प्रत्यक्ष कर वसूली भी बढ़ रही है. सीबीडीटी के मुताबिक, 2017-18 में 10.03 लाख करोड़ इन्कम टैक्स वसूला गया था. 2017-18 के दौरान 6.92 करोड़ लोगों ने इन्कम टैक्स रिटर्न दाखिल किया. ये 2016-17 के 5.61 करोड़ से 1.31 करोड़ ज्यादा था. इनकम टैक्स वसूली में इस इजाफे का श्रेय नोटबंदी और जीएसटी के बजाय सातवें वेतन आयोग और सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन को देना बचकाना और गैरजिम्मेदाराना होगा. हम इस सच से परहेज नहीं कर सकते हैं कि नोटबंदी ने देश की नकद अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोर दिया. 86 फीसद करेंसी रातों-रात सिस्टम से खींच ली गई. नकद ही नारायण नहीं है, ये बात अब देश को समझ में आ चुकी है. जीएसटी को जान-बूझकर नोटबंदी के फौरन बाद लागू किया गया या ये गैर-इरादतन कदम था, पर इसने देश की अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित किया, इसमें कोई दो राय नहीं. आजाद भारत में किसी और आर्थिक कदम ने अर्थव्यवस्था पर इतना गहरा असर नहीं डाला. जीएसटी में खुद से निगरानी की व्यवस्था से कारोबारी समझ गया है कि अब सिर्फ अप्रत्यक्ष कर ही नहीं, उसकी आमदनी पर सीधे टैक्स का हिसाब भी सरकार के पास है.

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फॉर्मल इकोनॉमी का हिस्सा

कुल मिलाकर, नोटबंदी और जीएसटी ने देश में आर्थिक लेन-देन को फॉर्मल इकोनॉमी का हिस्सा बना दिया है. कच्ची रसीद से कारोबार करने के दिन लद गए हैं. मोदी ने इन कदमों को उठाकर बता दिया है कि वो 'सब चलता है' की मानसिकता को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. जब ऐसे इंकलाबी कदम उठाए जाते हैं, तो जाहिर है इससे विकास दर थोड़ी धीमी तो होती है. लेकिन, ये कदम भविष्य में तेज विकास की नींव डालते हैं. अफसोस की बात ये है कि भविष्य के इन फायदों को अरविंद सुब्रमण्यम तो देख पाए, मगर ये रघुराम राजन को नहीं दिखा. नोटबंदी के बाद से नेट बैंकिंग, क्रेडिट-डेबिट कार्ड और दूसरे माध्यमों से डिजिटल लेन-देन बढ़ा है. सबसे अच्छी बात तो ये है कि भारत के अपने भीम ऐप का इस्तेमाल भी खूब हो रहा है, जो आधार कार्ड के जरिए पेमेंट कराता है. यानी भीम ऐप एक डेबिट कार्ड का काम करता है. ये इस बात का संकेत है कि ग्रामीण भारत भी अब कैशलेस लेनदेन को अपना रहा है.

7 फीसदी की विकास दर को खारिज करना भी ठीक नहीं

राजन और उनके जैसे अर्थशास्त्रियों ने बदलाव की इस बयार को महसूस नहीं किया है. इसमें कोई दो राय नहीं कि देश को 8 फीसद की रफ्तार वाली विकास दर की जरूरत है. पर, इस साल 7 फीसदी की विकास दर को खारिज करना भी ठीक नहीं. राजन कहते हैं कि भारत ने दुनिया की अर्थव्यवस्था के विकास में आई तेजी का हिस्सा बनने से खुद को रोक लिया. लेकिन, आर्थिक सुधार वाले दो कदमों, नोटबंदी और जीएसटी ने भविष्य में तेज विकास की बुनियाद रखी है. इन दोनों उपायों से अर्थव्यवस्था फॉर्मल इकोनॉमी में तब्दील हुई है. लेकिन, हमारे लिए ये फिक्र की बात है कि इस तरक्की से रोजगार नहीं निकल रहे हैं. पर, यहां ये याद रखना होगा कि ये चुनौती मोदी को यूपीए सरकार से विरासत में मिली. रघुराम राजन इस सरकार में पहले वित्त मंत्रालय से जुड़े अफसर के तौर पर तीन साल काम कर रहे थे. फिर वो तीन साल तक रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे. अपने वारिस को कुछ फायदों के लिए नीचा दिखाना बहुत आसान है. और बैंकों के एनपीए की समस्या सुलझाने को लेकर उनके सुझावों के बारे में जिनता ही कम कहा जाए, उतना ठीक होगा. वो कहते हैं कि सरकारी बैंकों का हिसाब-किताब दुरुस्त होना चाहिए. इसका ये मतलब है कि पहले ही जितनी रकम बैंक डुबो चुके हैं, उसके अलावा अब नए सिरे से कर्ज बांटें. हालांकि राजन मोदी सरकार के इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड के बड़े सुधार के बारे में कुछ भी बोलना भूल गए.

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