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एल्फिंस्टन हादसा: सुरक्षा को दुरुस्त करने के लिए रेलवे को बढ़ाना होगा रेवेन्यू

बेहतर और अधिक संवेदनशील विकल्प ये है कि रेलवे इस बात का पता लगाए कि वह सुरक्षा में पर्याप्त निवेश कर रहा है या नहीं

Updated On: Oct 03, 2017 03:37 PM IST

Sindhu Bhattacharya

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एल्फिंस्टन हादसा: सुरक्षा को दुरुस्त करने के लिए रेलवे को बढ़ाना होगा रेवेन्यू

भारत का उपनगरीय रेल नेटवर्क घाटे में बर्बाद हो रहा है. जहां तक निवेश, क्षमता विस्तार और यहां तक की संवर्धित सुरक्षा मानकों की बात आती है तो यह लगातार उसकी अनदेखी कर रहा है. और, मुंबई का उपनगरीय ट्रेन नेटवर्क, जो वास्तव में लाइफलाइन है, संभवत: सबसे खराब और देश का सबसे बुरा उपनगरीय नेटवर्क है.

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) एक रिपोर्ट में कहते हैं कि जनवरी 2010 से दिसम्बर 2014 के बीच पूरे रेलवे नेटवर्क के उपनगरीय भागों में हुई 33,445 मौतों में से 17,638 (52.74 प्रतिशत) मौत अकेले मुंबई उपनगरीय क्षेत्र में हुई.

मुंबई क्यों खामियाजा भुगते?

इसका मतलब ये है कि पूरे भारत के उपनगरीय नेटवर्क में उन 5 सालों के दौरान मुंबई क्षेत्र में हर सेकेंड मौत हुई है. एक और आंकड़ा: देश के स्तर पर 80 फीसदी से ज्यादा मौत मुंबई उपनगरीय इलाके में चलती ट्रेन से गिरने की वजह से हुई है.

मुंबई क्यों खामियाजा भुगते? जैसा कि इस साल के आरंभ में लोकसभा में दिए गए आंकड़े बताते हैं कि 2015-16 के दौरान 271 करोड़ यात्रियों ने मुंबई उपनगरीय रेलवे नेटवर्क का इस्तेमाल किया. जाहिर है यात्रियों की इतनी बड़ी तादाद को केवल फुट ओवर ब्रिज नहीं चाहिए, दुर्घटना की स्थिति में मूलभूत चिकित्सा सुविधा भी चाहिए.

लेकिन क्या मुंबई और अहमदाबाद के बीच लाखों करोड़ के निवेश से प्रस्तावित बुलेट ट्रेन को रोका जाएगा ताकि वास्तव में संसाधनों का प्रवाह मुंबई के उनगरीय रेल नेटवर्क के लिए संवर्धित आपदा कोष की ओर किया जा सके?

इस बहस में बड़ा मुद्दा कहीं खो रहा है जो इस विशालकाय रेलवे के कामकाज से जुड़ा है, जो दुनिया में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा नियोक्ता है और जो हर दिन 2 करोड़ 20 लाख यात्रियों का परिवहन करता है. वह मुद्दा है रेलवे का गिरता राजस्व. हालांकि रेल मंत्रालय कई सालों से मुनाफा कमा रहा है, इसकी वित्तीय स्थिति वास्तव में पिछले कई सालों से संदिग्ध रही है क्योंकि यह माल ढुलाई के लिए अधिक पैसे वसूल कर यात्रियों को रियायत देना जारी रखे हुए है.

ELPHINSTON_MUMBAI

राजस्व में वृद्धि- चूंकि यात्री और माल भाड़े की मात्रा स्थिर हो गई है, सुरक्षा मानकों की निरंतर उपेक्षा हो रही है. क्या रेलवे बुलेट ट्रेन परियोजना को रोककर सुरक्षा के लिए पर्याप्त निवेश करने की ओर बढ़ेगा?

वास्तव में बेहतर और अधिक संवेदनशील विकल्प ये है कि रेलवे इस बात का पता लगाए कि वह सुरक्षा में पर्याप्त निवेश कर रहा है या नहीं. निश्चित रूप से आंतरिक संसाधनों के जरिए यह निवेश होना चाहिए.

मुंबई के पास शुक्रवार को एल्फिन्स्टन स्टेशन फुट ओवर ब्रिज के टूटने से 22 यात्रियों की मौत के बाद राजनीतिज्ञों ने मोदी सरकार की पोषित योजना- मुंबई और अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन- पर हमला शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि अगर 11-12 करोड़ की लागत से एल्फिन्स्टन फुट ओवर ब्रिज तक दुरुस्त नहीं किया जा सकता है तो इस परियोजना में लाखों करोड़ का निवेश बेकार है.

फंड की नहीं व्यवस्था की कमी है मुद्दा

बड़ा मुद्दा यहां फंड की कमी का नहीं है बल्कि व्यवस्था के पूरी तरह चरमरा जाने का है जो ब्रिज की स्थिति को लेकर लगातार चेतावनी के बाद हुए इस हादसे में दिखता है. जैसा कि हमने पहले कहा था कि सुरक्षा कार्यों में राजस्व से निवेश किया जाना चाहिए, जो लगातार घटता चला गया है.

पहले उद्धृत उसी सीएजी रिपोर्ट में दो प्रासंगिक बिंदु हैं :

1-रेलवे के सभी जोन के उपनगरीय क्षेत्रों में ऑपरेटिंग अनुपात 100 फीसदी से अधिक था जिसका मतलब ये हुआ कि उनका 2010-15 के बीच ट्रेनों की ट्रैफिक से अधिक उसके परिचालन पर खर्च हुआ. यह अपने आप में प्रमाण होना चाहिए कि फंड की कमी का मतलब सुरक्षा पर निवेश की पूरी तरह से अनदेखी है चाहे शीर्ष अधिकारियों के इरादे जितने अच्छे रहे हों.

2- हालांकि उपनगरीय ट्रेन सेवा यात्रियों के परिवहन का अहम हिस्सा है, लेकिन अलग से कोई सांगठनिक व्यवस्था नहीं, जिससे बजट आवंटित कर इस हिस्से में सुधार लाया जाए. इससे यह पता चलता है कि रेलवे के भीतर सांगठनिक सुधार का सम्मान नहीं किया गया है जिसके कारण विशाल उपनगरीय रेल नेटवर्क की जरूरतों पर ध्यान केंद्रित नहीं हो पाया है.

इस हिस्से में पिछले साल सीएजी की कही गई बातें दोहराई गई हैं. यह बताता है कि कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने रेलवे के वर्तमान ढांचे को दोषी ठहराया है जिसने पश्चिमी और मध्य रेलवे प्रमुखों को उपनगरीय रेलवे में शिखर तक पहुंचाया है. उन पर लंबी दूरी की ट्रेनों और मालगाड़ी के परिचालन की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है.

2010 से यात्री कार्यकर्ताओं के प्रस्ताव पड़े हुए हैं जिसमें उपनगरीय रेलवे नेटवर्क को दैनिक सेवा के आधार पर चलाने, उसके रखरखाव, यात्रियों की परेशानी को दूर करने के लिए स्वतंत्र निकाय बनाने की बात कही गई है लेकिन कभी उस पर ध्यान नहीं दिया गया.

Mumbai: A slipper of an injured commuter is seen stuck on the railing of a pedestrian bridge where a stampede took place at the Elphinstone station in Mumbai on Friday. PTI Photo  (PTI9_29_2017_000076B)

भगदड़ के बाद चीजें बदल सकती हैं. इसमें आगे कहा गया है कि ऐसी अथॉरिटी बनाई जानी चाहिए थी. इसे बहुत पहले कर लिया जाना चाहिए था.

बहरहाल, सुरक्षा से जुड़ी बुनियादी संरचनाओं पर निवेश में कमी की बात करें. रेलवे बोर्ड के एक पूर्व चेयरमेन, जो रेलवे में निर्णयकारी होते हैं, उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया था कि देशभर में सुरक्षा को चाक-चौबंद करने पर पूंजी लगाई जा रही है, यह महज एक भ्रम है.

उन्होंने कहा, 'सुरक्षा निवेश के लिए रकम पूंजीगत खर्च से नहीं जुटाई जाती. यह राजस्व से आती है, कमाई से आती है. पूंजी की जरूरत नई चीजों की खरीदारी के लिए होती है, मेंटनेंस हमेशा राजस्व से पूरा होने वाला काम होना चाहिए. क्या आप पूंजीगत खर्च से तनख्वाह देते हैं? इसके अलावा पूंजीगत खर्च से आप रकम खैसे खर्च करते हैं? अगर सुरक्षा मानकों पर खर्च होते हैं तो आपको वापसी की दर भी बतानी होगी.'

क्या कहता है राजस्व का गणित

जिस ओर वे इशारा कर रहे थे वह था निवेश के नाम पर नियमित रूप से रेलवे की ओर से हो रहे बड़े-बड़े पूंजीगत खर्च. इसे गलत समझा गया. यह देशभर में नेटवर्क की सुरक्षा के लिए थे. इसलिए पूंजीगत व्यय का 8 लाख करोड़ रुपए, जिसे सरकार की ओर से अगले कुछ सालों में निवेश के तौर पर बताया जा रहा है उसकी यहां प्रासंगिकता बहुत थोड़ी है.

राजस्व का गणित कुछ इस तरह है :

यात्रियों का किराया कम रखने की समाजवादी मानसिकता के तहत 2014-15 से यात्री किराए में बढ़ोतरी नहीं हुई है और यह दी जा रही सुविधाओं के मुकाबले कम है. उसके बाद रेलवे ने अतिरिक्त रूप से 50 से ज्यादा यात्री श्रेणियों में 10 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक रियायतें बढ़ा दी हैं.

elphinestone road

2015-16 में यात्रियों को रियायतों से राजस्व में 1602 करोड़ की गिरावट आई है. परंपरागत रूप से यात्रियों पर होने वाले नुकसान की भरपाई मालभाड़ा से होती रही है. वर्ष 2015-16 (सबसे नए आंकड़े) के दौरान यात्री सेवाओं में समग्र नुकसान (उपनगरीय और गैर उपनगरीय) 35,038 करोड़ रुपए का हुआ, जो यात्री सेवाओं से हुई आय का 43 फीसदी है. मालभाड़े में भी रेलवे को नुकसान हुआ क्योंकि इसने किराए की दर ऊंची कर दी. इसे साधारण तौर पर समझें तो रेलवे घायल है और उससे यह उम्मीद करना बेवकूफी है कि वह आवश्यक सुरक्षा कार्यों पर निवेश करे.

आमदनी घटने के अलावा ऐसा प्रतीत होता है कि रेलवे की ठेका श्रमिकों पर निर्भरता भी बढ़ती जा रही है जिनके पास सुरक्षा प्रक्रियाओं को लेकर न कोई प्रशिक्षण है और न ही कोई समझ. इसका भी रेलवे के समग्र सुरक्षा रिकॉर्ड पर असर पड़ रहा है.

जब तक गहराई में जाकर व्यवस्थागत बदलाव नहीं होता और रेलवे नेटवर्क की पुनर्संरचना नहीं होती, पर्याप्त निवेश नहीं होता या फिर सही तरीके से कार्यों की निगरानी नहीं होती, दुखद घटनाएं जैसा कि पिछली शुक्रवार को हुईं हैं, आगे भी जारी रह सकती हैं.

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