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इकनॉमिक सर्वे पार्ट-2: कर्जमाफी से देश की अर्थव्यवस्था पड़ी सुस्त

निवेशकों को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि बाजार हर महीने दो हजार प्वाइंट की छलांग नहीं ले सकता

Updated On: Aug 16, 2017 09:29 AM IST

Alok Puranik Alok Puranik
लेखक आर्थिक पत्रकार हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में कामर्स के एसोसिएट प्रोफेसर हैं

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इकनॉमिक सर्वे पार्ट-2: कर्जमाफी से देश की अर्थव्यवस्था पड़ी सुस्त

इकनॉमिक सर्वे 2016-17 के दूसरे हिस्से में कुछ खरी-खरी बातें सामने आई हैं. इनसे यह पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में अभी अच्छे दिनों का इंतजार चल रहा है. फिलहाल 6.75-7.5% की विकास दर को हासिल करना मुश्किल है. मतलब सात प्रतिशत से नीचे के विकास की संभावना हैं. तेजी की स्थितियां ना बनने के कुछ ठोस कारण सर्वेक्षण में दिये गये हैं.

आर्थिक सर्वेक्षण और शेयर बाजार

इन कारणों की रोशनी में स्टॉक बाजार की तेजी अप्रत्याशित ही नहीं आधारहीन भी दिखाई देती है. मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमण्यम के आकलन के हिसाब से शेयर बाजार कृत्रिम ऊंचाईयों पर हैं. इस आकलन का मतलब यह नहीं है कि शेयर बाजार में सेंसेक्स को तीन-चार हजार प्वाइंट नीचे गिर जाना चाहिए या निफ्टी को एक हजार प्वाइंट नीचे आ जाना चाहिए.

निवेशकों को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि बाजार हर महीने दो हजार प्वाइंट की ऊपरी छलांग नहीं ले सकता. हाल के दिनों में शेयर बाजार लगातार ऊपर जा रहा है. इससे कई निवेशकों की आकांक्षाएं अवास्तविक हो गयी हैं. बाजार आशाओं और आशंकाओं के अतिरेक पर चलता है.

कैसे बनाएं बैलेंस?

आशाओं के संतुलन का वक्त है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में उतनी तेजी की स्थिति दिखाई नहीं पड़ रही है, जितनी तेजी से स्टॉक बाजार छलांग लगा गया है. इस साल की शुरुआत से लेकर अब मुंबई  शेयर बाजार का सूचकांक करीब बीस प्रतिशत की छलांग लगा गया है. बीस प्रतिशत की छलांग वाले शेयर बाजार की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा छलांग लगाता हुआ दिखना चाहिए. उस अर्थव्यवस्था का आर्थिक सर्वेक्षण और मुख्य आर्थिक सलाहकार मुश्किल से सात प्रतिशत विकास का अनुमान देते दिखते हैं. economynew

हाल के दिनों में शेयर बाजारों को स्थिति का थोड़ा अहसास हुआ और तेजी में कमी आई. यानी घरेलू अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से बढ़ती नहीं दिख रही है, जितनी तेजी से शेयर बाजार कूदते दिखाई पड़ रहे हैं. यह अलग बात है कि पूरी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के जो हाल हैं, उनमें भारत की अर्थव्यवस्था की सात प्रतिशत विकास दर भी काफी असरदार दिखेगी.

भारतीय शेयर बाजारों में विदेशी पैसा सिर्फ इसलिए नहीं आ रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की गति बहुत तेज है. पैसा इसलिए आ रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के मुकाबले बाकी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बहुत ही सुस्त हैं.

इकनॉमिक सर्वे पार्ट-2 अगर शेयर बाजार गहराई से समझ पाए तो बाजार से तेजी की वजहें कम होती दिखनी चाहिए.

कर्ज माफी के परिणाम

सर्वेक्षण ने कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े दिये हैं. सर्वेक्षण के मुताबिक किसान कर्जमाफी में राज्य सरकारें खर्च कर कर रही हैं तो दूसरे कामों के लिए रकम कम हो रही है. यूपी सरकार ने तमाम परियोजनाओं का खर्च रोक कर किसानों की कर्जमाफी की है.

सर्वेक्षण के अनुमान के मुताबिक जिन राज्यों ने किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की है, उसका असर जीडीपी में करीब पॉइंट 35 परसेंट कमी के तौर पर देखने में आएगा. अगर सारे राज्य किसानों की कर्जमाफी कर देंगे, तो देश की जीडीपी पॉइंट सात परसेंट कम होता दिखाई देगा.

विकास दर को लेकर नकारात्मक आशंकाओं के पीछे किसान कर्ज माफी है. खेती-किसानी की जो हालत है, उनके सुधार के लिए दीर्घकालीन कदम उठें ना उठें, तात्कालिक इलाज कर्ज माफी का इंजेक्शन ही है. चुनाव ने इस इंजेक्शन को अनिवार्य बना दिया है. और कर्ज सिर्फ खेती की समस्या नहीं है. टेलीकॉम और पावर सेक्टर में कर्ज बहुत ऊंचाई पर जा रहे हैं. बैंकों के डूबते कर्जों में बड़ी तादाद इन सेक्टरों की कंपनियों के कर्जों की है.

नोटबंदी के बाद हालात

करीब ढाई महीने बाद नोटबंदी को एक साल हो जाएगा. अब उसका विश्लेषण ज्यादा विस्तार से संभव है. सर्वेक्षण के मुताबिक नोटबंदी के बाद करदाताओं की तादाद में इजाफा हुआ है. सर्वेक्षण की एक तालिका के अनुसार 2015-16 में नए करदाताओं की संख्या में 25.1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई थी. 2016-17 में यह बढ़ोत्तरी 45.3 प्रतिशत रही.

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Source: Getty Images

नोटबंदी के चलते ही करीब 10,587 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय की घोषणा हुई. 2015-16 में औसत कर योग्य आय 2 लाख पचास हजार रुपए थी. 2016-17 में यह बढ़कर दो लाख सत्तर हजार रुपए हो गई. नोटबंदी के नकारात्मक परिणामों के अलावा ये सारे परिणाम सकारात्मक परिणाम के तौर पर ही चिन्हित किए जा सकते हैं.

महंगाई और ब्याज दर

इकनॉमिक सर्वे पार्ट-2 स्पष्ट करता है कि महंगाई कम करने का लक्ष्य कमोबेश हासिल कर लिया गया है. जून, 2017 में उपभोक्ता महंगाई सूचकांक के हिसाब से महंगाई दर सिर्फ 1.5 प्रतिशत रही है, लक्ष्य चार प्रतिशत का था. यानी जो लक्ष्य तय कि गया था, महंगाई उससे काफी कम है. रिजर्व बैंक के लिए इशारा है- ब्याज दरों में कमी लगातार होनी चाहिए पर सिर्फ ब्याज दरों में कमी से अर्थव्यवस्था में तेजी आने की संभावना नहीं है.

इस सर्वे का दूसरा पार्ट काफी बातें खरी-खरी करता है और यह बात साफ कर देता है कि अर्थव्यवस्था तेजी में नहीं है. अर्थव्यवस्था के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं, जिनका मुकाबला करना बाकी है. रोजगार ऐसा ही क्षेत्र है.

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