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बजट में रोजगार और कृषि सुधार की उम्मीद जगाता आर्थिक सर्वेक्षण

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार इस साल जीडीपी में 6.75 फीसद वृद्धि के साथ भारत का दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा बरकरार रहेगा

Anant Mittal Updated On: Jan 30, 2018 08:26 AM IST

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बजट में रोजगार और कृषि सुधार की उम्मीद जगाता आर्थिक सर्वेक्षण

आर्थिक सर्वेक्षण ने रोजगार और कृषि के क्षेत्र में फौरन सुधार की जरूरत पर जोर देकर आगामी बजट में इस बाबत ठोस उपायों की उम्मीद हरी कर दी है. इसके अलावा निर्यात और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की सरकारी तैयारी का रूझान भी यह सर्वेक्षण जता रहा है.

सर्वेक्षण द्वारा निर्यात में कुटीर, लघु और मझोले उद्यमों की मुख्य भूमिका उजागर होने से बजट में इन क्षेत्रों को बढ़ावा देने का इशारा भी मिल रहा है. सर्वेक्षण के अनुसार भारत में शीर्ष एक फीसद कंपनियों की निर्यात में भागीदारी महज 38 फीसद ही है.

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इसलिए संगठित क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के ठोस उपायों के साथ ही सरकार बजट में निर्यात बढ़ाने के लिए वस्त्र, सिलेसिलाये कपड़ों, चमड़े, हीरे-जवाहरात और गहनों से संबंधित उद्यमों को बढ़ावा देने संबंधी और घोषणाएं भी कर सकती है. इनको प्रोत्साहन के लिए सरकार ने पिछले तीन महीनों में भी ठोस उपाय किए हैं.

वस्त्र, परिधान और चमड़े की चीजों के उत्पादन व निर्यात को बढ़ावे से कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी और कृषि में मंदी के मारे किसान को कुछ राहत मिलेगी. आर्थिक सर्वेक्षण भी चालू माली साल में कृषि क्षेत्र में वृद्धि दर महज 2.1 फीसद पर ठिठकने का अनुमान जता रहा है.

किसानों की फिक्र 

इससे साफ है कि पिछले तीन साल में अरहर, आलू, गन्ना, सोयाबीन, मूंगफली से लेकर आलू-प्याज की पैदावार  बढ़ाने के बावजूद उसकी लागत भी नहीं निकल पाने का खामियाजा भुगत चुके किसान ने इस बार खरीफ और रबी दोनों फसलों के लिए फूंक-फूंक कर कदम रखे हैं.

निर्यात के लिए चमड़े का उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार को पशुपालकों को अभयदान देना होगा. क्योंकि पिछली कुछ घटनाओं के कारण पशुपालक ही नहीं मरे जानवरों का चमड़ा उतारने वाली जातियां भी अपने काम से कतराने लगी हैं. इससे देश में चमड़े की कमी हुई और चमड़े की सफाई करने वाली अनेक इकाइयां कानपुर-आगरा में बंद हो चुकीं.

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आर्थिक सर्वेक्षण में हाथ से काम करने वाले अन्य उद्यमों का महत्व रेखांकित किए जाने से उन्हें बढ़ावे की उम्मीद भी जगी है. देश में रोजगारविहीन विकास की अवधारणा को तोड़ने के लिए भी बजट में इस बाबत ठोस उपाय जरूरी हैं. आर्थिक सर्वेक्षण बजट सत्र के पहले दिन सोमवार को वित्तमंत्री अरूण जेतली ने सदन में पेश किया.

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के अनुसार सर्वेक्षण में पहली बार यह तथ्य उजागर हुआ कि जो राज्य निर्यात में अगुआ हैं वहां आर्थिक समृद्धि भी अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक है. इनमें भी महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना अगुआ हैं. इन पांचों राज्यों की देश के कुल निर्यात में 70 फीसद हिस्सेदारी है.

कैसे बनेंगे रोजगार के मौके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति आयोग में अर्थशास्त्रियों और क्षेत्र विशेषज्ञों से 10 जनवरी की बैठक में नए रोजगार पैदा करने, किसानों की आय दोगुनी करने, विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा देने के उपायों बाबत ही सुझाव मांगे थे. अब आर्थिक सर्वेक्षण भी किसानों की आमदनी बढ़ाने सहित इन्हीं मुद्दों की बात कर रहा है.

प्रधानमंत्री ने बीते अक्टूबर में भी अपनी आर्थिक सलाहकार परिषद को यही एजंडा देकर मार्च तक समय दिया था मगर शायद गुजरात के चुनाव नतीजों ने उन्हें तत्काल सुधार को प्रेरित किया है. इसके अलावा मोदी सरकार के हाथ में 2019 के आम चुनाव से पहले यही एकमात्र पूर्ण बजट है, इसलिए भाजपा के साथ ही देश के युवाओं, किसानों और मजदूरों की उम्मीदें भी इसी से जुड़ी हुई हैं.

बजट की प्राथमिकताओं का इशारा करते हुए सर्वेक्षण में युवाओं और महिलाओं के लिए मुनासिब रोजगार, शिक्षित और स्वस्थ कामगारों को तैयार करने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने, कृषि को मौसमी मार से बचाने के उपायों पर भी जोर है.

कृषि विकास के लिए जलवायु स्थिरता की अहमियत को सर्वेक्षण में पहली बार रेखांकित किया गया है. साथ ही निजी निवेश और निर्यात को रोजगार बढ़ाने तथा आर्थिक विकास की धुरी बताया गया है. सर्वेक्षण में जलवायु परिवर्तन के कृषि पर खतरे के प्रति भी सावधान किया गया है.

सर्वेक्षण के अनुसार तापमान बढ़ने से बारिश घटती है जिससे देश में खेतीबाड़ी पर प्रतिकूल असर पड़ेगा क्योंकि हमारे यहां सिंचाई सुविधाओं की भारी कमी है. इससे  असिंचित क्षेत्र की फसल पर सिंचित क्षेत्र के मुकाबले दुगुना असर पड़ता है.

खेती को मिले तवज्जो 

इससे साफ है कि बजट में सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाने के लिए बड़ी राशि आबंटित की जा सकती है. सर्वेक्षण में खेतीबाड़ी में मशीनों का प्रयोग बढ़ाकर पैदावार की लागत घटाने का भी जिक्र है. इससे कृषि विशेषज्ञों के बीच ट्रैक्टर आदि कृषि उपकरणों पर करों में कटौती अथवा उन्हें सस्ता करने के अन्य उपाय बजट में किए जाने की उम्मीद जगी है.

आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार कृषि क्षेत्र में रोजगार की दर को स्पष्ट करने की कोशिश भी की गई है. सर्वेक्षण के अनुसार संगठित क्षेत्र में गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार पाए लोगों की संख्या अब तक के अनुमान से कहीं ज्यादा है.

कुल रोजगाररत लोगों में से करीब 31 फीसद संगठित क्षेत्र में रोजगार करते पाए गए हैं. संगठित क्षेत्र में करीब 7.5 करोड़ लोगों के रोजगाररत होने का यह नया अनुमान सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में पंजीकृत लोगों की संख्या के आधार पर लगाया गया है. इसी तरह जीएसटी के तहत मिले आंकड़ों में यह अनुमान कुल 53 फीसद पाया गया.

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इस लिहाज से संगठित क्षेत्र में कुल 12.7 करोड़ कामगारों का आंकड़ा उभर रहा है. अभी तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कृषि क्षेत्र में कुल 58.2 फीसद कामगारों केे रोजगाररत होने का तथ्य सामने था लेकिन संगठित क्षेत्र में कामगारों की संख्या बढ़ने से इसमें भी कमी आना लाजमी है.

विश्व बैंक ने कृषि क्षेत्र में रोजगाररत लोगों की संख्या साल 2050 तक 25.7 फीसद रह जाने का अनुमान जताया था लेकिन जीएसटी के और अधिक आंकड़े नमूदार होने पर इस संख्या में अगले दो साल में ही भारी उलटफेर हो सकता है.

जीडीपी ग्रोथ का हाल

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार इस साल जीडीपी में 6.75 फीसद वृद्धि के साथ भारत का दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा बरकरार रहेगा. इसके बावजूद ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 100वें नंबर पर आंका जाना हमारी विकास नीतियों को अंगूठा दिखा रहा है.

ऊपर से देश में करोड़पतियों की संख्या ढाई लाख से अधिक पहुचंने का तथ्य हमारे लोकतांत्रिक शासकों के गरीबपरस्त नीतियों के दावे को आईना दिखा रहा है.  क्रेडिट सुइस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार भारत में निजी अमीरी में बढ़ोतरी की दर 9.9 फीसद वार्षिक होने के बावजूद 92 फीसद वयस्कों के पास संपत्ति 6.5 लाख रुपए से भी कम पाई गई है.

इसी तरह अर्थशास्त्री थाॅमस पिकेट्टी के अनुसार साल 1980 से 2014 के बीच भारत में शीर्ष 0.1 फीसद तबके की आमदनी देश की बाकी 50 फीसद आबादी की कुल आमदनी से भी एक फीसद ज्यादा हो गई है. समग्र आर्थिक वृद्धि में से इन 0.1 फीसद लोगों ने जहां 12 फीसद हिस्सा समेट लिया है वहीं निजी दौलत में सबसे निचली पायदान के 50 फीसद लोगों को महज 11 फीसद हिस्सा मिला यानी उंट के मुंह में जीरा आया है.

संसाधनों के बटवारे में विषमता की खाई सबसे गरीब 50 फीसद आबादी के मुकाबले शीर्ष  0.1 फीसद लोगों की आमदनी 550 फीसद बढ़ने से और चौड़ी हो रही है. इसी दौरान सबसे अमीर एक फीसद तबके की आमदनी छह फीसद से बढ़कर 22 फीसद और उपरी दस फीसद दौलतमंदों की आमदनी 30 फीसद से बढ़कर 50 फीसद हो गई है. इसके मुकाबले मध्यवर्गीय 40 फीसद लोगों की आमदनी का आंकड़ा 43 फीसद से भी घटकर महज 30 फीसद रह गया है. पिकेट्टी के अनुसार इस दौरान गरीबों ही नहीं बल्कि मध्यमवर्ग की वास्तविक आमदनी भी लगातार घटी है.

रोजगार पर सरकार का फोकस 

इन भीषण चुनौतियों के बीच आर्थिक सर्वेक्षण से  बजट में बेरोजगारी और किसानों को अधूरे दाम एवं कर्ज के फंदे से छुटकारा दिलाने के ठोस उपायों के आसार बढ़े हैं. देश में कायदे से  हर महीने दस लाख नए युवाओं को रोजगार चाहिए. इसलिए गैर कृषि क्षेत्र में सालाना कम से कम 60 लाख रोजगार पैदा करने ही होंगे. इसके बरअक्स केंद्रीय श्रम ब्यूरो के अनुसार मोदी सरकार पिछले तीन साल में बमुश्किल 70 लाख रोजगार दे पाई है.

अर्थशास्त्रियों का सुझाव रहा कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के बजाय लागत घटाने और पैदावार को बाजार पहुंचाना सुगम करने के ठोस उपाय किए जाएं वरना देश में 1995 से अब तक तीन लाख, 10 हजार से अधिक किसानों द्वारा आत्महत्या की दर और बढ़ सकती है.

इससे कृषि संकट का अनुमान सहज ही  लगता है. पिछले साल कर्नाटक, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश ओर मध्यप्रदेश द्वारा किसान कर्ज माफी की कोशिश के बावजूद किसानों की खुदकुशी जारी  है.

खेती-बाड़ी में घाटे से घबरा कर पिछले 20 साल में 15 करोड़ किसानों ने यह धंधा छोड़ दिया. रोजाना 2000 किसान अपने पुश्तैनी धंधे से तौबा कर रहे हैं. साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश में सात साल पहले मात्र नौ करोड़, 80 लाख किसान ही बचे थे. इसीलिए खेतिहर मजदूरों की तादाद देश में बढ़ रही है. इस प्रकार मोदी सरकार के सामने नए युवाओं के साथ ही साथ अपने पुश्तैनी धंधों से तौबा कर रहे किसान, लुहार, बढ़ई, जुलाहे, चर्मकार, सफाईकर्मियों को वैकल्पिक नौकरी के मौके देना भी बड़ी चुनौती है.

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