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Budget 2019: बीमा सेक्टर को चाहिए पॉजिटिव टैक्स लाभ और नियामकीय व्यवस्था

स्वास्थ्य बीमा उद्योग में तकनीकी विकास को अपनाने के साथ बीमा कंपनियां प्रोडक्ट्स तैयार करने के लिए विनियमन व्यवस्था की भी मांग कर रही हैं

Updated On: Jan 31, 2019 05:37 PM IST

Yashish Dahiya Yashish Dahiya
सहसंस्थापक और सीईओ-PolicyBazaar.com‎

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Budget 2019: बीमा सेक्टर को चाहिए पॉजिटिव टैक्स लाभ और नियामकीय व्यवस्था

अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल वार्षिक आम बजट पेश करेंगे जो कि आम चुनाव 2019 से पहले एक अंतरिम बजट होने वाला है. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के पास रेलवे एवं कोयला मंत्रालय का भी प्रभार है. उन्हें अरुण जेटली की जगह पर वित्त मंत्री नियुक्त किया गया है क्योंकि जेटली फिलहाल सर्जरी के लिए अमेरिका में हैं. इस साल का बजट काफी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यह मौजूदा सरकार का अंतिम बजट होगा. यह बजट लोकसभा चुनावों के ठीक पहले प्रस्तुत किया जाना है और सत्ता में मौजूद सरकार जनता का भरोसा जीतने के लिए उन्हें अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने की कोशिश करेगी.

मौजूदा स्थितियों में 50 से ज्यादा कंपनियों वाले देश के बीमा उद्योग को वित्त मंत्री से कुछ बड़ी घोषणाओं की उम्मीद है. बीमा कंपनियों को आशा है कि आगामी बजट घोषणाओं में ग्राहक हितों पर जोर दिया जाएगा और उन्हें अधिक से अधिक फायदा पहुंचाया जाएगा. बीमा उद्योग के विशेषज्ञों का यह मानना है कि इस वर्ष का बजट भाषण एक साधारण बजट प्रस्तुत करने की परंपरा से हटकर होगा और सभी जरूरी क्षेत्रों को अधिकतम सहायता प्रदान करने पर केंद्रित होगा. वित्त वर्ष 2018-2019 में केंद्र की एनडीए सरकार ने आम जनता के पक्ष में कई प्रमुख फैसले लिए हैं. जैसे स्वास्थ्य बीमा में मानसिक बीमारियों का समावेश, मोटर इंश्योरेंस के नियमों में बदलाव और 3 सार्वजनिक गैर-जीवन बीमा कंपनियों का विलय. इस बार बजट में बीमा उद्योग को कुछ सकारात्मक टैक्स लाभ मिलने की उम्मीद है और साथ ही नियामकीय व्यवस्था बनाए जाने की भी अपेक्षा है.

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मोटर एवं यात्रा बीमा उद्योग

अच्छी बात यह है कि भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के जरिए हाल ही में दिए गए एक संकेत के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 से दो-पहिया और चार-पहिया गाड़ियों के लिए बीमा प्रीमियम कम हो सकते हैं. आईआरडीएआई मोटर वाहनों के लिए थर्ड पार्टी (TP) इंश्योरेंस के वार्षिक प्रीमियम फिक्स करने की नियमित प्रक्रिया भी बंद कर सकती है. अन्य बीमा क्षेत्रों की तरह मोटर और यात्रा बीमा उद्योग भी यह चाहता है कि बीमा कंपनियों के जरिए बेचे जाने वाले बीमा उत्पादों पर जीएसटी में छूट दी जाए. ऐसा करने से अधिक लोगों को पर्याप्त बीमा कवर लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा.

जीवन बीमा उद्योग

जीवन बीमा उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जीवन बीमा के असली उद्देश्य के प्रति लोगों में पर्याप्त जागरूकता नहीं है. एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि 133 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में जीवन बीमा उत्पादों की पहुंच जीडीपी के 3 फीसदी से भी कम है. इसके अलावा टर्म इंश्योरेंस से प्राप्त होने वाला प्रीमियम तो संपूर्ण जीवन बीमा उद्योग से प्राप्त होने वाले कुल प्रीमियम का 1 प्रतिशत से भी कम है. आगामी बजट में जीवन बीमा कंपनियां नियामकीय प्रणाली में कुछ बदलाव किए जाने की मांग कर रही हैं. यह बदलाव जीवन बीमा सेक्टर के तत्काल विकास में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

बीमा कंपनियों की पहली मांग यह है कि आयकर अधिनियम के अंतर्गत (80सी के अतिरिक्त) एक अलग सेक्शन बनाना जरूरी है. जो कि प्योर लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों के लिए चुकाए गए प्रीमियम पर लोगों को टैक्स राहत प्रदान करे. दूसरी मांग यह है कि प्योर प्रोटेक्शन प्लान्स, जिसमें टर्म लाइफ और हेल्थ पॉलिसियां शामिल हैं. इनके लिए जीएसटी में छूट दी जानी चाहिए. अधिकतर बीमा कंपनियों का यह मानना है कि ऐसे प्रोटेक्शन प्लान्स (टर्म लाइफ एवं हेल्थ) के लिए जीएसटी माफ करते हुए उन्हें बढ़ावा देना सरकार के हित में ही होगा. ऐसा करने से अधिक से अधिक लोग अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए प्रोटेक्शन प्लान खरीदना पसंद करेंगे.

अंतरिम बजट में यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान्स- लंबी अवधि के निवेश-सह-बीमा उत्पादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण बदलाव की उम्मीद जा रही है. सरकार से यह उम्मीद की जा रही है कि यूलिप्स उत्पादों की मौजूदा लॉक-इन अवधि 5 साल से घटाकर 3 साल (ईएलएसएस के समान) की जाए और इन पर लगाए जाने वाले जीएसटी से भी छूट प्रदान की जाए, जो कि अभी 18% है. ऐसी उम्मीद है कि यह सभी नियम जीवन बीमा क्षेत्र में तत्काल विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाएंगे.

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स्वास्थ्य बीमा उद्योग

बीमा उद्योग के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा उद्योग सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है. जहां इस वर्ष के बजट में ध्यान देने की सख्त जरूरत है क्योंकि वर्तमान में भारत में स्वास्थ्य सेवाएं की उपलब्धता सबसे चिंताजनक मुद्दों में से एक बनी हुई है. हालांकि कई नीति निर्माताओं का यह मानना है कि अच्छा स्वास्थ्य सभी लोगों के जरूरी बुनियादी अधिकारों से एक है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह पॉलिसी स्तर पर केवल एक सैद्धांतिक विचार बना हुआ है. पिछले कुछ सालों में प्रीमियम ग्रोथ रेट 30 फीसदी तक बढ़ी है, लेकिन आम उपभोक्ता अब भी स्वास्थ्य बीमा के फायदों से पूरी तरह अवगत नहीं हैं. बीमा कंपनियों के मुताबिक अगर सेक्शन 80डी के तहत मिलने वाली टैक्स छूट 25000 रुपए से बढ़कर 150000 रुपए हो जाए तो स्वास्थ्य बीमा उद्योग के लिए काफी अच्छा कदम होगा. बीमा कंपनियां ये भी चाहती हैं कि इस वर्ष के बजट में स्वास्थ्य बीमा पर 18 फीसदी की दर से लगने वाला जीएसटी चार्ज भी खत्म कर देना चाहिए.

कुछ बीमा कंपनियों की यह भी मांग है कि जिस तरह मोटर इंश्योरेंस एक्ट के तहत वाहन बीमा अनिवार्य है. वैसे ही स्वास्थ्य बीमा को भी अनिवार्य बनाया जाए. इस मांग के पीछे यह कारण है कि स्वास्थ्य बीमा उद्योग में लगातार उदारीकरण के बावजूद देश की 20 फीसदी से भी कम आबादी के पास ही स्वास्थ्य बीमा है. अंतरिम बजट से स्वास्थ्य बीमा उद्योग को एक अन्य बड़ी उम्मीद यह भी है कि उपभोक्ताओं को 5 सालों तक लेवल प्रीमियम (एक समान प्रीमियम) चुकाने की सुविधा दी जाए और इसके लिए जीवन बीमा की तरह मासिक, त्रैमासिक, अर्ध वार्षिक और सीमित अवधि तक भुगतान करने जैसे विभिन्न भुगतान विकल्प भी दिये जाएं. ऐसा होने पर ग्राहकों के लिए प्रीमियम भुगतान प्रक्रिया आसान बनेगी.

स्वास्थ्य बीमा उद्योग में तकनीकी विकास को अपनाने के साथ बीमा कंपनियां प्रोडक्ट्स तैयार करने के लिए विनियमन व्यवस्था की भी मांग कर रही हैं ताकि आधुनिक विचारों को बढ़ावा मिल सके. इसमें वियरेबल डिवाइसेस से जुड़े बीमा उत्पाद शामिल होंगे जो कि जनसांखिकीय और खरीद व्यवहार के हिसाब से संचालित होंगे.

(लेखक पॉलिसी बाजार के को-फाउंडर और सीईओ हैं)

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