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बजट 2018-19: टर्म इंश्योरेंस को अनिवार्य करने की मांग क्या पूरी होगी?

बीमा कंपनियों ने 2014 में ही यह मांग की थी कि सभी वेतनधारियों के लिए टर्म इंश्योरेंस लेना अनिवार्य किया जाए

FP Staff Updated On: Jan 14, 2018 03:17 PM IST

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बजट 2018-19: टर्म इंश्योरेंस को अनिवार्य करने की मांग क्या पूरी होगी?

2014 के यूनियन बजट के समय जीवन बीमा निगम कंपनियों ने मांग की थी कि सभी वेतनधारियों के लिए टर्म इंश्योरेंस को जरूरी कर दिया जाए. कंपनियों ने कहा कि इसे 1988 के मोटर व्हेकिल ऐक्ट, 1988 में थर्ड पार्टी की तरह ही अनिवार्य किया जाए. लेकिन उस साल के बजट में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं किया गया.

बीमा भारत में अभी भी एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे अभी तक बढ़ावा देने की जरूरत बनी हुई है. अभी भी अधिकतर कस्टमर्स उन प्रोडक्ट्स में पैसा लगाना पसंद करते हैं जिसमें पॉलिसी खत्म होने पर अधिक रिटर्न मिलने की संभावना हो या कुछ बोनस मिले. हालांकि कस्टमर्स को यह पता नहीं होता कि ऐसे प्रोडक्ट्स में टर्म इंश्योरेंस की तुलना काफी कम सुरक्षा मिलती है.

इंश्योरेंस कवरेज में भारी गैप

वैश्विक बीमा कंपनी स्विस री के मुताबिक भारत में पूर्ण सुरक्षा वाली इंश्योरेंस कवरेज में भारी गैप है. स्विस री के अनुसार भारत में 2014 में जीवन बीमा इंश्योरेंस में यह गैप 8,555 डॉलर थी. इस स्टडी के मुताबिक भारत में प्रत्येक वेतनधारी व्यक्ति और उनपर निर्भर व्यक्तियों के ऊपर कुल बीमा राशि का अनुपात 2101 डॉलर (लगभग 1.3 लाख रुपए) था. जबकि ऑस्ट्रेलिया में यह अनुपात 303,401 डॉलर था.

यह अनुमान लगाया गया है कि जीवन बीमा उद्योग के पोर्टफोलियो में प्रोटेक्शन का हिस्सा 20 फीसदी से भी कम है. हालांकि पिछले 2 सालों में इसमें बढ़ोतरी हुई है.

स्विस री सिग्मा की रिपोर्ट के अनुसार जीवन बीमा का भारत के जीडीपी में कुल हिस्सेदारी 2.7% ही है और सभी प्रकार के बीमाओं की हिस्सेदारी 3.44% है. जबकि वैश्विक स्तर पर यह अनुपात 6.23 फीसदी है. जबकि प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा की वजह से बीमा का निचले स्तर तक विस्तार हुआ है.

इसके तहत 330 रुपए प्रीमियम है और रिन्युल की दर अभी तय नहीं हुई है. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जीवन बीमा को अनिवार्य किया जाना चाहिए या इस पर भारी छूट दी जानी चाहिए. यह बीमाधारकों और बीमा कंपनियों दोनों के हित में होगा.

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