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बजट 2018: जनता और सरकार, दोनों की जेब भरना बड़ी चुनौती

सरकार के लिए फिस्कल घाटा सीमित रखते हुए जनता को खुश करना मुश्किल है

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: Jan 22, 2018 08:31 AM IST

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बजट 2018: जनता और सरकार, दोनों की जेब भरना बड़ी चुनौती

आगामी बजट लोकसभा चुनाव 2019 के पहले मोदी सरकार का आखिरी पूरा बजट होगा. लोकसभा चुनावों से पहले 2018 में आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. इनमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं. कर्नाटक को छोड़ बाकी तीन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं.

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इनमें से किसी राज्य में बीजेपी हारना नहीं चाहेगी. इसलिए आमजनों को नाराज करने का खतरा मोदी सरकार मोल नहीं लेना चाहेगी. जाहिर है कि आगामी बजट में जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए वित्त मंत्री को अपेक्षाकृत अधिक फंड की आवश्यकता होगी. वित्त मंत्री को विशेषकर किसानों, ग्रामीणों और युवाओं में व्याप्त असंतोष और आक्रोश को दूर करने के उपाय बजट में करने होंगे, जिसका साफ संकेत खुद वित्त मंत्री दे चुके हैं.

पर वित्त मंत्री की यह कवायद तब ही ज्यादा कारगर होगी, जब वे अरसे से कुंद जीडीपी ग्रोथ दर (आर्थिक विकास दर), सुस्त निवेश और रोजगार को पटरी पर ले आयें. इन सब राजनीतिक और आर्थिक जरूरतों को साधने के लिए वित्त मंत्री को पहले से अधिक फंड जुटाने की पहल करनी होगी. क्या वित्त मंत्री राजस्व और पूंजी प्राप्तियों के सहारे बजट में सबको साध पाएंगे या वे फिस्कल घाटा (राजकोषीय घाटा) बढ़ाने के विकल्प का सहारा लेंगे.

धीमी पड़ी है जीडीपी ग्रोथ दर 

उदारीकरण के मौजूदा दौर में जीडीपी ग्रोथ दर से ही बाजारों की चमक-धमक तय होती है. ज्यादा जीडीपी ग्रोथ से रोजगार बढ़ते हैं. आमदनी बढ़ती है. उपभोग बढ़ता है. मांग बढ़ती है. निवेश बढ़ता है और इन सबसे जीडीपी ग्रोथ बढ़ती है.

पर लगता है कि अब जीडीपी ग्रोथ को ग्रहण से लग गया है. दिसंबर तिमाही छोड़ दें, तो जनवरी ‘16 से सितंबर ‘17 तक लगातार सात तिमाहियों में जीडीपी ग्रोथ दर गिरी है. सामान्य धारणा है कि नवंबर ‘16 की नोटबंदी और जुलाई ‘2017 में  जीएसटी लागू होने से जीडीपी ग्रोथ दर में गिरावट आई है.

Source: Getty Images

तीन तिमाहियों में जीडीपी ग्रोथ दर में गिरावट आने के लिए फौरी तौर से इन दोनों कारणों को जिम्मेदार माना जा सकता है लेकिन, सात तिमाहियों के लिए नहीं. असल में जीडीपी ग्रोथ दर में गिरावट पिछले सात सालों से दिखाई दे रही है. 2008-09 को छोड़ कर 2003-2004 से 2010-2011 के दरमियान औसत  जीडीपी ग्रोथ दर 9 फीसदी रही है. यह 2011-12 से 2013-14 के बीच औसत 5.4 फीसदी रही. 2014-15 से 2016-17 में यह बढ़कर औसत 7.5 फीसदी हो गयी. लेकिन वित्त वर्ष 2017-18 में यह दर गिर कर 6.5 फीसदी रह जाने का अनुमान है.

जाहिर है कि जीडीपी ग्रोथ दर बढ़ने की अड़चनें कुछ ज्यादा गहरी हैं. जीडीपी ग्रोथ दर बढ़ाने में उपभोग, निर्यात और निवेश की भूमिका अहम होती है. उपभोग सरकारी हो या निजी, दोनों ही जीडीपी ग्रोथ को प्रभावित करते हैं. चालू वित्त वर्ष में उपभोग स्तर कम रहने का अनुमान है. इसलिए उपभोग स्तर बढ़ने से जीडीपी ग्रोथ दर में पर्याप्त उछाल आने की उम्मीद करना बेकार है.

एक्सपोर्ट को लगी नज़र

आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने में व्यापारिक निर्यात की भूमिका को नकारना मुश्किल है. पर जीडीपी के अनुपात में व्यापारिक निर्यात लगातार कम हो रहे हैं. 2011-12 से 2013-14 के दरमियान जीडीपी और व्यापारिक निर्यात का अनुपात 16-17 फीसदी था. यह 2014-15 में  15.2 फीसदी और 2016-17 में गिरकर 12.2 फीसदी  रह गया. 2017-18 में यह अनुपात 12 फीसदी से नीचे रहने का अनुमान है.

निर्यातों का बढ़ना घरेलू कारकों से ज्यादा वैश्विक कारकों पर ज्यादा निर्भर होता है, जो किसी देश के हाथ में नहीं होते हैं. पर दुखद यह है कि पिछले दिनों वैश्विक ग्रोथ और मांग बढ़ने के बावजूद भी देश के निर्यातों में कुछ विशेष सुधार नहीं हुआ.

जीडीपी में व्यापारिक निर्यात की हिस्सेदारी न बढ़ने का सीधा असर देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर देखा जा सकता है. सालों से कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश खोल देने के बावजूद जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 90 के दशक से लगभग स्थिर सी है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का कहना सही है कि अच्छे क्वालिटी रोजगार की आवश्यकता है जो संगठित क्षेत्र, निर्यात, पर्यटन आदि क्षेत्रों से ही आ सकते हैं.

निवेश में भी गिरावट

हर साल बजट में पढ़ने को मिलता है कि इतने लाख करोड़ का नया निवेश होगा. पर हकीकत में जीडीपी के अनुपात में निवेश 2011-12 से लगातार गिर रहा है. 2011-12 में जीडीपी- निवेश अनुपात 31.8 फीसदी था. यह 2016-17 में गिर कर 27.1 फीसदी रह गया. 2017-18 में  इसके 26.4 फीसदी रह जाने का अनुमान है.

मोदी सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी निवेश अनुपात नहीं बढ़ पा रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी राज में इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश काफी बढ़ा है. 10 फीसदी की जीडीपी ग्रोथ रेट पाने के लिए साल दर साल सरकारी निवेश में मोदी सरकार ने बढ़ोतरी की है. इसी वित्त वर्ष में तकरीबन इस मद में लगभग एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा आवंटन बढ़ाया गया, लेकिन फिर भी जीडीपी ग्रोथ रेट बमुश्किल इस वित्त वर्ष में 6.5 फीसदी रह पाएगी.

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10 फीसदी विकास दर तो अभी मोदी सरकार के लिए दूर का सपना है, जिसका वायदा 2014 में किया गया था. निजी निवेश भी लगातार कमजोर बना हुआ है. परियोजनाओं के वित्त-पोषण में बैंकों का फाइनेंस करना महंगा साबित हुआ है. सरकारी बैंकों के कुल एनपीए में परियोजनाओं के फाइनेंस की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. इसलिए परियोजना- निवेश को बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता है.

सरकार और आम जनता की जेब एकसाथ कैसे भरेगी

केंद्र सरकार को जीडीपी ग्रोथ रेट बढ़ाने के लिए निवेश के साथ उपभोग और रोजगार वृद्धि करने की आवश्यकता है. लेकिन यह तभी हो सकता है कि जब वित्त मंत्री फिस्कल घाटे को लेकर अपने हठ को छोड़ दें. असल में अतंर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के भारी दबाव और अधिकाधिक विदेशी निवेश के लालच में वित्त मंत्री और उनके सलाहकारों ने फिस्कल घाटे के सुदृढीकरण को निवेश, रोजगार, आय से बड़ा लक्ष्य बना लिया है.

तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में फिस्कल घाटा जीडीपी का 3 फीसदी होना चाहिए. इसके हिसाब से चालू कीमतों पर 12 फीसदी जीडीपी ग्रोथ (इसमें मुद्रास्फीति शामिल हैं) से केंद्र सरकार 2018-19 में फिस्कल घाटा 5.58 लाख करोड़ रुपए रख सकती है जो वित्त वर्ष 2017-18 के बजट अनुमान से महज 12 हजार करोड़ रुपए ज्यादा है.

चालू वित्त वर्ष में राजस्व सग्रंह पर भारी दबाव है. इसमें बहुत ज्यादा उछाल की उम्मीद करना अपने को धोखा देना है. पर यदि फिस्कल घाटे के लक्ष्य में सरकार ढील दे देती है, तो उसे निवेश बढ़ाने के लिए, जीडीपी ग्रोथ रेट तेज करने व रोजगार बढ़ाने के लिए बड़ी रकम हाथ लग सकती है.

यदि सरकार फिस्कल घाटे को जीडीपी का 3.5 फीसदी निर्धारित करती है तो फिस्कल घाटे से 6 लाख 33 हजार करोड़ रुपए सरकार को मिल  सकते हैं. सरकार राजस्व घाटे (रेवेन्यू डेफिशिट) को कम कर इस बड़ी राशि का बड़ा हिस्सा उत्पादक कार्यों में लगा सकती है.

बजट में गणितीय कारीगरी से सरकार अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट को दूर नहीं कर पाएगी. इसलिए अर्थव्यवस्था को मंद जीडीपी ग्रोथ, सुस्त निवेश और कम होते रोजगार से उबरना है, तो सरकारी घाटे का साथ सरकार को चाहिए. अन्यथा लोकसभा चुनाव और बड़े राज्यों के विधानसभा चुनावों में मोदी सरकार और बीजेपी की राजनीतिक मुसीबतें बढ़ सकती हैं.

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