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बजट 2018: जेटली के 5 आइडिया को खारिज करना मुश्किल है!

इन विचारों को अमल में लाने और परिवर्तन की गति तेज या धीमे होने का सीधा संबंध राजनीतिक व्यवस्था से हैं. लेकिन देर-सवेर इन विचारों की गति अपनी निर्धारित दिशा में होगी. लिहाजा इस साल के सालाना बजट का यही विशेष योगदान कहा जाएगा

Updated On: Feb 04, 2018 05:10 PM IST

Rajan Katoch

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बजट 2018: जेटली के 5 आइडिया को खारिज करना मुश्किल है!

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को सालाना बजट का ऐलान करते हुए कुछ अहम और दिलचस्प आर्थिक विचारों को पेश किया. मैं उन्हें अभी विचार ही कहूंगा, क्योंकि इनमें से कुछ को बजट में प्रस्तावों के तौर पर पेश किया गया. इन विचारों ने अभी तक कार्यक्रमों या योजनाओं का रूप नहीं लिया है. और न ही इन प्रस्तावों के तत्काल विकास के लिए फंड (धनराशि) मुहैया कराया गया है.

हालांकि, वित्त मंत्री के ये विचार खासे दिलचस्प हैं और नया नजरिया रखते हैं. सबसे अहम बात यह है कि इन सभी विचारों में काफी संभावनाएं निहित हैं. आइए, उन पांच अहम विचारों पर एक नजर डालते हैं.

किसानों के नाम...

सबसे पहले, सरकार ने खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) किसानों की उत्पादन लागत का डेढ़ गुना करने की बात कही है. सरकार की पहल को इस बात से जोड़कर देखना होगा कि किसानों के कृषि उत्पादन का बाजार मूल्य अगर एमएसपी से कम होता है, तब उन हालात में या तो 'सरकार खुद एमएसपी पर किसानों की फसल खरीदेगी या किसी अन्य तरीके से किसानों को एमएसपी मुहैया कराने की कोशिश करेगी.'

खरीफ की एमएसपी लागत का डेढ़ गुना करने की व्यवस्था अभी तक तैयार नहीं हो पाई है. फिलहाल नीति आयोग इसके लिए एक तंत्र विकसित करने में लगा है. इस योजना पर कितनी लागत आएगी अभी इसका भी अनुमान नहीं लगाया गया है. वैसे इस पर काम हो रहा है.

केंद्र का यह विचार मध्य प्रदेश सरकार की 'भावांतर भुगतान योजना' से प्रेरित नजर आ रहा है. दरअसल भावांतर भुगतान योजना के तहत मध्य प्रदेश प्रशासन किसानों की फसलों के उचित मूल्य के लिए वचनबद्ध है. मंडियों में किसानों को प्राप्त फसलों के वास्तविक बाजार मूल्य और एमएसपी में जो अंतर होता है, प्रशासन द्वारा किसानों को उसका पुनर्भुगतान किया जाता है. हालांकि निर्णायक समिति (जूरी) को अभी तक इस योजना में पूरी तरह से सफलता नहीं मिल पाई है.

सरकार का साहसिक कदम

सरकारी खरीद के जरिए फसलों के समर्थन मूल्य को बढ़ाने की पुरानी परंपरा के विपरीत यह एक साहसिक कदम है. सरकार द्वारा फसलों का एमएसपी उपलब्ध कराना और किसानों के उत्पाद की सरकारी खरीद दो अलग-अलग बातें हैं.

किसानों के उत्पादों की सार्वजनिक खरीद न करके सरकार कई मामलों से बच जाती है. जैसे भंडारण और ऐसी उपजों की बिक्री इत्यादि. लेकिन अभी यह प्रस्ताव महज एक विचार भर है, जिसको अमली जामा पहनाए जाने की जरूरत है.

सबको बीमा का शानदार तोहफा

दूसरा विचार नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम का है. सरकार ने अपनी इस योजना को मीडिया में खूब उछाला है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना (नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम) में 10 करोड़ परिवारों को चिकित्सा खर्च उपलब्ध कराने की बात कही गई है. इसके तहत प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपए तक की चिकित्सा खर्च की सुविधा दी जाएगी.

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शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य कई प्रस्तावों की तरह यह विचार भी मानव विकास के लिए महत्वपूर्ण है. सरकार का यह विचार उन रिसर्च के नतीजों पर आधारित, जिनसे यह पता चलता है कि चिकित्सा खर्चों से गरीबों पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. लिहाजा सरकार गरीबों की इस समस्या के निदान के लिए गंभीरता के साथ कोशिश कर रही है.

यह बात वाकई खासी दिलचस्प है, क्योंकि संसद में अपने बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खुद यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का उल्लेख किया था. वित्त मंत्री शायद यह सुझाव दे रहे थे कि, उनकी संभावित योजना के जरिए ही यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है.

लेकिन मैं एक बार फिर से कहूंगा कि यह योजना भी अभी पूरी तरह से तैयार नहीं की गई है और न ही इसे फंड मुहैया कराया गया है. लेकिन सरकार अपनी इस योजना पर मजबूती के साथ काम कर रही है. सरकार ऐसा प्रस्ताव तैयार कर रही है, जिसे अनिवार्य रूप से लागू किया जा सके और जिसे खारिज करना संभव न हो. ताकि, सरकार बदलने यानी राजनीतिक व्यवस्था में किसी तरह के परिवर्तन की स्थिति में भी यह योजना लागू हो सके.

छोटी कंपनियों को राहत

तीसरा विचार कारोबारी कंपनियों के टर्न ओवर और टैक्स लिमिट को लेकर है. सरकार ने छोटी कारोबारी कंपनियों को टैक्स में खासी छूट दी है. 50 करोड़ रुपए के बजाए अब 250 करोड़ रुपए तक का टर्नओवर करने वाली कंपनियों को 25 फीसदी की दर से ही कॉरपोरेट  टैक्स देना होगा.

वित्त मंत्री जेटली का दावा है कि ऐसा करने से रिटर्न दाखिल करने वाली 99 फीसदी कंपनियों को कवर किया जा सकता है. वैसे कॉर्पोरेट टैक्स की दर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी करके सरकार ने अपना एक वादा तो पूरा किया ही है. सरकार को सबसे ज्यादा टैक्स चुकाने वाली देश की 1 फीसदी बड़ी कंपनियां बजट से पहले ऐसी ही उम्मीद कर रही थीं.

मुझे लगता है कि यह एक दिलचस्प विचार है, क्योंकि इस मामले में नीति निर्धारित हो चुकी है. लिहाजा भविष्य के वर्षों में हम उम्मीद कर सकते हैं कि कॉर्पोरेट टैक्स की यह सीमा और भी बढ़ सकती है. लेकिन राजनीतिक शक्तियों को आकर्षित किए बिना इससे ज्यादा कंपनियां लाभान्वित नहीं हो रही हैं.

यह भी एक अच्छा विचार है, क्योंकि कंपनियों के टर्न ओवर और टैक्स की सीमा बढ़ाने से सरकार ने छोटे और मध्यम उद्यमियों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया है. क्योंकि अक्सर ऐसा देखा गया है कि टैक्स सीमा में छूट का लाभ लेने के लिए छोटे और मध्यम उद्यमी अपनी कंपनी को विस्तार देने से कतराते रहे हैं. लेकिन उम्मीद है कि अब छोटे और मध्यम उद्यमी भी आगे बढ़ने की हिम्मत दिखाएंगे.

इस विचार को लगेगा वक्त?

चौथा और पांचवां विचार शायद अभी पूरी तरह से परिपक्व नहीं हैं. फिलहाल इनका महज उल्लेख ही किया गया है, लेकिन वास्तव में वे ध्यान देने योग्य विचार हैं. दरअसल सरकार ने वास्तुकला (आर्किटेक्ट) के 20 स्कूलों का जिक्र किया है, जिन्हें 'चैलेंज मोड' में स्थापित किया जाएगा.

संभवतः, यह अभी अस्पष्ट संदर्भ ही कहलाएगा कि यह परियोजना 'स्विस चैलेंज' पद्धति से प्रेरित होगी. जिसके तहत किसी इच्छुक पार्टी के किसी भी प्रस्ताव को एक परियोजना प्रस्ताव और एक बोली (नीलामी) के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, और फिर इसे ओपन चैलेंज (खुली चुनौती) के तौर पर या इसमें रुचि रखने वाली अन्य किसी पार्टी के सम्मुख रखा जा सकता है.

'चैलेंज मोड' पद्धति का इस्तेमाल कुछ राज्यों द्वारा सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत बुनियादी ढांचों के निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं में किया जा चुका है. हाल ही में रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास के लिए भारतीय रेलवे ने भी इस पद्धति का इस्तेमाल किया है.

मेरे नजरिए से, यह एक स्वभाविक और सेहतमंद विचार नहीं है. इसमें सरकार से दूरी और दुराव की झलक मिलती है. बजट भाषण में भी इसके बारे में ऐसे ही संकेत मिले हैं. बड़े प्रोजेक्ट के कॉन्ट्रैक्ट्स को डिफॉल्ट रूप से स्थापित प्रतियोगी नीलामी प्रक्रियाओं को ही अपनाना चाहिए.

स्विस चैलेंज पद्धति में हमेशा मूल प्रस्तावक को अनुचित लाभ मिलने का संदेह बना रहता है. नए स्कूलों की स्थापना की घोषणा में अनुबंध प्रक्रिया के उल्लेख की वजह दमदार नहीं है. हम इसके बारे में इतना भर कह सकते हैं कि यह विचार काफी दिलचस्प जरूर है.

क्या होगा क्रिप्टो करेंसी का हाल?

पांचवां विचार क्रिप्टो-करेंसी और ब्लॉक चेन टेक्नॉलजी को लेकर है. क्रिप्टो-करेंसी देश में वैध नहीं है, लेकिन इसमें अंतर्निहित तकनीक को अबतक एक साथ खारिज नहीं किया गया है.

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ब्लॉक चेन या डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नॉलजी में काफी आकर्षक एप्लीकेशंस हैं. खासकर वित्तीय सेवा उद्योग (फाइनेंस सर्विसेज इंडस्ट्री) में लोगों को खासी संभावनाएं नजर आती हैं. ब्लॉक चेन में संभावनाएं होना और ब्लॉक चेन टेक्नॉलजी के प्रयोग की लगातार सतर्क इच्छा रखना अच्छी बात है.

हालांकि इस स्तर पर, इसे सार्वजनिक तौर पर व्यक्त किए गए एक विचार से ज्यादा और कुछ नहीं माना जा सकता है. यह पूर्वलक्षण है कि भविष्य में सरकार इसका उपयोग करेगी, लिहाजा इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

हम उम्मीद करते हैं कि सरकार अपने इन विचारों को आगे और विकसित करेगी. ताकि आने वाले वर्षों में इनसे संबंधित क्षेत्रों में कामकाज के तौर-तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सके.

इन विचारों को अमल में लाने और परिवर्तन की गति तेज या धीमे होने का सीधा संबंध राजनीतिक व्यवस्था से हैं. लेकिन देर-सवेर इन विचारों की गति अपनी निर्धारित दिशा में होगी. लिहाजा इस साल के सालाना बजट का यही विशेष योगदान कहा जाएगा.

(लेखक एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं)

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