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BSE का बर्थडे: 1857 के स्वाधीनता संग्राम से भी पुराना है शेयर बाजार का इतिहास

बीएसई को पक्की जगह मिलने से पहले शेयर ब्रोकर्स बरगद के पेड़ के नीचे बैठक करते थे, ब्रोकर्स की संख्या बढ़ने के बाद उन्होंने अपने लिए पक्की जगह चुनी जो आज दलाल स्ट्रीट कहलाता है

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jul 09, 2018 07:18 AM IST

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BSE का बर्थडे: 1857 के स्वाधीनता संग्राम से भी पुराना है शेयर बाजार का इतिहास

शेयर बाजार में दिलचस्पी लेने वाले लोगों के लिए बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई का नाम कोई नया नहीं है. लेकिन क्या आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में पहली बार स्टॉक ट्रेडिंग कब शुरू हुई थी. आजादी के बाद! जी नहीं, 1857 में जब पहली बार अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका गया था उससे भी पहले से शेयरों में लेनदेन हो रहा है.

संतोष नायर की किताब 'बुल्स, बीयर्स एंड अदर बीस्ट्स' के मुताबिक, शेयरों में लेनदेन 1840 की शुरुआत से ही होने लग गया था. वैसे यह अलग बात है कि उस वक्त सिर्फ आधा दर्जन लोग ही इस कारोबार में थे. आज के हिसाब से देखें तो ये लोग ही पेशेवर ब्रोकर थे. औपचारिक तौर पर शेयर का धंधा 1875 में शुरू हुआ.

आज जिस बीएसई के जरिए हम शेयरों की खरीद-फरोख्त करते हैं उसकी शुरुआत 143 साल पहले प्रेमचंद रायचंद ने की थी. कपास के बिजनेस में रायचंद को कॉटन किंग माना जाता था. 1831 में पैदा हुए रायचंद 21 साल में सूरत से मुंबई आए और शेयर ब्रोकरेज का काम शुरू किया. उस वक्त शेयर ब्रोकर कपास में कारोबार करते थे. इन ब्रोकर्स के साथ जुड़कर रायचंद जल्द ही कपास के मार्केट में जाने-पहचाने नाम बन गए.

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1862 तक कपास की दुनिया में रायचंद की पकड़ इतनी मजबूत हो गई थी कि वह अकेले भी इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव लाने का दमखम रखते थे. उस वक्त के कई बैंकिंग स्टॉक्स मसलन द कमर्शियल, द मर्केंटाइल और एशियाटिक बैंकिंग कॉरपोरेशन (ABC)के बुल माने जाते थे. एबीसी की स्थापना 1863 में हुई थी. उस वक्त एबीसी के शेयर 65 फीसदी प्रीमियम पर चल रहे थे लेकिन दो साल बाद मार्केट क्रैश होने के बाद यह तेजी नहीं रही. 1861 से 1865 के बीच कपास में जबरदस्त फायदा हुआ. इसकी एक वजह अमेरिका का गृह युद्ध रहा. गृह युद्ध की वजह से अमेरिका से यूरोप को कपास की सप्लाई बंद हो गई. इसका फायदा भारतीय कारोबारियों को हुआ.

कैसे बना आज का बीएसई?

बीएसई की स्थापना होने के बाद 1850 में स्टॉक ब्रोकरों की पहली बैठक किसी बंद कमरे में नहीं बल्कि एक बरगद के पेड़ के नीचे आयोजित की गई. बरगद का यह पेड़ मुंबई में टाउन हॉल के सामने था जहां अब हॉर्निमन सर्कल मौजूद है. एक दशक बाद बैठक की जगह बदल गई. नई जगह भी बरगद के पेड़ की छाया ही रही. मीडॉज स्ट्रीट के पास एक बरगद के पेड़ के नीचे अब बैठक होने लगी थी. इस स्ट्रीट को अब महात्मा गांधी रोड के नाम से जाना जाता है.

जैसे-जैसे ब्रोकरों की संख्या बढ़ती रही वे बैठक के लिए एक जगह से दूसरी जगह खोजने लगें. लेकिन ब्रोकर बढ़ने की वजह से हर जगह दिक्कत होती थी. आखिरकार 1874 में ब्रोकर्स ने एक स्थायी जगह ढ़ूंढ ली जो उनकी अपनी जगह थी. इसे ही दलाल स्ट्रीट कहते हैं जहां आज का बीएसई है. 1875 में ब्रोकर्स ने अपने संगठन का नाम 'द नैटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन' रखा. बीएसई एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है.

31 अगस्त 1957 को भारत सरकार के सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स रेगुलेशन एक्ट के तहत बीएसई को आधिकारिक तौर पर पहले स्टॉक एक्सचेंज की मान्यता मिली. 1980 में बीएसई का कामकाज दलाल स्ट्रीट के फिरोज जीजीभाई टावर से होने लगा. 1986 में बीएसई ने एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स इंडेक्स की शुरुआत की. 2000 में बीएसई ने डेरिवेटिव मार्केट, एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स शुरू किया. 1995 से बीएसई में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग हो रही है. बीएसई ने 30 दिसंबर 2016 को इंडिया INX की शुरुआत की. यह देश का पहला इंटरनेशनल एक्सचेंज है. अपने 143 साल के सफर में बीएसई ने कई लोगों को रंक से राजा और राजा से रंक बनाया.

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