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बैंक घोटाला पार्ट-1: पीएनबी घोटाला छोड़िए, पूरी भारतीय बैंकिग व्यवस्था सड़ चुकी है

पीएनबी मामले को देखते हुए अब ये समय आ गया है कि सरकार पब्लिक सेक्टर के बैंकों के निजीकरण के मामले में गंभीरता से सोचे

Updated On: Feb 21, 2018 07:09 PM IST

Dinesh Unnikrishnan

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बैंक घोटाला पार्ट-1: पीएनबी घोटाला छोड़िए, पूरी भारतीय बैंकिग व्यवस्था सड़ चुकी है

पंजाब नेशनल बैंक का मुंबई स्थित ब्रैडी हाउस ब्रांच आज भी अपनी ब्रिटिशकालीन विरासत को समेटे शान से खड़ा है. दशकों से यह ब्रांच पीएनबी और पीएनबी के कस्टमर्स के लिए गौरव का प्रतीक बना हुआ है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और आरबीआई हेडक्वार्टर से महज कुछ ही दूरी पर मौजूद पीएनबी का यह ब्रांच भारतीय जांच एजेंसियों की आंखों की किरकिरी बना हुआ है.

देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक की इसी शाखा से 11 हजार करोड़ से ज्यादा का घोटाला हुआ है. इस घोटाले ने जमाकर्ताओं के बीच बैंक की साख हिला दी है. इस वैलेंटाइन डे जब युवा जोड़े एक दूसरे का हाथ पकड़े जीने मरने की कसमें खा रहे थे वहीं इस बैंक के अधिकारियों के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी,और वो स्टॉक एक्सचेंज को ये बताने में मशगूल थे कि कि तरह पिछले 7 सालों से बैंक के कुछ अधिकारियों से मिलीभगत कर अरबपति ज्वैलरी कारोबारी नीरव मोदी ने बैंक को 11 हजार करोड़ से ज्यादा का चूना लगाया था.

मामले की जांच शुरू हो गई है और पीएनबी के दो कर्मचारी हिरासत में लिए जा चुके हैं. उनसे पूछताछ जारी है. इतने बड़े पैमाने पर जालसाजी ने नीति निर्माताओं, नियामकों और निवेशकों को हैरान कर दिया है. जिस तरह से फर्जी लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एलओयू) के सहारे भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं से बड़े पैमाने पर घोटाला किया गया उससे निवेशकों का आत्मविश्वास पूरी तरह हिल गया है.

इस घोटाले ने पीएनबी के इमेज पर इतना खराब प्रभाव डाला है कि घोटाले का खुलासा होने का बाद से अब तक इसके शेयरों में तीस फीसदी तक गिरावट आ चुकी है. वैसे इस घोटाले का पूरा प्रभाव देखने के लिए अभी आपको और इंतजार करना पड़ेगा.

घोटाले की जानकारी के बाद पीएनबी की सामंती व्यवस्था?

पीएनबी घोटाले को बैंकिंग जालसाजी का केवल इकलौता मामला नहीं समझना चाहिए बल्कि ऐसे मामले पूरे सिस्टम के ध्वस्त होने की ओर इशारा करते हैं. सच्चाई ये है कि देश के सरकारी बैंक सामंती दौर के समय की तरह काम करते हैं. ये बैंक नौकरशाही से संचालित होते है. अधिकतर पब्लिक सेक्टर बैंकों के चैयरमैन खुद को राजा मानते हैं. कई बार तो अपने से जूनियर कर्मचारियों से अपमानजनक व्यवहार तक करते हैं.

पीएसयू बैंकों की कार्यशैली प्राइवेट बैंकों से बिल्कुल अलग होती है. यहां के चेयरमैन और बड़े अधिकारी नौकरशाही और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए निर्णय लेते हैं न कि बैंकों की भलाई के लिए फैसला करते हैं. ये बैंक को अपना समझते ही नहीं है और शायद यही वजह है सरकारी बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा है.

अर्थव्यवस्था की तेजी के दौरान अधिकतर पब्लिक सेक्टर बैंकों ने कॉरपोरेट लोन का बड़ा हिस्सा बिना किसी समझदारी और क्रेडिबिलिटी के देना शुरू किया. जब बैंको ने बिना कुछ समझे कर्जों पर ध्यान देना शुरू किया तो उन्होंने कर्जों की संख्या पर ज्यादा जोर दिया न कि कर्जों की क्वालिटी पर.

समस्या वहीं से शुरू हुई. यहीं से उनका नॉन परफॉर्मिंग एसेट यानी एनपीए बढ़ना शुरू हो गया. एक समय था जब सरकारी बैंक अखबारों में बड़े विज्ञापन देकर ये बताते थे कि वो कितना व्यापार कर रहे हैं. लेकिन अपने सरकारी आकाओं को खुश करने वाले विज्ञापनों में वो ये नहीं बताते थे कि उनकी बैलेंसशीट की क्या हालत है.

एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी ने टिप्पणी की 'चाहे यूपीए का पहले का शासन रहा हो या फिर अभी का एनडीए का शासन, बैंकों की सामंती मानसिकता में बदलाव नहीं हुआ है.' मजेदार बात ये है कि बैंक से विदा लेता हुआ हर चेयरमैन अपनी बैलेंसशीट बढ़िया बना कर आने वाले नए चेयरमैन को डूबे कर्ज की विरासत सौंप जाता है.

अकेला ऐसा मामला नहीं

ऐसा सोचना बड़ी भूल होगी कि पीएनबी का ये मामला बैंकिंग सेक्टर का अपनी तरह का इकलौता मामला है. ये केवल ढीली निगरानी और सरकारी तंत्र की विफलता का परिणाम है जो सरकारी बैंकों को सालों से परेशान कर रहा है. पीएनबी तो देश के सरकारी बैंकों की स्थिति का केवल आइना है जो सालों से कमजोर जोखिम प्रबंधन, घटिया मैनेजमेंट और स्वतंत्र तरीके से बड़े फैसले नहीं ले पाने की कमजोरी झेल रहा है.

ये घोटाला इशारा करता है कि किस तरह से सरकारी बैंकों को समस्या का सामना करना पड़ रहा है और इस तर्क पर भी सवाल खड़ा करता है कि करदाताओं के रुपए से इन कर्जदाताओं को बिना किसी आधारभूत सुधार के क्यों उबरने का मौका दिया जाता है.

अभी हाल ही में फ़र्स्टपोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर और पीएनबी के पूर्व चेयरमैन केसी चक्रवर्ती ने साफ कहा था कि पीएनबी के इस घोटाले को अलग नजर से नहीं देखना चाहिए. ये घोटाला लंबे समय से नजरंदाज किए जा रहे जोखिम प्रबंधन के समुचित उपायों और घटिया ऑडिटिंग का परिणाम है.

चक्रवर्ती का कहना था कि ऐसे घोटाले केवल जेखिम आधारित ऑडिटिंग और लगातार निगरानी से ही रोके जा सकते हैं. सभी बैंक सभी तरह के खातों की कई तरह की ऑडिटिंग करते हैं. बैंक रेगुलेटर आरबीआई भी नियमानुसार बैंक ट्रांजैक्शंस पर नजर रखता है. यहां तक कि सरकार भी समय-समय पर सरकारी बैंकों के प्रदर्शन की समीक्षा करती रहती है, लेकिन किसी की नजर में इतनी भारी गड़बड़ी पकड़ में नहीं आई. पिछले सात सालों से यह घोटाला बिना किसी रोकटोक के चलता आ रहा था.

एक ध्वस्त बैंकिंग व्यवस्था?

ये सच है कि पीएनबी घोटाले ने समस्त भारतीय बैंकिग सेक्टर पर नकारात्मक प्रभाव डाला है लेकिन सरकारी बैंकों में यह अकेले काला धब्बा नहीं है. ऐसे कई मामले हैं जो ये बैंक झेलते आ रहे हैं. पूंजी की कमी, सुधार का अभाव, कमजोर गवर्नेंस और राजनीति-कॉरपोरेट की सांठ-गांठ इनकी परेशानियों में इजाफा करती रहती है.

इनकी सबसे बड़ी समस्या है इनके एनपीए में लगातार बढ़ोतरी है. पूरे बैंकिंग सेक्टर के लगभग 90 फीसदी एनपीए सरकारी बैंकों की बैलेंस शीट में है. भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लगभग 70 फीसदी पर सरकारी बैंकों का कब्जा है. लेकिन अफसोस की बात ये है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पांच दशक गुजर जाने के बाद भी सरकारी नियंत्रण से इन बैंकों का भला नहीं हो सका है. हां! ये जरूर है कि इससे भारत के दूर दराज क्षेत्रों में रहनेवालों को बैंकिग सुविधा उपलब्ध हो गई और किसानों को बैंकों से सीधे कर्ज मिलने लगा.

आज समूचे सरकारी बैंकों का एनपीए लगभग 9 लाख करोड़ के आसपास पहुंच गया है. अगर आप पूरी बैंकिंग इंडस्ट्री के एनपीए पर नजर डालें तो पीएनबी का जीएनपीए 12.11 फीसदी, बैंक ऑफ बड़ौदा का 11.31 प्रतिशत और केनरा बैंका का 10.38 फीसदी है. आईडीबीआई इस सूची में 24.72 फीसदी के साथ शीर्ष पर है. जबकि दूसरे नबंर पर 20.64 फीसदी के साथ यूको बैंक हैं.

एसबीआई का नुकसान पिछले तिमाही के 9,026 करोड़ से बढ़कर 25,836 करोड़ हो चुका है. अभी कुछ और सरकारी बैंकों ने पिछली तिमाही के नतीजे जारी नहीं किए हैं ऐसे में अंतिम तस्वीर और भयावह हो सकती है.

सुधारों की मांग पर कोई सुनवाई नहीं

सरकारी बैंकिंग व्यवस्था में आमूल चूल सुधार के वायदे तो कई बार किए गए लेकिन कुछ मामूली बदलावों को छोड़ दे तो भारतीय बैंकों के सामने परिस्थितियां पहले जैसी ही हैं. वायदे टूट कर बिखरते रहे और बैंकों को इस तरह के घोटाले झेलने पड़ते रहे.

केंद्र की एनडीए सरकार ने वायदा किया था कि एक बड़े सुधार के साथ सरकारी बैंकों की व्यवस्था में बदलाव लाएगी लेकिन स्टेट बैंक ग्रुप में कुछ बैंकों के विलय के अलावा कुछ बड़ा अब तक नहीं हो सका है. 2014 में जे पी नायक के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ समिति ने फैसला लिया था कि सरकारी बैंको में सरकार की हिस्सेदारी को कम किया जाएगा ताकि प्राइवेट बैंकों को चलाया जा सके. लेकिन इस मसले पर भी कुछ खास नहीं हुआ सिवाए इसके कि चेयरमैन और सीईओ के पद अलग अलग कर दिए गए. और सीईओ का पद निजी क्षेत्र के सीईओ को दे दिया गया. लेकिन ये सब वदलाव बैंकिग सेक्टर की न तो कामकाज प्रभावित कर सके न ही उनकी कार्यशैली में कोई बदलाव ला सके.

पीएनबी मामले को देखते हुए अब ये समय आ गया है कि सरकार पब्लिक सेक्टर के बैंकों के निजीकरण के मामले में गंभीरता से सोचे. इसके साथ ही पूरे बैंकिंग सिस्टम में बदलाव और आमूल चूल परिवर्तन के साथ साथ जोखिम प्रबंधन पर विशेष ध्यान दे. पीएनबी धोखाधड़ी मामला नियामक और नीति निर्माताओं की आंखें खोलने के लिए काफी है कि केवल दिखावटी बदलाव से कुछ नहीं होगा, कुछ ठोस करना होगा. ( ये सरकारी बैंकों की समस्याओं पर आधारित श्रृंखला का पहला लेख है. आने वाले कुछ दिनों तक इस श्रृंखला की कड़ियां हम लगातार प्रकाशित करते रहेंगे )

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