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इस साल और रुलाएगी पेट्रोल और डीजल की महंगाई

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, लिहाजा भारतीयों को भी अब और ज्यादा कीमतें चुकानी पड़ेंगी

Updated On: Jan 02, 2018 04:32 PM IST

Sindhu Bhattacharya

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इस साल और रुलाएगी पेट्रोल और डीजल की महंगाई

नए साल पर सरकार का सबसे अच्छा तोहफा होता कि वह डीजल और पेट्रोल पर से टैक्स घटाती. दोनों की कीमतें फिलहाल रिकॉर्ड पर हैं. दिल्ली में मंगलवार को डीजल का भाव 59.76 रुपए प्रति लीटर रहा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिलहाल नीचे जाने के मूड में नहीं है. लिहाजा अगले कुछ महीनों तक पेट्रोल-डीजल के दाम घटने के बजाय उलटा बढ़ने के ही आसार हैं.

सरकार ने दिवाली के आसपास टैक्स घटाकर अपनी तरफ से थोड़ी राहत पहले ही दे दी है. उस वक्त डीजल और पेट्रोल से एक्साइज ड्यूटी घटाया गया था. हालांकि केंद्र सरकार के इस पहल के बाद कुछेक राज्यों ने ही स्टेट-स्पेसिफिक लेवी में कटौती की थी.

महंगाई के साथ नए साल का स्वागत

साल के पहले दिन उपभोक्ताओं को डीजल भरवाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ा. 1 जनवरी को दिल्ली में डीजल का भाव 59.70 रुपए प्रति लीटर रहा. 2 जनवरी की सुबह भी ग्राहकों के लिए कोई राहत लेकर नहीं आई. मंगलवार को डीजल और 6 पैसा महंगा होकर 59.76 रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गया.दिल्ली में डीजल सबसे सस्ता है. मुंबई और चेन्नई जैसे मेट्रो शहरों में डीजल 62 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है.

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एनसीआर की बात करें तो नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद में भी डीजल 60 रुपए प्रति लीटर है. इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) के आंकड़ों के मुताबिक, दिवाली के दिन डीजल का भाव 56.95 रुपए प्रति लीटर था. इसके बाद कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. दिवाली से लेकर नए साल के बीच डीजल के दाम में 5 फीसदी तक इजाफा हो चुका है.

लगभग यही हाल पेट्रोल का भी है. यह भी रिकॉर्ड भाव पर बिक रहा है. डीजल के मुकाबले पेट्रोल के दाम में उतारचढ़ाव कम हुआ है. 2017 में दिवाली के दिन पेट्रोल का भाव 68.33 रुपए प्रति लीटर था. नए साल के पहले दिन यह बढ़कर 69.97 रुपए प्रति लीटर पर आ गया है. यानी इस दौरान पेट्रोल के दाम में 2.5 फीसदी की तेजी आई है.

आखिर क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?

सरकार ने अक्टूबर में डीजल और पेट्रोल का एक्साइज ड्यूटी घटा दिया है, उसके बाद भी कीमतें क्यों बढ़ रही हैं? इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का महंगा होना है. पिछले छह महीनों में क्रूड के भाव 40 फीसदी बढ़कर 67 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं. यह तेजी ग्लोबल डिमांड बढ़ने और उत्पादन घटने की वजह से हुआ है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में अगर कीमतें बढ़ती हैं तो भारतीय उपभोक्ताओं को भी ज्यादा दाम चुकाना होगा. इस बीच अगर सरकार दोबारा टैक्स घटा देती है तो कीमतों में नरमी आएगी. भारत में हर दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बदलते हैं.

कच्चे तेल में उतारचढ़ाव के साथ क्या डीजल-पेट्रोल के दाम लगातार बढ़ते रहेंगे? ब्रोकरेज फर्म आईआईएफएल के मुताबिक, अगर क्रूड प्राइस बढ़कर 85 डॉलर प्रति बैरल होता है तो पेट्रोल और डीजल के दाम में 13 से 15 रुपए की जरूरत होगी. उम्मीद करते हैं कि सरकार पूरा बोझ आप और हम पर नहीं डालेगी.

सरकार सबसे ज्यादा टैक्स डीजल और पेट्रोल पर लगाती है. सरकारी खजाने में इसका बड़ा हिस्सा होता है, जिसे सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किया जाता है.

क्या है टैक्स का हिसाब?

लोकसभा को दिए लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने बताया था, पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क 19.48 रुपए और डीजल पर 15.33 रुपए प्रति लीटर है. यानी डीजल के लिए जो कीमत हम चुकाते हैं, उसका 25 फीसदी हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है. पेट्रोल में यह हिस्सेदारी 28 फीसदी है. इससे ऊपर इंपोर्ट ड्यूटी है, जो केंद्रीय शुल्क है.

इसके अलावा पेट्रोल पर स्टेट टैक्स लगता है. यह 20 से 48 फीसदी के बीच रहता है. डीजल के मामले में यह 12 से 38 फीसदी रहता है. केंद्रीय शुल्क प्रति लीटर के हिसाब से लगता है. जबकि स्टेट टैक्स एड-वेलोरम होता है. इस तरह क्रूड प्राइस के मुकाबले डीजल और पेट्रोल का रिटेल प्राइस काफी ज्यादा रहता है. एक्साइज ड्यूटी से सबसे पहले कीमतें बदलती हैं. उस पर स्टेट टैक्स या वैट लगता है. वैट लगाने का अधिकार राज्यों के पास होता है.

किसी भी सूरत में सरकार ईंधन पर एक्साइज या आयात शुल्क घटाने में जल्दबाजी नहीं करेगी, क्योंकि सरकारी खजाने में इसका एक बड़ा हिस्सा होता है. 2016-17 के बीच पेट्रोल और डीजल पर टैक्स के जरिए सरकार ने 4.4 लाख करोड़ रुपए कमाए थे. इस तरह की लेवी से होने वाली केंद्र सरकार के कुल राजस्व में डीजल-पेट्रोल की हिस्सेदारी 62 फीसदी या दो तिहाई है. अभी तक टोटल एक्साइज टैक्स कलेक्शन में डीजल और पेट्रोल की हिस्सेदारी 84-87 फीसदी है. इसका मतलब यह है कि सरकार के टोटल टैक्स कलेक्शन में 20 फीसदी हिस्सा ईंधन पर लगने वाले टैक्स का है. ऐसे में सरकार टैक्स घटाकर अपने ही खजाने पर कैंची क्यों चलाना चाहेगी.

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